MayarBhasha राजस्‍थानी

यशोधरा चतुदर्शम् पर्व

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

चतुदर्शम् पर्व

दीपक लौ दिन रात जले इक लौ रहती दिखाई
हर पल आती हर पल जाती लौ पल भर में बदलाइ
ऐसे ही यह जीवन हर पल यौवन हर पल जरता
फिर किस कारन वानप्रस्थ की मैं प्रतीक्षा करता
प्रतीक्षा मैं समय अमूल्य बीत जाता मेरा जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।131।।

 

 मैं न रुक पाया पल भी जब देखी जग की सच्चाई
साथ नहीं कोई देता छोड़ देती साथ निज परछाई
वो दृश्य देखा था मैंने जो कभी न दिया दिखलाई
रथ सवार होकर जब निकला संध्या बेला जब आई
यकायक उस राजमार्ग पर दृश्य देखा अचरज भरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।132।।

 

 कृशकाय मात्र अस्थि पिंजर आकृति एक दीख पड़ी
कमर झुकी थी उसकी लिए हुए था निज हाथ झड़ी
झुर्रियां पड़ी सारे तन पे आँखे गड्डो में थी गड़ी
लार टपकती मुख से और खांस रहा घडी घडी
ऐसा भी कोई नर होता है देख चकित मैं विस्मयभरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।133।।

 

रोक रहे सैनिक उसको राजमार्ग तक जा न सके
क्या था कारण पता नहीं झलक कुमार की पा न सके
सैनिको के कर में जकड़ा विनय कर रहा कर जोड़
नजर पड़ी जब मेरी उत्रा नीचे मैं तब रथ छोड़
क्या है कौन है यह तुम बतलाओ सत्य जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।134।।

 

मैंने कहा कौन है यह क्यों पकड़ा है इसको
झुकी कमर दीन हीन सा ढूंढ रहा है किसको
किसने किया हांल  है ऐसा यह दुर्बल हुआ कैसे
ज्योति इसकी मंद हुई नेत्र बंद से हुए कैसे
कहाँ से आया यह मानव कौन सी इसकी है धरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।135।।

 

 किया हाल किसने इसका सैनिक हमको बतलायो
टेढ़ी कमर हुई यह कैसी भेद हमें यह समझाओ
नेत्र ज्योति मंद हुई और दुर्बल गात कहो कैसे
गर्दन हिलती बार बार यह तेज ज्वर आया जैसे
उत्तर दो तुम प्रश्न हमारा शीघ्र बतलाना जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।136।।

 

मैंने नहीं देखा पहले यह कहाँ से आया यहाँ
इस कैसा मानव यह रहता अब तक था कहाँ
मानव भी ऐसा होता है प्रश्न किया था जब मैंने
क्या उत्तर देते वो यह मानव देखा नहीं मैंने
मैंने जीवन यौवन देखा न देखी कभी जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।137।।

 

 अरे ऐसे ही हो जाता क्या मानव भी एक दिन देखो
उन्नत भाल की गर्दन झुकती एसा ए जीवन देखो
कुरूप चेहरा हो जाता आखिर क्या इसका कारण
बोलो तुम मुझे बताओ हुआ हाल यह किस कारण
बोले कर जोड़ सभी नाथ कहते इसे जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।138।।

 

 जरा होती है क्या कभी न सुना यह नाम कभी
है यह क्या चीज सखे मुझको बतलाओ बात अभी
क्या जरा सबको आती और करती हाल सबका ऐसे
यह मानव भी था कभी अति युवा तो मेरे जैसे
क्या मुझको भी इक दिन आएगी क्या ऐसी जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।139।।

 

 सत्य यही है एक दिन आती है सबको यह जरा
नहीं अछूता है कोई इससे यही है एक सत्य खरा
सुना सभी को आएगी मेरा अंतर एकदम था डरा
मुझे भी घेर लेगी क्या यह कठिन क्रूर कुरूप जरा
फिर आया ख्याल तुम्हारा होगी ऐसे ही यशोधरा

शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।140।।


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लेखक परिचय

श्री श्रवण सिंह राजावत
जयपुर जिले की फागी तहसील अंतर्गत डाबिच गांव में 1 जुलाई 1968 को जन्मे कवि श्रवण सिंह राजावत की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम डाबिच में ही हुई।हायर सेकेंडरी शिक्षा चाकसू से करने के बाद जयपुर के कामर्स कालेज से बी काम की डिग्री हासिल की।पंजाब नेशनल बैंक में लिपिक पद पर 7 वर्ष सेवा करने के बाद राजस्थान तहसीलदार सेवा में चयनित हुए।वहां से पदोन्नत होकर राजस्थान प्रशासनिक सेवा में वर्तमान में एस डी एम् चोह्टन पदस्थापित है।प्रख्यात राजस्थानी कवि लक्ष्मण सिंह रसवन्त के दामाद होने से कविता के क्षेत्र में कई राजस्थानी कवियों के संपर्क में आये और लेखन के क्षेत्र में आगे बढे।चालक सतसई,मीरा सतसई राजस्थानी में लिखी है।यशोधरा व् उर्मिला पर हिंदी खंडकाव्य लिखा है।अभी भगवान राम के जीवन पर पद लिख रहे है।