MayarBhasha राजस्‍थानी

यशोधरा त्रयोदशम् पर्व

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

त्रयोदशम् पर्व

मरना देश हित में माना कर्म महान है बड़ा
पर बिन पाये ही क्यों मरना प्रश्न आन खड़ा
मन को मार तन सहारे जानूंगा उस  सत्य को
फिर क्यों करती लगाव जान के इस मर्त्य को
जीवन सत्य नहीं है मरना इसको समझो जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।121।।

 

अभ्यास हमें है समरांगण का नहीं वन प्रस्थान कभी
भय लगता है हमको इससे  जाना चाहे न कभी
असि कर में अच्छी लगती बुरी कमंडल अरु माला
सत्य देखने की नहीं जरुरत आँखों पर छाया जाला
जाल हटाकर भी मानव एक बार देखे जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।122।।

 

 रण मैं मरता निज देश हित अब तो विश्व कल्याण करूँ
किस कारणहोता है दुःख कारण इसका खाज धरूँ
समस्त लोक की रक्षा होगी इतना तो समझो जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।123।।

 

 त्याग हमेशा ही रहा है क्षत्रिय कुल का धर्म
जीवन त्याग सदा करना यही रहा है कर्म
मैंने तो गृह ही त्याग जो क्षात्र धर्म के है अनकूल
पुष्प वाटिका को तजके मार्ग गहा कंटक शूल
त्याग करना रीत हमारी इसमें नहीं कुछ भी बुरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।124।।

 

प्राण त्यागना ही जहां पर सर्वश्रेष्ठ है कहलाता
उस कुल में गृह त्याग को कौन नर गिन पाता
त्याग बिना नहीं होती प्राप्ति सिद्धांत तुम्हे समझाता
त्यागा गृह ही केवल फिर क्यों मन पछताता
कर्म किया वर्णानुकूल मैंने गलत नहीं है जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।125।।

 

वरण करना मृत्यु का युद्ध भूमि में ही रहा
अब तलक़ तो हर किसी ने उसे ही क्षत्रिय कहा
पर बिना युद्ध जो तजे अपने भोगी जीवन को
और जो मर डाले इस भटकते जो मन को
उसे भी क्षत्रिय ही समझना चाहिए जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।126।।

 

कार्य क्षत्रिय का किया सत्य बात मानो यही
सन्यास मार्ग में जो चला वो भी क्षत्रिय है सही
मैंने भी यह मार्ग चुना वो नहीं अपराध है
त्यागा तुम्हे भी उसी तरह प्रेम भले अगाध है
इक पल में बदला सभी यही है सच बिलकुल खरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।127।।

 

मैंने धर्म अपना निभाया सत्य वचन है यही
मार्ग पकड़ा है जो मैंने पथ वही  है सही
न पथ गलत न मत गलत फिर गलती क्या हुई
अगर गलती मान भी ले तो सही बात खातिर हुई
इक गलती से भी अगर मिले सही जो राह जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।128।।

 

त्याग किया मैंने यौवन में असमय ये बात रही
जीवन एक चक्र  है कहाँ अंत कहाँ शुरुआत रही
हरपल यौवन हरपल वृद्धता साथ साथ ये रही
मैंने त्यागा नहीं असमय समय आपने बात कही
उपालम्भ मिथ्या है यह सोच समझ कहो जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।129।।

 

 नित पात गिरे नित नव पल्लव विकसित होते
सुख दुःख नहीं करते प्रतीक्षा आते है जगते सोते
फिर कैसे यौवन थिर रहता नित जाता नित आता
वानप्रस्थ एक व्यवस्था जिसे मानव रहा है निभाता
वरना चाहे जब मनुज सन्यास पथ पर पग धरा

शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।130।।


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लेखक परिचय

श्री श्रवण सिंह राजावत
जयपुर जिले की फागी तहसील अंतर्गत डाबिच गांव में 1 जुलाई 1968 को जन्मे कवि श्रवण सिंह राजावत की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम डाबिच में ही हुई।हायर सेकेंडरी शिक्षा चाकसू से करने के बाद जयपुर के कामर्स कालेज से बी काम की डिग्री हासिल की।पंजाब नेशनल बैंक में लिपिक पद पर 7 वर्ष सेवा करने के बाद राजस्थान तहसीलदार सेवा में चयनित हुए।वहां से पदोन्नत होकर राजस्थान प्रशासनिक सेवा में वर्तमान में एस डी एम् चोह्टन पदस्थापित है।प्रख्यात राजस्थानी कवि लक्ष्मण सिंह रसवन्त के दामाद होने से कविता के क्षेत्र में कई राजस्थानी कवियों के संपर्क में आये और लेखन के क्षेत्र में आगे बढे।चालक सतसई,मीरा सतसई राजस्थानी में लिखी है।यशोधरा व् उर्मिला पर हिंदी खंडकाव्य लिखा है।अभी भगवान राम के जीवन पर पद लिख रहे है।