MayarBhasha राजस्‍थानी

यशोधरा सप्‍तम् पर्व

 

 

 

 

 

सप्‍तम् पर्व

भीतर की नारी ही देखो शौर्य तुम्हारा कहलाता
रणभूमि में वही शौर्य रिपुदल को है थर्राता
पूरी नारी बनकर ही नर उस पथ को है पाता
फिर भी ढोंग रचाने को नारी को तज जाता
अहम पुरुष का आड़े आता कथन यही है खरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।61।।

 

 नाड़ी शुद्धि के ही खातिर तो मुझ नारी का त्याग किया
राग द्वेष दोनों तजने को भूले क्यों मेरा अनुराग पिया
मैं तो बनती सम्बल सत का पर तुमने अवसर न दिया
बिन सोचे ही तुमने प्रीतम यह कदम कैसा उठा लिया
मैं बन जाती सहचरी सत की आड़े नहीं आती जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।62।।

 

कुण्डलनी रूप में बैठी हर प्राणी भीतर नारी
जब चेतन होती तो ब्रह्मरंध्र भेदन करती प्यारी
यही पिलाती अमिय सभी को करके उलटी झारी
अनिवार्य वस्तु  त्याग किया नारी तज हे अनारी
जीवन की मैं सूत्रधार हूँ इतना तो सुन लेते जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।63।।

 

मैं भी नारी तुम भी नारी नारी है दुनिया सारी
नारी तजदी नारी खातिर कहाँ रही समझदारी
एक भूल तुम्हारी के कारण बर्बाद हुई हूँ में नारी
लेकिन तुम यह भूल न जाना नारी ही सबको तारी
भवसागर की यह है नौका पार उतर जाते जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।64।।

 

स्वर्ग रहा नारी चरणो में नरक द्वार नहीं नारी
युगों युगों से  ही पूजित रही अभी तक नारी
हे आर्य क्यों भूल गए तुम पूज्यन्ते यत्र नारी
तत्र रमन्ते देव सभी यह वेद रहे है उच्चारी
वेदमार्ग के जाननहारे कैसे भूल गए हो जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।65।।

 

 नर क्यों न समझ पाया है नहीं नारी कोई हेय
नारी बिना नहीं सध सकता मानव का कोई श्रेय
महत्त्व नहीं माना मानव ने जो रही सदा श्रद्धेय
जिसने जाना महत्त्व इसका रहा वो ही अजेय
वन में जाने से पहले महत्त्व जान लेते जो जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।66।।

 

 सभी समर्पण कर देती वो नर पर नारी है अपना
फिर भी नर उसके लिए सदा रहा है इक सपना
हाय विडम्बना देखो तुम पल भर में ठुकरा देता
कष्ट सहे भले नारी पर पक्ष कभी न उसका लेता
झेल रही है नित प्रताडन पुरुष रहा उसको डरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।67।।

 

बंधन सारे बंधे हुए है तुम मुक्त हुए फिर भी त्यागा
नारी हमेशा बंधी रही  रीत प्रीत का यह धागा
मुक्त पुरुष को मुक्ति चाहिए कैसे अद्भुत बात प्रिये
मैं बंधन में बंधी हुई तुम छोड़ चले अधरात प्रिये
मुझको भी मुक्ति देते तो बढ़ता मान तुम्हारा जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।68।।

 

 बिन पूछे नारी एक कदम नहीं कही चल पाती
घर की चार दिवारी को भी उम्र भर न तज पाती
पति आज्ञा ही सर्वश्रेष्ठ है यही रीत निभा पाती
सहती सारे प्रतिबन्ध यह उसकी है छाती
तुम पुरुष तो मन के मालिक मन में आया वो ही करा
कौन समझ पायेगा मुझको काह रही है यशोधरा।।69।।

 

करती भरोसा नारी नर पर पितागृह को तज देती
भार्या बनकर भार गृह का अपने कंधो ले लेती
भृत्य सम करती सेवा वो कभी नहीं ना देती
अपनाती है सब को इस खातिर खुद को खो देती
कौन करेगा त्याग नारी सम इतना तो बताओ जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।70।।


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लेखक परिचय

श्री श्रवण सिंह राजावत
जयपुर जिले की फागी तहसील अंतर्गत डाबिच गांव में 1 जुलाई 1968 को जन्मे कवि श्रवण सिंह राजावत की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम डाबिच में ही हुई।हायर सेकेंडरी शिक्षा चाकसू से करने के बाद जयपुर के कामर्स कालेज से बी काम की डिग्री हासिल की।पंजाब नेशनल बैंक में लिपिक पद पर 7 वर्ष सेवा करने के बाद राजस्थान तहसीलदार सेवा में चयनित हुए।वहां से पदोन्नत होकर राजस्थान प्रशासनिक सेवा में वर्तमान में एस डी एम् चोह्टन पदस्थापित है।प्रख्यात राजस्थानी कवि लक्ष्मण सिंह रसवन्त के दामाद होने से कविता के क्षेत्र में कई राजस्थानी कवियों के संपर्क में आये और लेखन के क्षेत्र में आगे बढे।चालक सतसई,मीरा सतसई राजस्थानी में लिखी है।यशोधरा व् उर्मिला पर हिंदी खंडकाव्य लिखा है।अभी भगवान राम के जीवन पर पद लिख रहे है।