MayarBhasha राजस्‍थानी

यशोधरा एकादशम् पर्व

 

 

 

 

 

 

एकादशम् पर्व

किया विवश तुमने मुझको लगाई प्रश्नो की झड़ी
अब उत्तर भी मैं दूंगा जब पूछ रही तुम खड़ी खड़ी
एक एक उत्तर मैं दूंगा जब तुम सुनने को अड़ी
बिन उत्तर तुम व्याकुल होगी बीतेगी ना एक घडी
उत्तर जग के मैं नहीं देता पर तुमने मजबूर करा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।101।।

 

 मैं लुम्बिनी का राजकुमार था फूलो में पला
नहीं कोई कमी थी मेरे इस जीवन  में भला
मैं बढ़ा  नित जिस तरह बढ़ती है ये चन्द्रकला
पुष्प सजी धरा मखमल पर ही था मैं चला
मैं करता राज तब वहां  वीर भोग्या वसुंधरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।102।।

 

हाँ मैने ही भोगे सुख सभी चिंता दुःख जाना नहीं
पीड़ा क्या होती है यह मैंने कभी पहचाना ही नहीं
राजमहल बाग बगीचे में ही जीवन सारा बीत गया
क्या लक्ष्य था जीवन का शनैः शनैः वो रीत गया
बूँद बूँद में ख़ाली हुआ  अब जीवन रस जो था भरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।103। ।

 

सकल जगत के सुख साधन मेरे तो करतलगत थे
लोग देश के जहाँ भी जाता हरदम वो स्वागतरत थे
ऐश्वर्य सम्पदा अतुल जहाँ सभी काम में अनुरत थे
नहीं कभी अभाव  किसी का सभी पदार्थ हस्तगत थे
ऐसे सुखी जीवन को कौन छोड़ सकता है जरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।104।।

 

 कब सूर्य उदित होता नभ् में और कब यह अस्त हुआ
भान कभी इसका न किया मैं भोग विलास में मस्त हुआ
साज बाज नृत्य और गायन सदा इन्ही में व्यस्त हुआ
क्या है दुनिया में कोई सच जान कभी न त्रस्त हुआ
न जाना न जानने दिया ऐसा पंगु मुझको है करा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।105।।

 

 स्वर्ण प्रसाद में मैं जन्म स्वर्ण पर्यंक पर सोया
स्वर्ण व्यजन से वात ग्रहण की स्वर्ण ही मैं गोया
स्वर्ण की चकाचौंध थी ऐसी निज आत्म को खोया
कौन हूँ मैं क्यों जन्मा बोध कभी न यह होया
स्वर्ण मूर्ति सा मैं बन बैठा कैसा जुर्म मैंने भरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।106।।

 

 दास दासी नित सेवा करते नहीं श्रम को है जाना
स्वेद बिंदु कहते किसको कभी नहीं है पहचाना
सभी पदार्थ सर्व सुलभ है ऐसा था मैंने माना
निर्धनता  होती कैसी है शब्द से भी नहीं जाना
एक अलग दुनिया में पला जैसे छल से मैं घिरा
शाक्यमुनि  अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।107।।

 

सीखे मैंने अस्त्र शस्त्र युद्ध कला सारी सीखी
वेद पुराण पढ़े सब सारे विद्वता सारी सीखी
छंद शस्त्र ज्योतिष समेत चौसठ कलाये सीखी
निति दर्शन इतिहास अर्थशास्त्र सब है सीखी
पर न सीखा जो था सीखना उससे रहा मैं परा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।108।।

 

 सीख चुका मैं सब विद्याए मैं बड़ा विद्वान बना
युद्ध निपुण बना योद्धा देख गर्व से सीना तना
आखेट मृगया जब मैं करता ख़ुशी मन होता अपना
पर वास्तव में यह सब तो था केवल एक सपना
छलक जाता है वो बर्तन जो न हो पूरा भरा
शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।109।।

 

ज्ञान जगत का सीखा मैंने जी सकूँ मैं जीवन को
राज करूँ भू मंडल पर और पालू निज प्रजाजन को
यही सभी करते है यहाँ नाम लिखे इतिहासों में
कर्म करके बंधता जाता है बंधन के पाशो में
मैं भी बंध ही चूका था लेकिन भाग्य जागा जरा

शाक्यमुनि अब यह कहते सुनो बात तुम यशोधरा।।110।।


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लेखक परिचय

श्री श्रवण सिंह राजावत
जयपुर जिले की फागी तहसील अंतर्गत डाबिच गांव में 1 जुलाई 1968 को जन्मे कवि श्रवण सिंह राजावत की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम डाबिच में ही हुई।हायर सेकेंडरी शिक्षा चाकसू से करने के बाद जयपुर के कामर्स कालेज से बी काम की डिग्री हासिल की।पंजाब नेशनल बैंक में लिपिक पद पर 7 वर्ष सेवा करने के बाद राजस्थान तहसीलदार सेवा में चयनित हुए।वहां से पदोन्नत होकर राजस्थान प्रशासनिक सेवा में वर्तमान में एस डी एम् चोह्टन पदस्थापित है।प्रख्यात राजस्थानी कवि लक्ष्मण सिंह रसवन्त के दामाद होने से कविता के क्षेत्र में कई राजस्थानी कवियों के संपर्क में आये और लेखन के क्षेत्र में आगे बढे।चालक सतसई,मीरा सतसई राजस्थानी में लिखी है।यशोधरा व् उर्मिला पर हिंदी खंडकाव्य लिखा है।अभी भगवान राम के जीवन पर पद लिख रहे है।