MayarBhasha राजस्‍थानी

यशोधरा नवम् पर्व

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

नवम् पर्व

मन वचन और कर्म से तुमने कभी न पीड़ा पहुंचाई
करते कितना ख्याल हमारा कैसे अब कहा जाई
कितने निर्मल कितने कोमल कितने थे सुखदाई
जीवन अपना धन्य मानती तुम्हे कहूँ मैं सच्चाई
पर एकदम क्यों पासा पलटा समझ मुझे आया न जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।81।।

 

 रखा सदा स्नेह से सिंचित भाव प्रेम अनूप प्रिये
कह नहीं सकती प्रेम आपका मेरे मन के भूप प्रिये
छाया बनकर रहते प्रियवर लग न जाये धूप प्रिये
रही अचंभित मैं तो अब यह देख तुम्हारा रूप प्रिये
ऐसे भी कोई क्षण में बदले नहीं होता विश्वास जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।82।।

 

 अथाह प्रेम देखा था मैंने वो पल भर में रीत गया
सागर सम अगाध प्रेम फिर कैसे यह बीत गया
इतना यह परिवर्तन मैने देखा नहीं कभी पहले
हुआ अचानक सोच यही धीरज का भी मन दहले
शनैःशनैः होता यदि तो मैं भी सह लेती जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।83।।

 

अपूर्व बिछोह है यह तो कैसे कोई सह पाये
सह वही सकता है जो न भावो में बह जाये
वरना मुश्किल है सहना यो अचानक जाने को
और नहीं कुछ पास हमारे सिवा एक पछताने को
उजड़ गया इक पल के भीतर चमन कोई हराभरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।84।।

 

 बात चुभी क्या ऐसी तुमको निर्णय यह कठोर लिया
किसने तुमको या भरमाकर वन जाने  पर जोर दिया
बात रखी वो भी मन में ऐसा भी क्या प्रण लिया
नहीं रोकती मैं तुमको मुझे अगर बताते जो पिया
पर छुपाया सब कुछ तुमने रखा नहीं विश्वास जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।85।।

 

 नहीं भाव चेहरे पर देखे न विचलित ही मन स्वामी
सब कुछ छिपा अंतर में अपने बन बैठे वनगामी
अविचल भाव तुम्हारा देखा अद्भुत था वो अनामी
कैसे गुप्त रखा तुमने यह जानो केवल तुम स्वामी
छलक नहीं पाया अंतरघट  जो था अधिक भरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।86।।

 

 क्यों न बता पाये मुझको कायर सा यह कृत्य किया
मैं कौनसी तुम्हे रोकती मैं हूँ तुम्हारी भृत्य पिया
सिंह होकर शृगाल बने क्यों यह नही समझ पाई
चुपके से तुम निकल गए ज़रा शर्म भी न आई
जाना ही था तो दिन में जाते आधी रात क्यों गमन करा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।87।।

 

मुझसे ही छिपाया ऐसा क्या था जो लेती मैं छीन
नहीं बताते तो क्या करती मैं तो हूँ तेरे आधीन
पराधीन नहीं पूछ सकी भाग्य बिगाड़ा क्यों मेरा
पर मुझको अगर पूछते सम्मान बहुत होता तेरा
अमर हो जाते जग में कहलाते फिर अमर नरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।88।।

 

पुरुष भाग्य को देव न जाने कहते है बात सभी
पर भाग्य बनाये पुरुष हाथ से होता है यह भी कभी
राजमहल के रहने वाले वन में तपते ताप अरे
खुद ही निर्णय लिया आपने नहीं कोई यह शाप अरे
अपने हाथो हता भाग्य क्यों ऐसा तुमने करा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।89।।

 

विपरीत मति हो जाती है जब संकट आन पड़े
पल न रुक पाता नर चल देता चुपचाप बड़े
क्या विपदा तुम पर आई मति गमाई है तुमने
भूल गए सब मर्यादा न रीत प्रीत दिखलाई तुमने
संकट में मैं  साथ निभाती कहते तुम मुझको जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।90।।


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लेखक परिचय

श्री श्रवण सिंह राजावत
जयपुर जिले की फागी तहसील अंतर्गत डाबिच गांव में 1 जुलाई 1968 को जन्मे कवि श्रवण सिंह राजावत की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम डाबिच में ही हुई।हायर सेकेंडरी शिक्षा चाकसू से करने के बाद जयपुर के कामर्स कालेज से बी काम की डिग्री हासिल की।पंजाब नेशनल बैंक में लिपिक पद पर 7 वर्ष सेवा करने के बाद राजस्थान तहसीलदार सेवा में चयनित हुए।वहां से पदोन्नत होकर राजस्थान प्रशासनिक सेवा में वर्तमान में एस डी एम् चोह्टन पदस्थापित है।प्रख्यात राजस्थानी कवि लक्ष्मण सिंह रसवन्त के दामाद होने से कविता के क्षेत्र में कई राजस्थानी कवियों के संपर्क में आये और लेखन के क्षेत्र में आगे बढे।चालक सतसई,मीरा सतसई राजस्थानी में लिखी है।यशोधरा व् उर्मिला पर हिंदी खंडकाव्य लिखा है।अभी भगवान राम के जीवन पर पद लिख रहे है।