MayarBhasha राजस्‍थानी

यशोधरा अष्‍टम् पर्व

 

 

 

 

 

अष्‍टम् पर्व

निज शोणित से नर तन देती जननी है जग की
कौन कर सकता है तुलना नारी तेरे ही पग की
पर वो ही नारी अश्रु दुःख के बहा रही है देखो
नर उसको समझ न पाया जो जग की जननी देखो
जब न जाना उस जननी को उसे कैसे जानोगे जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।71।।

 

 नारी को तजने से ही मुक्ति नाथ नहीं मिलती
अगर यही होता तो नारी को मुक्ति नहीं मिलती
यह भ्रम आपको हुआ कहाँ तुम तो हो बड़े ज्ञानी
लकीर खीचने से कभी अलग हुआ है क्या पानी
बिंदु सिंधु ही में समाता सच यही है खरा खरा
कौन समझ पायेगा मुझको काह रही है यशोधरा।।72।।

 

 नारी के प्रश्न के आगे नर सदा निरुत्तर  रहा
पर नारी क्या कर सकती उसने चुपचाप सहा
सदियो से सहती आयी सदा संताप महा
दुःख उसके अंतर का रहा  हमेशा अनकहा
कहती वो किससे कोई उसकी सुनता न जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।73।।

नर नारी में भेद करे वो कैसे अभेद को जानेगा
जीव ब्रह्म दोनों ही एक है फिर जीव दो मानेगा
भेद मिटाने खातिर निकला भेद रखा तो हारेगा
पहले खुद का भेद मिटे तभी सभी को तारेगा
भेदभाव किया अगर तो मिलेगा कैसे अभेद जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।74।।

 

 नारी मन की थाह कभी पुरुष नहीं है ले पाया
रहती जबकि साथ हमेशा बनकर के उसका साया
पति पत्नी एक रूप है है अलग उनकी काया
फिर भी जाने यह अभागा पत्नी को न समझ पाया
सहचरी को जो समझ सका न उसको कैसे समझे निरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।75।।

 

 कोमल ह्रदय था तुम्हारा क्यों निष्ठुरता अपनाई
बचपन में मराल बचाकर करुणा तुमने दिखलाई
जीवो के प्रति दयाभाव था मन में थी ममताई
शिक्षा दी थी अहिंसा की यह हिंसा अब अपनाई
जीवित ही मुझे मार गए अब तो उत्तर दो जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।76।।

 

कहाँ सीखी तुमने निष्ठुरता मैंने तो देखी न कभी
विनम्र सहृदय सुशील नाथ चाहते थे जन को सभी
कभी कहा न कटु वचन  औरनहीं कभी ठुकराया
फिर कैसे मुझको तजने का भाव यह मन में आया
सज्जन होकर भी  तुमने काम न यह सही करा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।77।।

 

 पुष्प निहारने वाले तुम सदा रहे कली सम मुस्काते
देखे तुमने सुमन उपवन के डाली के संग इठलाते
परभृत की मीठी कुहुक का श्रवण नित कर जाते
शीतल मलय सुगन्धित में रोज प्रातः खुद को पाते
सुकोमल सुगन्धित रहकर भी ह्रदय कठोर करा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।78।।

 

 नहीं कही कटु बात कभी शब्द शहद से मैने सुने
नहीं व्यंग्य उपहास किसी का फिर जाल ये बुने
हतप्रभ सी रह गई मैं तो निश्चय कैसा तुमने किया
जिस खातिर जग छोड़ते उसे अकेला छोड़ दिया
हुई ऐसी क्या घटना मुझको तो बतलाते जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।79।।

 

 बिन कारण तो यह अचानक कैसे बदलाव हुआ
जिनसे था स्नेह सदा उनसे क्यों अलगाव हुआ
मैं तुम्हारी हृदयतंत्री मुझसे ही यह् दुराव हुआ
मुझे तो कहते मेरे स्वामी ऐसा क्यों स्वाभाव हुआ
बिन कारण कार्य न होता इतना तो सोचो जरा

कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।80।।


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लेखक परिचय

श्री श्रवण सिंह राजावत
जयपुर जिले की फागी तहसील अंतर्गत डाबिच गांव में 1 जुलाई 1968 को जन्मे कवि श्रवण सिंह राजावत की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम डाबिच में ही हुई।हायर सेकेंडरी शिक्षा चाकसू से करने के बाद जयपुर के कामर्स कालेज से बी काम की डिग्री हासिल की।पंजाब नेशनल बैंक में लिपिक पद पर 7 वर्ष सेवा करने के बाद राजस्थान तहसीलदार सेवा में चयनित हुए।वहां से पदोन्नत होकर राजस्थान प्रशासनिक सेवा में वर्तमान में एस डी एम् चोह्टन पदस्थापित है।प्रख्यात राजस्थानी कवि लक्ष्मण सिंह रसवन्त के दामाद होने से कविता के क्षेत्र में कई राजस्थानी कवियों के संपर्क में आये और लेखन के क्षेत्र में आगे बढे।चालक सतसई,मीरा सतसई राजस्थानी में लिखी है।यशोधरा व् उर्मिला पर हिंदी खंडकाव्य लिखा है।अभी भगवान राम के जीवन पर पद लिख रहे है।