MayarBhasha राजस्‍थानी

यशोधरा षष्‍टम् पर्व

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

षष्‍टम् पर्व

सीधे ही सन्यास लिया क्या आश हमारी निराश हुई
इस जीवन में तुमसे मिलना मृग तृष्णा सी प्यास हुई
मेरे भाग्य में जो लिखा था उसे देख हताश हुई
पर अब मैं क्या कर सकती हूँ उसकी अब तलाश हुई
मेरा भी कोई लक्ष्य होगा यह तुमने सोचा न जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।51।।

 

 जीवन से सन्यास लिया पर यह तो नाथ अधूरा है
बिना कर्म संन्यास लिए होता नहीं यह पूरा है
लेना ही था सन्यास अगर निष्काम कर्म अपना लेते
गीता के सन्देश को प्रभु थोडा सा अपना लेते
यह अंतर की यात्रा है यह तो समझ लेते जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।52।।

 

 अनुचित है सन्यास तुम्हारा नीति तो यही कहती
पति मोक्ष का भागी कैसे पत्नी जब है दुःख सहती
यह तो मात्र पलायन है सत्य बात स्वीकार करो
जग से नहीं डरने वाले मगर सत्य से तो डरो
क्यों किया पलायन छोड़ कर्तव्य इतना तो बतादो जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।53।।

 

 वही दीप वही है बाती राजमहल या वन भीतर हो
वही रौशनी रहे हमेशा फिर क्या इनमे अंतर हो
काम प्रकाश का तम को हरना फिर क्यों संन्यास लिया
राजमहल में रहकर भी वो फैलता प्रकाश पिया
दीपक की ज्योति तो जग में रही हमेशा तमहरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।54।।

 

 राजमहल में रहकर भी प्रकाश नहीं कुंठित होता
ज्योति फैलती चहुँ दिशा में जग सारा जगमग होता
नहीं कोई बाधा बनता ज्योति जगमग करने में
रहती ज्योति सदा लगी जग का नित तम हरने में
फिर क्यों छोड़ा राजमहल इतना तो बताओ जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।55।।

 

राजमहल और वन में अंतर यह बड़ा अज्ञान है
मुक्ति पथिक के लिए तो यह दोनों ही समान है
समत्व समझ न पाये अपनत्व त्याग बेकार है
कंकड़ कंचन लगे बराबर तो ही जीवन सार है
वन प्रस्थान करने वाले समता लेता सीख जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।56।।

 

 एक ब्रह्म यह वेद बताते फिर द्वैत कहाँ से आया
सभी बने है एक उसीसे एक सभी में है समाया
अंदर बाहर सदा एक वो फिर मन क्यों भरमाया
ब्रह्म जीव दोनों एक ही पृथक करे इनको माया
माया को पहचान न पाये यही हुई है चूक जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।57।।

 

 नारी को माया माना या बाधा अपने जीवन की
तभी तो तुमने अर्द्ध निशा में राह पकड़ली वन की
यह चूक हुई तुमसे प्रिये बात मानली तुमने मन की
नारी को तो मान लिया यह सूत्रधार है बंधन की
बंधन माना मुझको तो स्वयं तो खुल जाते जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।58।।

 

 त्याग दिया माया सम मुझको अब तो तुम ब्रह्म हुए
निज रूप तुम्हारा जान लिया फिर अब क्या भ्रम प्रिये
ब्रह्मरूप को जान लिया फिर माया का बंधन कैसा
अब न माया बांध सकेगी फिर रहना निर्जन कैसा
बंधन माया का यही है इसे समझ लेना जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।59।।

 

नारी बाहर की तजदी पर अंतर नारी है आधी
तुम नारी जब तक न बनोगे नहीं लगेगी समाधी
स्त्रैण बनोगे तुम खुद ही फिर क्यों तजी नारी
नारी बनने के ही खातिर हाय तजी तुमने नारी
नारी खातिर नारी मारी कैसी चूक हुई जरा

कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।60।।


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लेखक परिचय

श्री श्रवण सिंह राजावत
जयपुर जिले की फागी तहसील अंतर्गत डाबिच गांव में 1 जुलाई 1968 को जन्मे कवि श्रवण सिंह राजावत की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम डाबिच में ही हुई।हायर सेकेंडरी शिक्षा चाकसू से करने के बाद जयपुर के कामर्स कालेज से बी काम की डिग्री हासिल की।पंजाब नेशनल बैंक में लिपिक पद पर 7 वर्ष सेवा करने के बाद राजस्थान तहसीलदार सेवा में चयनित हुए।वहां से पदोन्नत होकर राजस्थान प्रशासनिक सेवा में वर्तमान में एस डी एम् चोह्टन पदस्थापित है।प्रख्यात राजस्थानी कवि लक्ष्मण सिंह रसवन्त के दामाद होने से कविता के क्षेत्र में कई राजस्थानी कवियों के संपर्क में आये और लेखन के क्षेत्र में आगे बढे।चालक सतसई,मीरा सतसई राजस्थानी में लिखी है।यशोधरा व् उर्मिला पर हिंदी खंडकाव्य लिखा है।अभी भगवान राम के जीवन पर पद लिख रहे है।