MayarBhasha राजस्‍थानी

यशोधरा दशम् पर्व

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

दशम् पर्व

या मेरा प्रारब्ध यही है पतिहीन हुई मैं पल में
खुशियो की जगह आज ये दुःख आये है आँचल में
अहोभाग्य था मेरा यह जो वरण आप ने ही किया
पर दुर्भाग्य नहीं जाना यों छोड़ चलोगे मुझे पिया
दो दिन की खुशिया नहीं देखी दुःख वज्र टूट परा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।91।।

 

अब करना विनती तुमसे व्यर्थ प्रयत्न है मेरा
सुनकर ह्रदय नहीं लगता है अब बदलेगा तेरा
नहीं लौट आओगे अब तुम डाल चुके वन में डेरा
नहीं सुनी तुमने एक भी कितना है मैंने टेरा
एक बार भी आ जाओ ध्यान अगर करते जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।92।।

 

वाक्पटु भी हो तुम यह मैंने सब जाना था
ज्ञान विज्ञानं साहित्य सभी का बड़ा खजाना था
तर्क वितर्क में उलझे  बिना उत्तर मुझे पाना था
सत्य कहो वो बात थी क्या जिसने किया रवाना था
अगर कोई मेरी गलती हो वो भी बतलाना जरा

कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।93।।


क्या उत्तर तुम दे पाओगे प्रश्न किये जो गहरे
शास्त्र वेद सभी पढे और विद्वान तुम ठहरे
मौन नहीं है कोई उत्तर यह मत लेना तुम धार
बोलो जरा बोलो तुम हे शाक्य मुनि राजकुमार
दोगे अगर जवाब प्रश्न का तो मिले धीरज जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।94।।

 

हो सकता है किसी बात से चोट तुम्हे पहुंची होगी
या हास्य उपहास बहाने बात कोई चुभी होगी
बात बात में बात अगर ऐसी कोई कहदी होगी
या फिर कोई बात नाथ तिल का ताड बनी होगी
क्षमा मांगती हूँ तुमसे अगर गलती हुई हो जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।95।।

 

नहीं कोई संकेत किया क्या बात हुई ऐसी स्वामी
मैंने कभी मना किया ना हमेशा भरी है हामी
कभी कटु वचन  न निकले जबसे बाँह मैंने थामी
रूठ कभी तुम नहीं सकते ज्ञानी हो तुम नामी
फिर जाने किस कारण छोड़ चले जन्म धरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।96।।

 

तुम न बताओगे मुझको ग्लानि में मैं रहूँ डूबी
अपराध क्षमा तुम करते हो यह तुम्हारी है खूबी
क्षमाशील तो आप सदा ध्यान नहीं कभी करते
कितना ही हो अपराध बड़ा क्षमा नाथ तुम करते
कौन बताएगा मुझको गुनाह क्या मैंने है करा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।97।।

 

कर जोर कहूँ नाथ तुम्हे कारण तो वो बतलाओ
एक बार बोलदो अपने मुख से ना मुझको तरसाओ
मैं क्षमा मांगती हूँ तुमसे कटु वचन मैंने कहे
मेरे व्यंग्य बाणों के प्रहार आपने है सहे
पर बिन बोले चैन नहीं दो शब्द नाथ बोलो जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।98।।

 

शाक्यमुनि मेरी शंका का पास तुम्हारे ही उत्तर
तुम्ही बताओ कारण तो मैं हो जाऊँ निरुत्तर
बोलो बोलो अब तो बोलो पूछ रही में बारम्बार
कैसे बन बैठे योगी तुम महलो के राजकुमार
बिन उत्तर मैं न मानूँगी उत्तर तो देवो जरा
कौन  समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।99।।

 

 अंतिम बार यही विनती मुझो बताओ बात वही
जिस कारण से त्याग किया तुमने निज जन्म मही
मिले तुम्हे मुक्ति भले मैं न कभी रोकूँगी तुम्हे
पर मेरे प्रश्नो का तो अब देना होगा उत्तर तुम्हे
प्रश्न नहीं है ज्यादा टेढ़े उत्तर तो बतलाओ जरा

कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।100।।


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लेखक परिचय

श्री श्रवण सिंह राजावत
जयपुर जिले की फागी तहसील अंतर्गत डाबिच गांव में 1 जुलाई 1968 को जन्मे कवि श्रवण सिंह राजावत की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम डाबिच में ही हुई।हायर सेकेंडरी शिक्षा चाकसू से करने के बाद जयपुर के कामर्स कालेज से बी काम की डिग्री हासिल की।पंजाब नेशनल बैंक में लिपिक पद पर 7 वर्ष सेवा करने के बाद राजस्थान तहसीलदार सेवा में चयनित हुए।वहां से पदोन्नत होकर राजस्थान प्रशासनिक सेवा में वर्तमान में एस डी एम् चोह्टन पदस्थापित है।प्रख्यात राजस्थानी कवि लक्ष्मण सिंह रसवन्त के दामाद होने से कविता के क्षेत्र में कई राजस्थानी कवियों के संपर्क में आये और लेखन के क्षेत्र में आगे बढे।चालक सतसई,मीरा सतसई राजस्थानी में लिखी है।यशोधरा व् उर्मिला पर हिंदी खंडकाव्य लिखा है।अभी भगवान राम के जीवन पर पद लिख रहे है।