MayarBhasha राजस्‍थानी

यशोधरा पंचम पर्व

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

पंचम पर्व

माँग भरी थी तुमने चुटकी भर सिंदूर लगा करके
लाज उसी की रह जाती कह जाते मुझे जगाकर के
नाम तुम्हारा ही लेकर मैं सिर सिंदूर सजाती हूँ
और तुम्हारे होने से ही मैं सुहागिन कहलाती हूँ
सिर धारा सिंदूर जो मैंने रख लेते उसकी लाज जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।41।।

ये हाथो के मणि कंगन पहचान तुम्हारी है स्वामी
बिन नाथ आपके पहन रही कैसी व्यथा सुनो स्वामी
बिन पति सुहाग चिन्ह लगते मुझको बोझ प्रिये
ये मैं लगाती तेरे खातिर बड़े प्रेम से रोज प्रिये
बिन प्रीतम श्रृंगार है झूठा इतना तो समझो जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।42।

अभी नहीं आई थी बेला गृहस्थ छोड़ वन जाने की
खिलने के मौसम में कली को यों मुरझाने की
जीवन की बगिया में केवल एक सुमन है खिला
छोड़ चले बन बैरागी एसा तुमको क्या है मिला
मधुमास में खिलती कलिया इतना तो समझते जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।43।।

 गृहस्थ आश्रम शुरू हुआ था तुमने तो सन्यास लिया
आश्रम व्यवस्था युगों पुरानी उसका भी अपमान किया
चार आश्रमो में गृहस्थ श्रेष्ठ है वेदों में बखान किया
उसी आश्रम को तज बैठे कैसा यह अपमान किया
गृहस्थ छोड़ने से पहले इक बार सोच लेते जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।44।।

 गृहस्थ बाद वानप्रस्थ था उसमे जाते नाथ प्रिये
वेदों की रीति कहती मैं भी चलती तव साथ प्रिये
आश्रम मुझ बिन होता अधूरा यह सच्ची बात प्रिये
बिना बताये बने सन्यासी हुआ यह अपघात प्रिये
वेदों की आज्ञा तो  केवल एक बार सुन लेते जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।45।।

 वर्णाश्रम नहीं निभाया धर्म विमुख यह बात हुई
जैसे मध्य दिवस में ही अचानक काली रात हुई
यह अन्याय हुआ अचानक मुझ अबला को छोड़ा
ऐसा अपराध बतावो मेरा क्यों पल में नाता तोडा
नहीं रखना था साथ अगर तो रुकने को कहते जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।46।।

तुम जाते वनमार्ग भले ही साथ तुम्हारे मैं चलती
तुम करते प्रयास मोक्ष का संग सेवा मैं भी करती
मैं भी करती मन से सेवा कमी नहीं कोई रखती
वानप्रस्थ का धर्म निभाने दुःख सुख मैं सारे सहती
कभी टूट नहीं पाती यह वानप्रस्थ की परम्परा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।47।।

सब कुछ तजने से ही मोक्ष मिल जाती अगर
तो दीन दरिद्र पल भर में पा लेते वो मोक्ष डगर
तजना सकल पदार्थ से ही मुक्ति नहीं मिला करती
जग में रहकर जग प्रीति तोड़े तो ही मुक्ति मिला करती
सत्य बात यह श्रुति कहती अगर आप मानो जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।48।।

 लिए कामना भले ही वन में पूरा जीवन जाये बीत
मिलेगी न मुक्ति तब तलक जाये न इच्छाये रीत
इच्छाओं का दमन कहाँ हो मुक्ति भी एक इच्छा है
जीवन और जग दोनों को जीते यही कठिन परीक्षा है
मुक्ति की इच्छा को तजके मुक्ति पावो कैसे जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।49।।

 तप करने से शरीर तपता नहीं आत्मा तपती है
नाम जाप करने से भी केवल जिव्हा जपती है
जप तप करने ही के खातिर राज छोड़ वनवास लिया
ये दोनों तो यहाँ रहकर भी कर सकते थे पिया
फिर क्यों तुमने छोड़ मुझे वन में प्रस्थान करा

कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।50।।

 


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लेखक परिचय

श्री श्रवण सिंह राजावत
जयपुर जिले की फागी तहसील अंतर्गत डाबिच गांव में 1 जुलाई 1968 को जन्मे कवि श्रवण सिंह राजावत की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम डाबिच में ही हुई।हायर सेकेंडरी शिक्षा चाकसू से करने के बाद जयपुर के कामर्स कालेज से बी काम की डिग्री हासिल की।पंजाब नेशनल बैंक में लिपिक पद पर 7 वर्ष सेवा करने के बाद राजस्थान तहसीलदार सेवा में चयनित हुए।वहां से पदोन्नत होकर राजस्थान प्रशासनिक सेवा में वर्तमान में एस डी एम् चोह्टन पदस्थापित है।प्रख्यात राजस्थानी कवि लक्ष्मण सिंह रसवन्त के दामाद होने से कविता के क्षेत्र में कई राजस्थानी कवियों के संपर्क में आये और लेखन के क्षेत्र में आगे बढे।चालक सतसई,मीरा सतसई राजस्थानी में लिखी है।यशोधरा व् उर्मिला पर हिंदी खंडकाव्य लिखा है।अभी भगवान राम के जीवन पर पद लिख रहे है।