MayarBhasha राजस्‍थानी

यशोधरा प्रथम पर्व

प्रथम पर्व

कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा
अपलक बैठी आज निहारे पथ प्रीतम का देवनरा
फूलो की सेजो पर सोई  कभी सूर्य रश्मि छू न सकी
आज सूर्य मम अस्त हुआ रहती मैं बहकी बहकी
मन वीणा के तार को झंकृत विरह वेदना कर देती
बिन बादर के देखो जैसे सूख रही कृषक खेती
या फिर कोई शीत ऋतु में जैसे हो पाला है परा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।1।।

 

 पा लोगे तुम मोक्ष यदि भी ऐसा क्या हो जाएगा
विस्मृत कर न पाये तुमको स्मरण हमें रुलाएगा
विरह व्याल बनकर के हरदम हमें डस जायेगा
इक इक पल बिता तुम संग हमको बहुत रुलाएगा
टूट चुकी मैं अंदर से रहा ह्रदय अब थरथरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।2।।

 

 अब पूर्ण होंगे कैसे वो स्वप्न जो सजाये है मैंने
अपूर्ण छोड़ कर चले गए छल बहुत किया तेने
रात अँधेरी दुर्गम पथ पर चले गए क्यों सन्यासी
गलती ऐसी हुई क्या मुझसे बन बैठे तुम वनवासी
रोक नहीं लेती मैं तुमको बता तो जाते मुझको ज़रा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।3।।

 

विहंग सागर सी हूँ मैं तो जल जहाज तुम ही स्वामी
बिन जहाज कहाँ जा ठहरूँ इतना तो सोचो स्वामी
अब अहर्निश उड़ती व्योम में आश एक मन में थामी
कब मिलेगा कोई आश्रय  या  मैं रहूंगी नभगामी
जीवन दीर्घ कैसे बीतेगा सोच यही मन डरा डरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।4।।

 

 विवशता मेरी राहुल छोड़कर अब जाऊँ कहाँ
तन तपता महल झरोखो में मन रहता है वहाँ
मैं तो रहना चाहती प्रतिपल है मेरे प्रीतम जहाँ
सोच नहीं पायी अभी कि मैं रहूँ यहाँ या वहाँ
दुविधा बीच खड़ी मैं देखो किस और जाऊँ मैं जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।5।।

 

मन व्याकुल अधीर अति धीरज कैसे धार रहे
नहीं समझत है यह चंचल हर बार तुम्हारे साथ लहे
तन व्यथित तुम बिन स्वामी हालत अपनी किसे कहे
श्रावण मास भये दृग मेरे अनवरत नैन जलधार बहे
उमड़ उमड़ आवत अश्रुजल संग बहा मम कजरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।6।।

 

 एक पुत्र है मेरा स्नेह से सींचती जिसको
अपर है प्रिय मम प्रियतम छोड़ दूँ किसको
एक मम शोणित से सृजित जीव है जिसको
अपर हित मैं बहा देवूं निज शोणित निर्झर को
एक हैं एक से ऊँचा दुहुँ मम नैन बीच कजरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।7।।

 

तुम तो रसभोगी बड़े निपुण कैसे भूल गए उसको
सहगामिनी मै बनी आपकी कैसे छोड़ गए मुझको
राजमहल वो बाग बगीचे खूब लुभाते थे तुमको
पल में परिवर्तन यह कैसा समझ सकी न उसको
पुष्प वाटिका से लाकर सिर पे सजाते तुम गजरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।8।।

 

 नील गगन में उड़ते पंछी जिन्हें देख तुम हरसाते
उड़ती तितली पुष्प के ऊपर मन ही मन मुस्काते
समीर सुहानी उड़ते दुकूल देख बहुत तुम लरजाते
परभृत कंठ से मधुर स्वर सुन आनंदमग्न हो जाते
कितना करते प्रेम जगत दे पल भीतर कैसे बिसरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।9।।

 

 परिधान रेशमी त्याग प्रभु साधु रूप धरा अब तो
शैय्या शयन छोड़ प्रभु  धरा शयन करते अब तो
कहाँ भोग को त्याग प्रभु निवृत मार्ग पकड़ा अब तो
धारा सारी उलट पड़ी विषम हुआ जीवन अब तो
सम जीवन यह होगा कैसे हे नाथ बतादो जरा
कौन समझ पायेगा मुझको कह रही है यशोधरा।।10।।


***

 

लेखक परिचय

श्री श्रवण सिंह राजावत
जयपुर जिले की फागी तहसील अंतर्गत डाबिच गांव में 1 जुलाई 1968 को जन्मे कवि श्रवण सिंह राजावत की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम डाबिच में ही हुई।हायर सेकेंडरी शिक्षा चाकसू से करने के बाद जयपुर के कामर्स कालेज से बी काम की डिग्री हासिल की।पंजाब नेशनल बैंक में लिपिक पद पर 7 वर्ष सेवा करने के बाद राजस्थान तहसीलदार सेवा में चयनित हुए।वहां से पदोन्नत होकर राजस्थान प्रशासनिक सेवा में वर्तमान में एस डी एम् चोह्टन पदस्थापित है।प्रख्यात राजस्थानी कवि लक्ष्मण सिंह रसवन्त के दामाद होने से कविता के क्षेत्र में कई राजस्थानी कवियों के संपर्क में आये और लेखन के क्षेत्र में आगे बढे।चालक सतसई,मीरा सतसई राजस्थानी में लिखी है।यशोधरा व् उर्मिला पर हिंदी खंडकाव्य लिखा है।अभी भगवान राम के जीवन पर पद लिख रहे है।