MayarBhasha राजस्‍थानी

यशोधरा पंचदशम् पर्व

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

पंचदशम् पर्व

लगी ठेस हृदय में देखो क्या सत्य वीभत्स है बड़ा
तीर बनकर शब्द जरा का मेरे हृदय में आन अड़ा
वसंत अनेक देखे पर अभी तक न इससे पाला पड़ा
विस्मित होकर देख रहा था मैं उस नर को खड़ा खड़ा
आज परिचय हुआ था मेरा कहते जिसको लोग जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।141।।

 

 रथ पर चढ़ा उद्विग्न मन ले थोडा आगे ही था चला
दृश्य एक अद्भुत देखा समूह एक आता था चला
चार पुरुष लिए कंधे पर एक ठठरी का ठेला
पीछे पीछे चला आ रहा था लोगो का भारी मेला
यह क्या आया पूछा मैंने सारथी तुम बतलाओ जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।142।।

 

शब्द राम नाम सत्य सुना मन हुआ फिर अधीर
सत्य अगर नाम तो फिर क्यों न होता गंभीर
सारथी ने कहा अरथी जा रही है श्मशान को
संग सब परिवार जन साथी है प्रस्थान को
यह मृत्यु है प्रभु जो होती आई है इस धरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।143।।

 

 मृत्यु यह क्या होती है नाम न पहले मैंने कभी सुना
तुमने बताया सारथी यह क्यों होती देवो सुना
जिस प्रकार होता जन्म धरती पर जीव का आगमन
वैसे ही होती है मृत्यु जीव का धरती से गमन
मृत्यु है अटल सत्य वचन मेरा है यह प्रभु खरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।144।।

 

 सबकी ही होती है मृत्यु जो भी लेता जन्म यहाँ
जीवन पूर्ण होने पर अवश्य जाना होता है वहाँ
राजा रंक सभी बराबर उस मंजिल के है राही
एक दिन मृत्यु है निश्चित रुक सकती है ना ही
इसीलिए तो यह धरती मृत्युलोक कहलाती जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।145।।

 

क्या एक दिन मुझको भी करना होगा मृत्यु का वरण
सब कुछ तज कर लेनी होगी मुझे उस काल की शरण
मिट जायेगा क्या मेरा भी इस जगत से अस्तित्व
क्या बिखर जायेंगे मेरे ये शरीर के पञ्च तत्व
अहा क्या यह ही होगा मेरे साथ में भी जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।146।।

 

क्या तुम भी होगी विलग मुझसे उस दिन प्रिये
क्या वैधव्य ही बनेगा तुम्हारा सुहाग हे प्रिये
क्या यही है सत्य फिर अब लौट चलो हे सारथी
जब न चिरकाल तक रहेगा अगर यह महारथी
तो फिर क्या करेगा घूमकर अब यह धरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।147।।

 

मैंने अंतर में पहचान स्वयं ही जीर्ण शीर्ण हुआ
जरा रूप में देखा तुमको दिल पर आघात हुआ
मानो मेरे मन उपवन पर जैसे तुषारापात हुआ
क्या ऐसे ही होगा नष्ट जीवन उपवन सा हराभरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।148।।

 

बीच मार्ग से मैं लौटा सीधा राजमहल के भीतर
वो दोनों दृश्य घूम रहे थे मेरे मन मस्तिष्क के भीतर
क्षीण कर देगी तन को ये जरा कुछ काल भीतर
और एक दिन यह मृत्यु ले लेगी मेरे प्राण पर
ए दोनों ही कितने वीभत्स मैं प्रथम बार था डरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।149।।

 

नहीं हो काश जरा मृत्यु तो कैसा हो यह संसार
इन दोनों के चक्कर में त्रस्त है जग के नर नार
यत्न कोई तो होगा इस जिससे पावे इनसे पार
यही बात कौंध रही थी मेरे मस्तक बारम्बार
करूँ उपाय क्या ऐसा नहीं आवे मृत्यु न जरा

शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।150।।


***

 

लेखक परिचय

श्री श्रवण सिंह राजावत
जयपुर जिले की फागी तहसील अंतर्गत डाबिच गांव में 1 जुलाई 1968 को जन्मे कवि श्रवण सिंह राजावत की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम डाबिच में ही हुई।हायर सेकेंडरी शिक्षा चाकसू से करने के बाद जयपुर के कामर्स कालेज से बी काम की डिग्री हासिल की।पंजाब नेशनल बैंक में लिपिक पद पर 7 वर्ष सेवा करने के बाद राजस्थान तहसीलदार सेवा में चयनित हुए।वहां से पदोन्नत होकर राजस्थान प्रशासनिक सेवा में वर्तमान में एस डी एम् चोह्टन पदस्थापित है।प्रख्यात राजस्थानी कवि लक्ष्मण सिंह रसवन्त के दामाद होने से कविता के क्षेत्र में कई राजस्थानी कवियों के संपर्क में आये और लेखन के क्षेत्र में आगे बढे।चालक सतसई,मीरा सतसई राजस्थानी में लिखी है।यशोधरा व् उर्मिला पर हिंदी खंडकाव्य लिखा है।अभी भगवान राम के जीवन पर पद लिख रहे है।