MayarBhasha राजस्‍थानी

यशोधरा तृतीय पर्व

तृतीय पर्व

सुरलोक के सब देवता नमन करते आकाश से
पुष्प बरसाते सभी कह श्रद्धासुमन तव लाश पे
गूंजती जयकार नभ् में वीर तुम रहना अमर
नाम लेते वीर युग युग प्रस्थान करते जब समर
पर वीरगति अब ना मिले कर्म जो तुमने करा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।21।।

 

 मैं भी हर्षित होती अगर तुम सो जाते समरांगण में
दीप सजाती लेकर थाली स्वागत करती आंगन में
मैं कहलाती वीर वनिता नहीं परित्यक्ता कहलाती
रीत राज की निभा सदा अमर रखती निज कुल थाती
पर हे स्वामी आज आपने मेरे संग है छल करा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।22।।

 

 वीरो का मार्ग त्याग दिया यह तो पलायन कहलाता
जीवन युद्ध लड़ न सके वो नर भी कायर कहलाता
संघर्ष नाथ अगर करते तो होती जयकार प्रिये
मगर समर तजने वाले केवल पाते धिक्कार प्रिये
सच कहती हूँ बात तुम्हे असत्य वचन नहीं जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।23।।

 

कुल रीत खातिर शीश भी रण में कट जाता अगर
धन्य कहलाती मै प्रभु यश के चढ़ जाती शिखर
नाम होता जगत में लिखा जाता यह स्वर्णाक्षर
नहीं करती शोक में न ही होता यह रुदन स्वर
पर आपने तज युद्ध मार्ग ये कोनसे मग पग धरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।24।।

 

 धर्म की करने रक्षा निज शीश आप अर्पित करते
मातृभूमि हित बलिवेदी पर हंसते हँसते चढ़ते
क्षात्रधर्म के बनकर वाहक देश धर्म रक्षा करते
पुरखो के यशपुंज में जाकर के तुम भी जुड़ते
बढ़ता मान क्षत्रिय कुल का यह न तुमने ध्यान धरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।25।।

 

 यदि आप उचित कहते संग युद्ध में जाती मैं
खड्ग धार रिपुदल का मर्दन संग आप कराती मैं
कभी नहीं हटती पीछे हरावळ बन जाती मैं
हँसते हँसते रणभूमि मैं प्राण भले तज जाती मैं
साथ तुम्हारे रहती हरदम अगर मुझे कहते जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही यशोधरा।।26।।

 

 जैसे दशरथ के संग कैकेई ने युद्ध प्रयाण किया
टूटे रथ के आरे तब निज अंगुली से बचाव किया
वैसे ही मै भी चलती युद्ध में साथ निभाने को
रहती तत्पर पालन करने आपकी आज्ञा निभाने को
पर कभी न होगा ऐसा इस जीवन में युद्ध जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।27।।

 

नृप हरिश्चन्द्र के खातिर तारा बीच बाजार बिकी
रामचंद्र के संग सीता भी जंगल की ही खाक छकी
दुःख में हरदम साथ निभाती आयी क्षत्रिय ललना
देते जो आदेश मुझे तो चाहती मैं भी संग चलना
पर तुम क्यों कह न सके मेरे मन में यह अखरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।28।।

 

धर्म की करने रक्षा निज शीश आप अर्पित करते
मातृभूमि हित बलिवेदी पर हंसते हँसते चढ़ते
क्षात्रधर्म के बनकर वाहक देश धर्म रक्षा करते
पुरखो के यशपुंज में जाकर के तुम भी जुड़ते
बढ़ता मान क्षत्रिय कुल का यह न तुमने ध्यान धरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।29।।

 

 वर्ण धर्म नहीं कहता यूँ चुपचाप अकेले जाने को
छोड़ बिलखता सुत पत्नी यूँ सन्यासी बन जाने को
बिना बताये अर्ध निशा में जंगल में चले जाने को
नहीं कहता बिना अनुमति उस पथ पर कदम बढ़ाने को
नहीं निभाया धर्म आपने अपराध बहुत तुमने करा

कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।30।।


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लेखक परिचय

श्री श्रवण सिंह राजावत
जयपुर जिले की फागी तहसील अंतर्गत डाबिच गांव में 1 जुलाई 1968 को जन्मे कवि श्रवण सिंह राजावत की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम डाबिच में ही हुई।हायर सेकेंडरी शिक्षा चाकसू से करने के बाद जयपुर के कामर्स कालेज से बी काम की डिग्री हासिल की।पंजाब नेशनल बैंक में लिपिक पद पर 7 वर्ष सेवा करने के बाद राजस्थान तहसीलदार सेवा में चयनित हुए।वहां से पदोन्नत होकर राजस्थान प्रशासनिक सेवा में वर्तमान में एस डी एम् चोह्टन पदस्थापित है।प्रख्यात राजस्थानी कवि लक्ष्मण सिंह रसवन्त के दामाद होने से कविता के क्षेत्र में कई राजस्थानी कवियों के संपर्क में आये और लेखन के क्षेत्र में आगे बढे।चालक सतसई,मीरा सतसई राजस्थानी में लिखी है।यशोधरा व् उर्मिला पर हिंदी खंडकाव्य लिखा है।अभी भगवान राम के जीवन पर पद लिख रहे है।