MayarBhasha राजस्‍थानी

यशोधरा द्वादशम् पर्व

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

द्वादशम् पर्व

एक बार बचपन में मैंने एक हंस घायल देखा
जीने की उसकी उत्कण्ठा जीने का कायल देखा
तीर लगा था उसके उर में तत्काल निकाला था मैंने
घाव बहुत हो गया था लेकिन तीर बहुत होते पैने
तीर मारा था जिसने वो लेने आया उसको जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।111।।

 

 बात गयी राजा के सम्मुख मैं भी बुलाया गया
हंस का मालिक कौन होगा न्याय यह सुनाया गया
मारा तीर वो मालिक इसका ऐसा था बतलाया गया
तब उठ बोला मैं राजा से मालिक मैं हूँ बतलाया गया
मारने वाले से है बड़ा जिसने बचाया है जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।112।।

 

मैंने बचाया हंस तभी अंतर मेरा अकुलाया
पर जाने किस कारण मुझे गया बहलाया
मूल स्वरुप मेरा छिना आत्म मेरा रहा गुप्त
मेरी सद इच्छाये सारी पड़ी रह गई सुप्त
कौन जगाता उनको बोलो मेरा अंतस था मरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।113।।

 

 न पहचाना था मुझको या फिर ठुकराया मुझको
मेरे अंतस को किस कारण किसने झुठलाया उसको
दया करुणा का किया हनन भोग विलास में डूबा
मेरा अंतर मार दिया मैं भूल गया मनसूबा
ऐसी बनी मेरे संग में गया हृदय मेरा पथरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।114।।

 

बचपन मेरा निर्मल था पर पिता डरे थे जोतिष से
कही सन्यासी न बन जाये वो लगे जोड़ने सामिष से
मृगया मधु के चक्कर में जीवन मेरा  था छीना
नर्तकियां नाचती लचक लचक पड़ा मधुरस पीना
कैसे होती हत्याए यह देखी मेंने प्रत्यक्ष जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।115।।

 

मन मारा था मेरा या मार दिया ही था मुझको
गर साथ दिया होता तो आज न तरसाता  तुझको
आत्मज्ञान पर किया अँधेरा भय एक के ही कारण
कही छोड़ न दूँ राजमहल सोच यही था अकारण
मुझे न बांधते बंधन में तो आज में प् लेता परा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।116।।

 

बाहर की वो चमक चांदनी मुझे नहीं लुभाती थी
अंतर बैठी वो चिंगारी कभी फूटना चाहती थी
अग्नि पर शीतल राख साम सारे भोग लपेटे थे
मुझ को कही वैराग्य न हो इसी लिए समेटे थे
भोग संसाधन डाले इतने कमी रखी तिल न जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।117।।

 

मेरे अंदर ही अंदर में सुलग रही चिंगारी थी
इक दिन तो जाना ही था मुझको अब मेरी बारी थी
अर्धनिशा को ही जब मन मेरा उद्विग्न हुआ
जो देखा मैंने दिवस में उससे ही सारा विघ्न हुआ
तुम्हे न पता क्या देखा अगर बताता मैं जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।118।।

 

रही बात युद्धभूमि की धर्मयुद्ध सन्यास मेरा
अंदर ही चलते है तरकस शत्रु दल का घेरा
वहां रक्त की धार चले पर यहाँ रक्त बदल जाये
जो रहा हिंसक जीवन भर वो अहिंसक बन जाये
अब हाथ लिया धर्म हेतु अस्त्र प्रण ही है मेरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।119।।

 

 हँसते हँसते भेज देती है वीरो को समरांगण में
पर सन्यास की बात सुनकर रो देती आँगन में
युद्ध में तो जाता शरीर पर उलटी रीत यहाँ
तन रहता है जीवित पर मन मर जाता वहाँ
मन का मरना तन का जीना है मुश्किल जरा

शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।120।।


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लेखक परिचय

श्री श्रवण सिंह राजावत
जयपुर जिले की फागी तहसील अंतर्गत डाबिच गांव में 1 जुलाई 1968 को जन्मे कवि श्रवण सिंह राजावत की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम डाबिच में ही हुई।हायर सेकेंडरी शिक्षा चाकसू से करने के बाद जयपुर के कामर्स कालेज से बी काम की डिग्री हासिल की।पंजाब नेशनल बैंक में लिपिक पद पर 7 वर्ष सेवा करने के बाद राजस्थान तहसीलदार सेवा में चयनित हुए।वहां से पदोन्नत होकर राजस्थान प्रशासनिक सेवा में वर्तमान में एस डी एम् चोह्टन पदस्थापित है।प्रख्यात राजस्थानी कवि लक्ष्मण सिंह रसवन्त के दामाद होने से कविता के क्षेत्र में कई राजस्थानी कवियों के संपर्क में आये और लेखन के क्षेत्र में आगे बढे।चालक सतसई,मीरा सतसई राजस्थानी में लिखी है।यशोधरा व् उर्मिला पर हिंदी खंडकाव्य लिखा है।अभी भगवान राम के जीवन पर पद लिख रहे है।