MayarBhasha राजस्‍थानी

यशोधरा अष्‍टादशम् पर्व

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अष्‍टादशम् पर्व

त्याग और तपस्या बिन नहीं मिलता है लक्ष्य कोई
किसी न किसी को तो करना होता यह कार्य कोई
चलता रहता कर्म सदा नित नूतन मार्ग पाने का
सोच करो न प्रिये तुम यह मेरे वन में चले जाने का
शुभ कार्य हित गया हूँ तुम हो हर्षित मन में जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।171।।

 

ध्रुव ने त्यागा बचपन अपना और सत्य की राह गही
कपिल मुनि सांख्य के खातिर त्याग कर दी यह मही
त्यागा जिन्होंने ममता धन अमर आज इतिहास रहा
वो ही करते नाम जगत में जिन्होंने यहां त्रास सहा
मैं भी चला हूँ उसी मार्ग मत ना रोको मुझे जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।172।।

 

त्याग दधीचि का देखो अस्थि तक का दान किया
देवो की रक्षा हेतु जीवन निज कुरबान किया
राजा हरिश्चंद्र से त्यागी बिके बीच बाजारों में
रानी पुत्र दास बने वो चंद्र से चमके सितारों में
इतिहास अमर है जगमग जिनकी जलती जोत जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।173।।

 

राम हुए अयोध्या में  जिन्होंने सीता का त्याग किया
रहे दृढ धर्म मर्यादा पर इक पत्नी का व्रत लिया
त्यागी हुए अनेक यहां किस किस का बखान करूँ
त्याग रहा सर्वोत्तम जग में इसका मैं सम्मान करूँ
उसी राह पर आज चला में इतना ध्यान रखो जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।174।।

 

त्याग जीवन की उच्च अवस्था बड़ी मुश्किल से मिलती
निम्न वस्तु त्याग किये बिन वस्तु महान नहीं मिलती
त्याग करो और नूतन पावो सृष्टि तो यह कहती
पीत पात तरु जब तजते कोंपल नव तब खिलती
मैंने भी किया वही तुम न मानो बुरा जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।175।।

 

त्याग बिना न मिला किसी को सच्ची यह बात रही
जिसने भी त्यागा जीवन में उनकी बड़ी औकात रही
संग्रह राग में फंसे रहे जो नहीं जगत में नाम रहा
नहीं मार्ग मिला उनको कितना ही अभिराम रहा
त्याग किया मैंने भी उसी राह पर चला जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।176।।

 

 मैं भी हूँ उस पथ का राही त्याग किया अपराध नहीं
त्यागा मैंने है उनको जिनसे मेरी ममता अगाध रही
यही जीवन में मेरे अब बस उसको पाने की साध रही
कष्ट भले अब पाऊं पहले जीवन गति निर्बाध रही
अब सबसे अलग रहकर करूँ मैं कुछ अलग जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।177।।

 

मानो मेरी बात सही अब नहीं राह वापस जाऊँ
अब तो केवल एक धारणा मैं मेरा लक्ष्य पाऊं
दुःख का कारण है क्या जगत में सबको यह समझाऊ
और जरा मृत्यु से कैसे बचो यह सभी को बतलाऊ
चाहता मई तुमसे मुझको दो वो अवसर जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।178।।

 

 तुम भी करो स्वीकार यही अब नियति  मानकर इसको
नहीं कौन है ऐसा जो छोड़ सके ऐसे ही किसको
जिसके लिए जीना था जीवन भूल जाये वो उसको
सत्य बात जो सामने है करो स्वीकार तुम उसको
नियति कुछ भी करवा दे कोई संदेह नहीं जरा
शाक्यमुनि अब यह कह्ते सुनो बात तुम यशोधरा।।179।।

 

 यही नियति थी देखो राजा आज बना जोगी
किसके पता नियति ने किस्मत कैसी लिखी होगी
अगर नियति में गर लिखा तो तुम भी साथ मेरा दोगी
नियति ही बना देती पल में भोगी को भी योगी
नियति नर की क्या हो पता नही चलता जरा

शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।180।।


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लेखक परिचय

श्री श्रवण सिंह राजावत
जयपुर जिले की फागी तहसील अंतर्गत डाबिच गांव में 1 जुलाई 1968 को जन्मे कवि श्रवण सिंह राजावत की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम डाबिच में ही हुई।हायर सेकेंडरी शिक्षा चाकसू से करने के बाद जयपुर के कामर्स कालेज से बी काम की डिग्री हासिल की।पंजाब नेशनल बैंक में लिपिक पद पर 7 वर्ष सेवा करने के बाद राजस्थान तहसीलदार सेवा में चयनित हुए।वहां से पदोन्नत होकर राजस्थान प्रशासनिक सेवा में वर्तमान में एस डी एम् चोह्टन पदस्थापित है।प्रख्यात राजस्थानी कवि लक्ष्मण सिंह रसवन्त के दामाद होने से कविता के क्षेत्र में कई राजस्थानी कवियों के संपर्क में आये और लेखन के क्षेत्र में आगे बढे।चालक सतसई,मीरा सतसई राजस्थानी में लिखी है।यशोधरा व् उर्मिला पर हिंदी खंडकाव्य लिखा है।अभी भगवान राम के जीवन पर पद लिख रहे है।