MayarBhasha राजस्‍थानी

यशोधरा द्वितीय पर्व

द्वितीय पर्व

खड़े भृत्य रहते सेवा में दृग इंगित पर ही दौड़ पडे
इक अवाज के ऊपर एक हजार आकर होते खड़े
भवन विशाल बहु अट्टालिका सारे अब सूने पड़े
कहाँ गए तजकर हमको मन विचार करते है बड़े
समय बड़ा प्रतिकूल हुआ या रूठा भाग्य है जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।11।।

 

 कला चौसठ सीखी तुमने शास्त्र ज्ञान भरपूर किया
ऐसा विषय नहीं है जग में जिसे न तुमने सीख लिया
नहीं पढ़ा वो वैराग्य मार्ग जिस पर तुमने गमन किया
कहाँ पाया वैराग्य ज्ञान अब इतना बतादो मुझे पिया
प्रवृति मार्ग के पथिक बताओ निवृति मग पद धरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।12।।

 

 राग रंग होते बहुतेरे साज बाज बजते दिनरात
नृत्य करती थिरक थिरक नृतका बहु कोमलगात
वास सुवास सुगंधित मलयाचल सी चलती वात
बजते मृदंग तुरी बहुतेरे गायन करते स्वर् सात
वैभव सारा पल में त्यागा उपवन त्यागा हराभरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।13।।

 

नहीं कभी सोचा सपने में जीवन ऐसे जाये बदल
अश्वारूढ़ होने वाले अब चलेंगे धरती पर पैदल
इतनी जल्दी कैसे प्रीतम छोड़ गये तुम राजमहल
सोच यही मन बार बार हो रहा है मेरा बेकल
रात अचानक त्याग चले कृत्य तुम्हारा है अखरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।14।।

 

करता कैसे खेल अनोखे बैठे बैठे तू हे विधाता
सोचता क्या है मनुज और फिर क्या हो जाता
उत्तंग शिखर पर चढ़ता चढ़ता कब गिर जाता
पूर्ण चंद्र के बाद देखो चंद्र नित  घटता  जाता
हो जाता पात्र रिक्त जो होता है जल से पूरा भरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।15।।

 

छल बैठा मुझको ही तू तो है बड़ा तू ही छलना
खिलने के मधुमास में कलिका शुरू हुई गलना
सुगम पथ अगम हुआ मुश्किल है इस पर चलना
तुषारपात हुआ हो तो मुश्किल है फिर फलना
असमय ही हे प्रीतम पराग पुष्प से है झरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।16।।

 

नृतन बिजली का होगा कैसे रोक सकूँगी मन को
चमक चांदनी में भी कैसे रोक सकूँ सूनेपन को
पवन झरोखा शीतल सा रिपु बनेगा मम तन का
पल पल होगा देना मुझको परिक्षण जीवन का
अभी सीखना बाकी है जीवन का यह ककहरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।17।।

 

 नभ बदली सी रही अकेली तट तल दोनों से दूर
आप बिना लेकिन जीने को जीवन भर हूँ मजबूर
कैसे सहूँ जगत झखोरे कोमल मन पर हो प्रहार
डरती मन ही मन अब तो कैसे होगा जीवन पार
बड़ा मुश्किल है रखना प्रीतम इच्छाओ पर पहरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।18।।

 

 अम्बर से टपकी बूँद बनी जो धरती को न छू पाई
अधबीच रही उसकी तरह जिसे मंजिल न मिल पाई
प्रश्न यही अब आन खड़ा उत्तर नहीं देता है दिखाई
कैसा क्षण आया है देखो मति मेरी है चकराई
बड़ा कठिन निर्णय लेकर छोड़ गए मुझे मझरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।19।।

 

धन्य समझती मैं हुई उस वीर की सहगामिनी
मातृभूमि हेतु जिसने निज प्राण की परवाह न की
धर्म रक्षा हेतु मिटे तन तो भी यह जीवन धन्य है
पर मार्ग जो चुना तुमने वो क्या नाथ तुम्हे वरण्य है
वीरवनीता बनूँगी  कैसे अब वंचित तुमने है करा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।20।।


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लेखक परिचय

श्री श्रवण सिंह राजावत
जयपुर जिले की फागी तहसील अंतर्गत डाबिच गांव में 1 जुलाई 1968 को जन्मे कवि श्रवण सिंह राजावत की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम डाबिच में ही हुई।हायर सेकेंडरी शिक्षा चाकसू से करने के बाद जयपुर के कामर्स कालेज से बी काम की डिग्री हासिल की।पंजाब नेशनल बैंक में लिपिक पद पर 7 वर्ष सेवा करने के बाद राजस्थान तहसीलदार सेवा में चयनित हुए।वहां से पदोन्नत होकर राजस्थान प्रशासनिक सेवा में वर्तमान में एस डी एम् चोह्टन पदस्थापित है।प्रख्यात राजस्थानी कवि लक्ष्मण सिंह रसवन्त के दामाद होने से कविता के क्षेत्र में कई राजस्थानी कवियों के संपर्क में आये और लेखन के क्षेत्र में आगे बढे।चालक सतसई,मीरा सतसई राजस्थानी में लिखी है।यशोधरा व् उर्मिला पर हिंदी खंडकाव्य लिखा है।अभी भगवान राम के जीवन पर पद लिख रहे है।