MayarBhasha राजस्‍थानी

यशोधरा चतुर्थ पर्व

 

चतुर्थ पर्व

युद्ध में जाते तो प्रियतम तिलक भाल लगाती मैं
असि सौप कर हाथो में विजयमाल पहनाती मैं
दीप सजाकर अपने हाथो आरत थाल सजाती मैं
हँसते हँसते रणभूमि हित तुमको विदा कराती मैं
पर हो न सका इस जीवन में आरत थाल रह गया धरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।31।।

 

सप्तपदी में वचन किया था हरदम साथ निभाने का
बिना बताये निज पत्नी को निश्चय फिर क्यों जाने का
अग्नि समक्ष सपथ आपकी किस कारण निर्मूल हुई
बिना बताये चले गए ऐसी क्या मुझसे भूल हुई
धर्म नीति पर चलने वाले शपथ निभाई होती जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।32।।

 

 बिन सम्मति काम कोई भी न करने का वचन दिया
पर इतना बड़ा निर्णय स्वामी स्वयं तुम्ही ने लिया
जीवन संगिनी मैं हूँ तुम्हारी क्यों अकेले छोड़ दिया
सदा विलोकत मुख मेरा उसने क्यों मुख मोड़ लिया
कह नहीं सकते तो नयन सैन ही कर देते जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।33।।

 

अग्नि शपथ तज अग्नि पथ पर क्यों तुमने गमन किया
इक  नारी के मन की सारी इच्छाओ का दमन किया
धर्म राह के पथिक आज कितना बड़ा अधर्म किया
औरो खातिर जीने वाले खुद के खातिर क्यों जिया
बड़ा स्वार्थी बन बैठा तू कितना स्वार्थ तुझमे  है भरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।34।।

 

 कहते है क्षत्रिय वचन हित निज प्राण भी दे देते
शरणागत अबलो के सारे दुःख अपने पर ले लेते
पर तुम कौन क्षत्रिय हो स्वामी पत्नी को भी ठग लेते
और अबला को बला जानकर दूर स्वयं से कर देते
क्षात्र धर्म के पालन हारे अपना धर्म निभाते जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।35।।

 

 श्रेयश चारो में भाग हो मेरा ऐसा वचन तुमने दिया
मोक्ष प्राप्त क्या करोगे अकेले मुझको तो भुला दिया
धर्म अर्थ काम मोक्ष में मैं भी तो सहभागिनी थी
पर गए अकेले बिना बताये मैं भी तो अर्द्धांगनी थी
मेरा हिस्सा भूल गए क्यों मुझसे यह धोखा करा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।36।।

 

वामांग बिठाया था जब तुमने कर में कर लेकर स्वामी
सर्वांग त्यागने में तुमने तो सोचा न पलभर स्वामी
अनुगामी बने थे तुम उस अग्नि के आगे स्वामी
अनुगामी ही बना लेते तो भी रहती खुश स्वामी
नहीं निभाई कुल मर्यादा ऐसा अत्याचार करा
कौन समझ पायेगी मुझको कह रही है यशोधरा।।37।।

 

भूल गये उस गठजोड़े को बांध लिए थे हमने फेरे
सप्त जन्म तक नहीं बिछुड़ेंगे यही शब्द सुने तेरे
सप्त जन्म तो दूर रहे इस जन्म में साथ नहीं मेरे
बकवादी मिथ्या भाषी तुम गूंज रहे है शब्द तेरे
इस जन्म में तो स्वामी वचन अपना निभाते जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।38।।

 

 गणेश सुरेश ग्रह नक्षत्र साक्षी बने थे जिस क्षण के
संकल्प किया था जो तुमने उसे भुलाया इक क्षण में
देव पितृ सबका आवाहन भुला दिया किस कारण में
क्या विस्मृत हुए सभी या त्रुटि हुई उच्चारण में
देवो का आदर करने वाले संकल्प तो निभाते जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।39।।

 

 कन्यादान किया स्वीकार तो रक्षा भी करनी होगी
दान  वापिस लौटाया न जाये यह बात समझनी होगीं
न ही उसका त्याग ही होता शास्त्र की कथनी होगी
दान की रक्षा कर न सके नर्क की गति भुगतनी होगी
फिर क्यों त्याग किया मेरा इतना तो बतलादो जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।40।।


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लेखक परिचय

श्री श्रवण सिंह राजावत
जयपुर जिले की फागी तहसील अंतर्गत डाबिच गांव में 1 जुलाई 1968 को जन्मे कवि श्रवण सिंह राजावत की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम डाबिच में ही हुई।हायर सेकेंडरी शिक्षा चाकसू से करने के बाद जयपुर के कामर्स कालेज से बी काम की डिग्री हासिल की।पंजाब नेशनल बैंक में लिपिक पद पर 7 वर्ष सेवा करने के बाद राजस्थान तहसीलदार सेवा में चयनित हुए।वहां से पदोन्नत होकर राजस्थान प्रशासनिक सेवा में वर्तमान में एस डी एम् चोह्टन पदस्थापित है।प्रख्यात राजस्थानी कवि लक्ष्मण सिंह रसवन्त के दामाद होने से कविता के क्षेत्र में कई राजस्थानी कवियों के संपर्क में आये और लेखन के क्षेत्र में आगे बढे।चालक सतसई,मीरा सतसई राजस्थानी में लिखी है।यशोधरा व् उर्मिला पर हिंदी खंडकाव्य लिखा है।अभी भगवान राम के जीवन पर पद लिख रहे है।