MayarBhasha राजस्‍थानी

यशोधरा सप्‍तदशम् पर्व

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

सप्‍तदशम् पर्व

सप्त वचन के ही खातिर मैंने व्रत जोग लिया
इनके सहारे ही मैं दीप्त करूँगा ज्ञान दिया
उपालम्भ तुमने दिया वो सत्य ही है जाना
कौन चाहता है यूँ चुपचाप महल से वन जाना
इसका भी कोई कारण है मैं बतलाऊं खरा खरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।161।।

 

 सदा सुहागिन रहने का ही तुम्हारा मनोरथ है
तुम रहो सुहागन इसीलिए मैंने चुना यह पथ है
मोक्ष पाकर मैं अमर अपने को कर सका अगर
तो मेरे संग में हे प्रिये होगा नाम तुम्हारा अमर
अमर होने की जो राह उस पर पग मैंने है धरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।162।।

 

 वैधव्य कैसे हो सकता है जब तक मैं हूँ भू पर
प्रश्न तुम्हारा सशंक यह उठा व्यर्थ ही तुम पर
गर्व विषय है यह तो कि मैं चला हूँ उस पथ
जिस पथ जाने वालो को रोक लेता है मन्मथ
मैं हूँ भाग्यवान जिसने दिया उसको पल में हरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।163।।

 

 मांग सिन्दूर चिन्ह सुहाग का न करना इनको तुम दूर
सदा अहिवात रहे अखण्ड दामन खुशियो से भरपूर
कष्ट क्लेश न सताये तुमको सुख पाओ तुम भरपूर
सदा रहो आनंद मग्न पास रहो या रहो तुम दूर
सुख सम्पति का भण्डार रहे हमेशा ही भरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।164।।

 

आत्म पुरुष दोनों ही शाश्वत फिर वियोग यह कैसा
नहीं होता परिवर्तन इनमे यह रहता हरदम वैसा
न कोई मिलता न कोई बिछुड़ता सत्य रहे हरदम ऐसा
फिर क्यों व्यर्थ तर्क कर कष्ट काय पावे कैसा
शाश्वत आनंद रूप एक है सुख दुःख न इनमे जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।165।।

 

नहीं पृथक हो तुम मुझसे आत्म रूप में साथ सदा
अज्ञान रूप से हुई विलग तुम ज्ञान रूप एक साथ सदा
मैं हूँ साथ तुम्हारे सुनलो विरह वियोग असत्य रहा
साथ हमेशा ही मेरे हो यह सत्य मैंने है कहा
फिर किस कारण हो व्यथित मुझको बतलाओ जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।166।।

 

 तजदो तुम यह आशंका अनर्थ नहीं अब होगा
मेरे द्वारा किये कर्म से सकल जगत सफल होगा
मैं न चला स्वयं मन से यह प्रकृति स्वयं ले आई
जो भी मिलेगा सब को दूंगा यही सही है सच्चाई
अकारण की चिंता तज के धीरज तुम धरो जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।167।।

 

सबका कल्याण करने को ही तुम्हे तजा हे कल्याणी
क्षमा चाहता हूँ तुमसे यदि कहदी हो कटु वाणी
त्याग तुम्हारा किया न मैंने नहीं कभी कर सकता
मैं केवल हुआ पृथक तुमसे जिस कारण मत पछता
आलोकित होगा मार्ग सभी का धीरज रखो  न जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।168।।

 

अहर्निश अब रहूँगा मैं उस कारण की तलाश में
जिसके कारण जीते जी लोग बने है लाश से
मैं दूंगा उनको नव जीवन जी सके नव उल्लास में
दुःख की तोड़ जंजीर सुख पूर्वक रहे विश्वास से
इसी साधना के खातिर चाहता हूँ सहयोग जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।169।।

 

 है कर्म वो ही उचित जिससे जग कल्याण हो
फिर भले उसके लिए तजने पड़े निज प्राण हो
मिलेगी दुःख से जब मुक्ति जन का मंगल गान होगा
पशुतुल्य जीवन में फिर मनुष्य का सम्मान होगा
हाँ यद्यपि सबको लगे मेरा कदम अचरज भरा

शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।170।।


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लेखक परिचय

श्री श्रवण सिंह राजावत
जयपुर जिले की फागी तहसील अंतर्गत डाबिच गांव में 1 जुलाई 1968 को जन्मे कवि श्रवण सिंह राजावत की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम डाबिच में ही हुई।हायर सेकेंडरी शिक्षा चाकसू से करने के बाद जयपुर के कामर्स कालेज से बी काम की डिग्री हासिल की।पंजाब नेशनल बैंक में लिपिक पद पर 7 वर्ष सेवा करने के बाद राजस्थान तहसीलदार सेवा में चयनित हुए।वहां से पदोन्नत होकर राजस्थान प्रशासनिक सेवा में वर्तमान में एस डी एम् चोह्टन पदस्थापित है।प्रख्यात राजस्थानी कवि लक्ष्मण सिंह रसवन्त के दामाद होने से कविता के क्षेत्र में कई राजस्थानी कवियों के संपर्क में आये और लेखन के क्षेत्र में आगे बढे।चालक सतसई,मीरा सतसई राजस्थानी में लिखी है।यशोधरा व् उर्मिला पर हिंदी खंडकाव्य लिखा है।अभी भगवान राम के जीवन पर पद लिख रहे है।