Search Query


    कवि परिचय -


नाम - श्री श्रवण सिंह राजावत
पता - गांव डाबिच, तहसील फागी, जिला जयपुर (राजस्थान)।
शिक्षा - एम.कॉम.
रचनाएं - 1.चालक सतसई 2.मीरा सतसई 3.सामयिक विषयों पर कविताएं
वर्तमान में चौहटन(बाडमेर) में उपखण्ड अधिकारी के पद पर कार्यरत



राजस्थानी भाषा में आपकी रचनाएं बड़ी ही सुन्दर बन पड़ी हैं। प्रस्तुत है राजस्थान की राधा भक्तिमती मीरां पर लिखी गई आपकी रचना मीरा सतसई।

मीरा सतसई

 

मंगलाचरण



सबसूं पेली सुमरतो गौरी पुत्र गणेश
मीरा री महिमा लिखू आप करो आदेश ।।1।।

आप बिराजो उमासुत गौरी री निज गोद
शिव सुवन सुंदर सदा मन में भरियो मोद ।।2।।

भाल तिलक भलके भलो माथे मणी मुकूट
काना कुण्डल कनक रा चमके च्यारूं कूंट ।।3।।

लंबा कान यूँ लगे जाणक कदली जेम
ऊंचो आसन आपरो रतन जड्यो संग हेम ।।4।।

पीत पीताम्बर पहरियो जबरी कांधे जनेव
उदर विशाल आपरो सगळा करता सेव ।।5।।

कटि करघनी कसी बाहु कस्या भुजबंध
चंवर ढुलावे चाव सूं सौरम घणी सुगंध ।।6।।

पग पैंजनिया फूटरी बाजत छन छन भोत
देवा आगे दीपति जगमग जबरी जोत ।।7।।

रणत भंवर रा राजवी रिद्ध सिद्ध रा दातार
मीरा महिमा मायने आवो बिना अंवार ।।8।।

अरज करूँ मैं आपने बिनवू बारम्बार
भगता कारण आवज्यो हो मूषक असवार ।।9।।

प्रथम पूजा आपरी सदा हुवे हे देव
माता थांकी पार्वती पिता है महादेव ।।10।।

आप पधारो आज तो रिध सिद्ध लेकर साथ
नमन करूँ नेह सूं गौरीसुत गणनाथ ।।11।।

बुद्धि देवा थे बगसज्यो बुद्धि रा थे दातार
मीरा महिमा मैं रचूँ दग्ध अक्षर ने टार ।।12।।

किरपा थे म्हा पे करो अरज साम्भलो आप
सुन्दर आखर सोवणा अमोलक द्यो अणमाप ।।13।।

बुद्धि बगसो बापजी मैं तो हूँ मतिमंद
साहित रचूँ सांतरो उपजे हिय आनंद ।।14।।

बुद्धि दाता बुद्धि दयों हूँ बालक अनजान ।।15।।
आखर लिखतों आपरा म्हारो राखो मान

सुमरुं माता सरसती धवल वसन तन धार ।।16।।
आप बिराजी मराल उत है गले पूसप हार

बैठी वीणा वादिनी सुर सोहवत सात ।।17।।
कला बगसे कमलासनी मोहे जग री मात

सुर की देवी सुरसती प्रथम कला प्रवीण ।।18।।
कमल दल प्रकाशनी भली बजावत बीण

कंठ बिराजो कमलसनी विद्या बगसो भोत ।।19।।
ज्ञान प्रकाश गहरो घणो जगमग चमके जोत

ज्ञान पुंज गहरो घणो तिमिर नाश तत्काल ।।20।।
महर हुवै जद मावड़ी विद्या मिले विशाल

सुमरे जो माँ सुरसती बड़ा उणारा भाग ।।21।।
विद्या मिले भोत सी जावे अंतर जाग

किरपा कर कमलासनि बालक हूँ अबोध ।।22।।
महर कर तू मावड़ी सब्द लिखूं सुबोध

वाहन तव मोती भखे उण पर तू आसीन ।।23।।
किण सबदा कीरत कथूं मैं बालक मतिहीन
अब है थांसू आश् माँ रिदै बिराजो आर
सदा आखर सांतरा अब लिखूं अणपार ।।24।।

सुद्ध शब्द सरसावती दग्ध आखर कर दूर
अरज करूँ मैं आपसूं भगती दो भरपूर ।।25।।

सरस्वती करे सदा सबदा रो सिंगार
छंद सोरठा दोहरा आँ रा रूप अपार ।।26।।

सबदा रो सागर जठे कमी नहीं है कोय
चुग चुग आखर छंद रा मायड दीजे मोय ।।27।।

मीरा री महिमा लिखूं अटल भरोसे आप
सरजू माता सुरसती आखर अनूप अणमाप ।।28।।

इक आखर आराधना पूजा पूरी आप
आखर माही आप हो मेटो सकल संताप ।।29।।

छंद माही छनकारती सोरठ संग सुहाय
दोहा संग दिखावती सुरसत तू सिंगार ।।30।।

वयण सगाई विद्वता रगण मगण संग रास
छलके सरिता छंद री आखर तव आवास ।।31।।

लय गति राग लखे सब सुरसत रे साथ
आप आवो अब ईशरी म्हे नवावू माथ ।।32।।

गुरु ज्ञान री गांठडी भरिया बहु भण्डार
तिल भर बगसो तापसी हुवै हिये उजियार ।।33।।

गुरु किरपा ज्ञान री आप करो बरसाय
ज्ञान हिय परगटे घणो हिय अंधेर हटाय ।।34।।

गुरु किरपा होवे घणी हुवे हिरदे प्रकाश
गुरु जगत रे मायने जाणक सूर अकाश ।।35।।

सुमरू नाम गुरु सदा घणो बतायो ज्ञान
जन्म सुधारयो जीव रो भला आप भगवान ।।36।।

गुरु नाम मोटो घणो जो लेवे कोई जाण
शरण गुरु रे सांकड़े भल पावे भगवान ।।37।।

पारस लोहा परस पुनि झट कंचन बण जाय
गुरु पारस सूं बड़ो शिष्य ने गुरु बनाय ।।38।।

बड़ी गुरु माँ भगवती बाला सती बनाय
अरज गुरु माँ आपसू सदा रखाज्यो साय ।।39।।

आप तज्यो आहार अरु निर्मल पावन नीर
धन्य गुरु माँ देश री भंजन करती भीर ।।40।।

मीरा महिमा मैं लिखूँ आप देवो आशीष
श्रवण शरणे आप रे सदा नमावे शीश ।।41।।

कलजुग में कियो घणो सत सागर संचार
रूपकंवर बाला सती नमूँ मैं बारम्बार ।।42।।

गुरु भगवती गहुँ अलबत्त शरणो आप
पचपदरा में पावियो आनंद नाम अणमाप ।।43।।

मीरा महिमा कारणे आप देवो आशीष
गुरु शरणा ज्ञान घण मिले बिसवा बीस ।।44।।

जोधाणो जोधा जबर मारवाड़ रो मान
मेडत इणरो परगनों दूदा वठे प्रधान ।।45।।

कुड़की नाम कमावियो मीरा जनमी मात
चोदह सो अठानवे बरसे जद बरसात ।।46।।

भादव मास ओ भलो पख अँधियारो पाय
आठम तिथि आपतो मीरा जनमी माय ।।47।।

महला मंगल मानियो बटी बधाई बा र
दूदा घर में देखियो आनंद भयो अपार ।।48।।

उत्‍थापन



पायल झंकारे पाँव में आप चाले उतावली
पड़े उठे पाछे पड़े बारे निकलै बावली ।। 1 ।।

मही लोटत मीरा हंसे चाळा करे अनेक
माया खुद माया फसी हरी जिणरो है हेक ।। 2 ।।

रमती कदै रेत में दादोसा न देख
बड़ा भाग पाया बहु रचती करमां रेख ।। 3 ।।

दादोसा ने देख मीरा लेती आंख्या मींच
दौड़ी आती छैक दादोसा रे पास में ।। 4 ।।

नटखट सी नैनी घणी करती घणा किलोल
बचपन है बड़भाग ज्यु आतो घणो अनमोल ।। 5 ।।

कमधज री कंवरी कहो अचरज करे अनेक
बाग बगीचा बीच में झूले हिण्डा नेक ।। 6 ।।

सखिया संग जावती खेलन आँगन खेल
घर बनाती घरकुंडिया रमती रम्मत रेल ।। 7 ।।

आँखमिचनि खेलती रमती कितरा रास
मीरा खेले मस्त व्हे करती हास् परिहास ।। 8 ।।

गुड़िया रमती गुमेज सूं डुल्या डुली साथ
सबला ने संवारती रमती हाथो हाथ ।। 9 ।।

दुल्हन तो राधिका बनडो किशन मुरार
डुल्या रूप बनावती राजी होती अपार ।। 10 ।।

बधती जिम बेलड़ी हुई मीरा हुस्यार
पटशाला पढण हित पहुंची मीरा जार ।। 11 ।।

गुरु पढ़ावे ज्ञान दे मीरा मन ने मार
चार वेद शास्त्र छह सीख्यो आरो सार ।। 12 ।।

विद्या पाई बहु विविध जबरो सीख्यो जोग
साहित व्याकरण शब्द सब सिख्या सकल संयोग ।। 13 ।।

गीता रामायण पढ़ी पढ़या निति आर नेम
पद्य गीत अर छंद पढ़या जोतिष सीख्यो केम ।। 14 ।।

सोलह कला सिखवी मीरा महीनो माय
दूदा जी री दिकरी कोई अचम्भो नाय ।। 15 ।।

गुणवंती ज्ञानी निपुण जानत जगत व्योहार
मीरा थू मन मोवियो शिक्षा रो सिणगार ।। 16 ।।

रमै सतोलिया रावले दौड़े घणी दौड़
कुण जाणे कुंवरी आ मारवाड़ री मौड़ ।। 17 ।।

छन रमती छन छुपती करती करतब खूब
बालपनो बिलमावतो विरछा हेटी दूब ।। 18 ।।

बेलड़िया अर बेटिया बढे बेगी आ बात
कद बण जावे कामेति देखत देखत जात ।। 19 ।।

मीरा कुण सी मानसी दुनिया रा दस्तूर
दूदा जी री लाडली मनसा करसी पूर ।। 20 ।।

एक दिना बा एकली खड़ी झरोखे माय
मार्ग माहि देखियो बनडो आगो जाय ।। 21 ।।

मीरां माँ सूं पूछियो ओ कुण है आव्
मावड कह मीरा सुण बींद परणबा जाव ।। 22 ।।

कुण म्हारो है बींद माता तू बतलाय
मायड़ लेती नींद वो कहकर दिखलाय ।। 23 ।।

माथे मोरपंख है बंसी हाथा सोय
गाय चरावे रात दिन थारो पति होय ।। 24 ।।

भोली मीरा श्याम ने निज पति लीनो मान
पति प्रेम रे सामने भूली सकल जहान ।। 25 ।।

मोर मुकुट माथे धरयो अधर मुरली हाथ
चारभुजा धारण करे वो मीरा रो नाथ ।। 26 ।।



हिय में बसाय लियो हरी आतम रो आधार
जनम जनम री साधना फली इण जीवण आर ।। 27 ।।

सूरत लागी श्याम सूं जग सूं टूट गई
बालपना री प्रीत आ पूरो जीवन भई ।। 28 ।।

लड्डू गोपाल सो लाडलो मीरा पति गोय
जग सूं बंधन तोड़ के हरी शरणे होय ।। 29 ।।

मोहन मन ने मोह लियो मीरा धारयो मौन
कुण मीरा बण अवतरी जग मे जाणे कौन ।। 30 ।।

प्रेम बढ़ायो परमेशरा मीरा मोहन हेत
मोहनमय बन गई ध्यान जगत नी देत ।। 31 ।।

माँ रो कह्यो मानकर मीरा हुई मगन
सावरिया री सेवा में लागी अति लगन ।। 32 ।।

दिन रात नी देखती सांवरिया रे साथ
भजन करती भाव सूं मीरा नमाती माथ ।। 33 ।।

उठती पैली आप ब्रह्म मुहरत में बेग
जपति हरी जाप नहाय धोय आ नैनकी ।। 34 ।।

स्नान कराती सांवरा पैराती पोषाक
चन्दन तिलक लगावती भजन करती भाक ।। 35 ।।

दीप धुप रख देव आरती करती आप
दूदा हर्षाता देख सकल मिटे संताप ।। 36 ।।

मीरा छोड्या महेलडा बसी हरी रे बाग़
कंवरी रा काई कर्मड़ा भूंडा दिखे भाग ।। 37 ।।

महेला री आ मालिकन सोवे धरती सेज
मायड़ थारी मसखरी हरी सु जोड़यो हेज ।। 38 ।।

पति हुवे परमेशरा परमेशर पति बन जाय
मीरा जेड़ी मालकन परमेशर पति न पाय ।। 39 ।।

सेवा में रह सर्वदा भूली सारो भान
दस बरस री दिकरी सेवे सकल सुजान ।। 40 ।।

पूजा करे प्रेम सुन भाव भजन भरपूर
नैना में सूं निंदड़ी दिनी अब कर दूर ।। 41 ।।

हरिनाम हर बखत ले हरी सूं राखे हेत
समदरसी बन सांतरी रिजक करी सब रेत ।। 42 ।।

मोहन संग मीरा अबे रहती रास रचाय
बाता करती बलम ज्यु संक नहीं शरमाय ।। 43 ।।

हंसी ठिठोली संग हरी आती कदी आवाज
दूदा हिव में दुखती राखन रखियो राज ।। 44 ।।

सोच करे अब सभी कैया सरसी काज
मीरा तो मोहन री हुई लोगां कहता लाज ।। 45 ।।

बेगि इने ब्याह दयो कुछ ना देर करोह
बेगो ढूंढो बर कोई पीळा हाथ करोह ।। 46 ।।

राठोडा री रीत निभती अब लागे नहीं
प्रभु सूं कर प्रीत अबखी अब मीरा करी ।। 47 ।।

सरदारा मन सोच राजा कुण राजी हुवै
पकड़े कुण पौंच मीरा रो अब राज में ।। 48 ।।

मीठो देश मेवाड़ सांगा जेड़ो सूर उत
भाटी भड़ किवाड़ या परनावा जा उठे ।। 49 ।।

कन्या करे कुबद मोहन बिन माने नहीं
जबरो मन में जुध दूदा रे दिन रात हुयो ।। 50 ।।

निश री उड़गी नींद राठोड़ो अब रतजगों
बणसी कुण बींद मीरा रे हित मुल्क में ।। 51 ।।

रमता गुरु रैदास मेड़ता रे माय गया
अधपतिया आवास झट पूगिया जायके ।। 52 ।।

मीरा सूं मिल्या गुरु चरण पखारया चाव सुन
सबद ज्ञान करयो शुरू मीरा हित मौज सूं ।। 53 ।।

प्रेम बड़ो पवित्र ज्ञान कर ज्यो गोय ले
चारभुजा रो चित्र हिरदे वांके हमेश रह ।। 54 ।।

न कोई उंच न नीच समता सब संसार में
कमल रैवे मझ कीच खुशबु देवे खूब वो ।। 55 ।।

इक ईश्वर रो आसरो वोही आस विश्वास
सदा वाने सुमरता पहुंचे वांरे पास ।। 56 ।।

पैली पाळो प्रीत हरी जद हासल हुवै
चरणा में रख चीत मार्ग ओ ही मिलण रो ।। 57 ।।

करे न कूड़ कपट नाम लेवे नित रोज रो
निस्चै पूगे निकट साँची कैवूं श्रवण सी ।। 58 ।।

जदपि उनसूं जोग प्रारब्ध में पळे
साँवरियो संजोग कर देवे ओ करम सूं ।। 59 ।।

भगति मोटी भाव री ओ साधन आसान
नित सुमरे नाम ने धर साँवरियो ध्यान ।। 60 ।।

नवधा भगति नित नुवीं ज्यो कोई लेवे जान
मानव इण जूण में बणज्या ब्रह्म समान ।। 61 ।।

बंसी वालो बनवारी सुने सबकी साद
ध्रुव ने ध्रुवपद दियो पाल्यो खुद प्रह्लाद ।। 62 ।।

भगतां रो भीडू सदा रहतो लज्जा राख़
अबखी आडो आवतों सदा राखतो साख ।। 63 ।।

प्रभु तो है पारस तणो भलो करे न भेद
कंचन लोहा न करे छिन छोड़े नी छेद ।। 64 ।।

एहड़ा रो ल्यो आसरो औरा सूं नी आस
सुमर नाम जग में सदा पहुँचो उणरै पास ।। 65 ।।

ज्ञान की नी व्हे गांठड़ी बा नी सके है बांध
पाणी सूं व्हे पातलो सज्जन सके है साध ।। 66 ।।

मीरा माणक मोल हरी ने लीनो हाट सूं
बा बजारा बोल रटती रहती दिवस रैन ।। 67 ।।

गिरधर री गाहक बनी ले लिन्यो नन्द लाल
जीवन सारो जद दियो कुण कैवे कंगाल ।। 68 ।।

पीव आयो परदेश सुन आछो दिन है आज
कागा रोज उड़ावति पीव मिलान रे काज ।। 69 ।।

पीव मिलन रे काज जोती नित बाटडली
नित का पंथ निहार पड़गी आंख्या रातडली ।। 70 ।।

नैना नहीं नींदडली जबर जलतो जीव
बीत्या कितरा बरस जद आयो है पीव ।। 71 ।।

पीव आयो परदेश सूं आछो दिन है आज
कागा रोज उड़ावति पीव मिलन रे काज ।। 72 ।।

पीव मिलन रे काज जोती नित बाटडली
नित का पंथ निहार पड़गी आंख्या रातडली ।। 73 ।।

नैना नहीं नींदडली जबर जलतो जीव
बीत्या कितरा बरस जद आयो है पीव ।। 74 ।।

सांगा जेडा सूर मेवाड़ रा महीपति
देवूं मीरा दूर भोजराज उणरो तनय ।। 75 ।।

दूदा कर विचार संदेशो झट साम्भलो
पड़सी जड़ ही पार मेवाड धर मीरा देवूं ।। 76 ।।

जोशी पूग्यो जार राणा रे घर रावळे
झुक ने करया जुहार केवो विप्र कमधजा ।। 77 ।।

मेडत नगर सूं मोकल्यो सुण दूदा सन्देश
भोजराज सो भड़ अब परणावो परदेश ।। 78 ।।

दूदा जी री दिकरी सुत आप रे साथ
मीरा नाम मरुधरी हमलावे तेहि हाथ ।। 79 ।।

हिन्दू कुल रा सूर दूदा भेज्यो थारे द्वार
इण कारण आवियो सुणो थे सरदार ।। 80 ।।

मारवाड़ अर मेवाड़ री जबरी घणी जोड़
सिसोदिया सूरज तणा रवि जेडा राठौड़ ।। 81 ।।

सम्बन्ध घणो ओ सांतरो कर मै जोड़ कहुँह
राखो मरजी राजरी भली बात भखुँह ।। 82 ।।

मीरा है मणि मुकुट माथा रो सिर मोड़
सूर घणा सिसोदिया जबरी मिलसी जोड़ ।। 83 ।।

आज्ञा हो तो अवस जुड़े सगाई जोर
राणा रजा आपरी म्हाने मोकलो और ।। 84 ।।

सांगा करी स्वीकार राठोडा री रजाह
अमर होसी बात आ धरती फुरे धजाह ।। 85 ।।

पाछा आया पंडितजी हरख हुयो हदपार
राठोडा मन राजी हुआ उच्छब मनायो आर ।। 86 ।।

मीरा सुण माठी हुई बा माँ सु बतलाय
क्यों सगाई थे करो मानो म्हारी माय ।। 87 ।।

परणी मैं जद प्रथम आपरे ही आदेश
बीजी बार मैं बरुं कर मत माँ क्लेश ।। 88 ।।

चारभुजा की चाकरी कद सूं मैं करुंह
लाज मरुँ मैं लाडली बीजी बार बरुंह ।। 89 ।।

राठोडा घर रीत एक पीव जीव एक
दो कदै नी देखिया नीति आहि नेक ।। 90 ।।

पकडीयो हाथ परमेशरा भला म्हारा ज भाग
सोवै सारो जगत सुण जागी मीरा जाग ।। 91 ।।

मायड़ म्हारी मान मत कर मीरा पर जुलम
कतरी रांखु कान आ तो सोचो आप जी ।। 92 ।।

मीरा मोहन की भई अब न दूजो और
सांगा घर संदेशडो भेजो कहूँ कर जोर ।। 93 ।।

बिनती बारम्बार मानो म्हारी मावड़ी
आणद व्हे अणपार सीघ्र भेजो संदेशड़ो ।। 94 ।।

रूड़ो कुल राठौड़ बात करया बदले नहीं
जबरी मिली जोड़ सिसोदिया सा सूर ।। 95 ।।

माँ कैवती मीरा सुण साँची कहूँ समझाय
पति बिना पत नहीं जीव नरका जाय ।। 96 ।।

नारी धर्मं निभै नहीं रह्या कुंवारी राय
पति उतारे पार भव शास्त्र यूँ समझाय ।। 97 ।।

नाथ बिना नारी कहो बिन फल ज्यु बनराय
जंगल जेड़ो जीवन नहीं फूल फल नाय ।। 98 ।।

दूजी बात दर्शावती प्रभु तो पिता समान
वाने पति जो वरै हुवै धर्म री हान ।। 99 ।।

मैं तो करी मसखरी मीरा साँची मान
परम पिता परमात्मा जग में है सब जान ।। 100 ।।

मैं समझाऊं मान ले बेटी म्हारी बात
हुई सो ही चुकी अब नहीं कछु अज्ञात ।। 101 ।।

राजपूत घर रावळे कदै न रहे कुंवार
जिद छोड़ तू जबर कर विवेक विचार ।। 102 ।।

सांवरा ने मान सदा राख हमेशा राज
पण तू परणीजजा कुल मर्यादा काज ।। 103 ।।

मीरा तो माने नहीं माँ रो मन कुमलाय
कमधजा री काण अब जल्दी टूटी जाय ।। 104 ।।

परणी मैं पिरथीनाथ दूजा ने देखूं नहीं
हेकर पकड़यो हाथ छीन भर छोड़ू नहीं ।। 105 ।।

मावड म्हारी मान करो सगाई कदै नहीं
जासी म्हारी जान ज्यो थे ओ जुलम करो ।। 106 ।।

चारभुजा नाथ चित म्हारे बैठ्यो मात
आप करो न अहित बिसरो मन सूं बात ।। 107 ।।

सांवरिया री सेज छोड़ अब जावूं नहीं
हिवडे उमडयो हेज किंकर छूटे मावड़ी ।। 108 ।।

मावड तो मानी नहीं मीरा री मरजीह
आई मीरा आपरे आगे दयूं अरजीह ।। 109 ।।

सोच करती सोवइ सुपनो आयो साँच
बनी मीरा बीनणी मोहन मंदिर मांझ ।। 110 ।।

पिली पिली पीठीह अंग लगाई आज
रची मेहंदी राचनी कानूडा रे काज ।। 111 ।।

ब्रिन्दाबन री बरात में बराती बहुदेव
सुन्दर अर सुहावना आया संग में सेव ।। 112 ।।

घोडा पर घनश्याम तोरण आयो तुरत
बैठी मैं अंग बाम आंनद आयो है अति ।। 113 ।।

चंवरी मांडी चंद्रगगन फेरा खाती फेर
पुहुप बरसावे पुलक देव करी न देर ।। 114 ।।

ब्याही हूँ बनवारी संग आणद उर अणपार
रांची गिरधर रे रंग नारायण री नार ।। 115 ।।

सुपनो माहि सेज सांवरिया संग रही
हिरदा माहि हेज उफण्यो ओ अनभावतो ।। 116 ।।

परणी मैं परमेशरा बडभागी मैं भोत
पुण्य परगटया पूरबला जागी जनमा जोत ।। 117 ।।

हरी की भरस्यु हाजरी नितका म्हारा नाथ
अब चुकु न अवसर ओ मीरा नमावे माथ ।। 118 ।।

सुपनो आयो सुहावनो आणद हुयो अणपार
साँवरियो साथी बण्यो मीरा बीच मझार ।। 119 ।।

हरखि मीरा मन हंसी पायो प्रीतम आज
सुपने ही मिल्यो सही करयो यो भल काज ।। 120 ।।


सुण म्हारी सहेलडि मैं परणी मुरलीवाल
उर उमंग छाई अति अब हिव करे उछाल ।। 121 ।।

म्हारी कह दे माय ने बरियो बंशीवाल
मोर मुकुट माथे धरे निरख हुई मैं निहाल ।। 122 ।।

अब न कोई आस मीरा रे मन रही
बनवारी घर बास आणद री नहीं सीम ।। 123 ।।

गिरधर म्हारो कर गह्यो बड़ी घणी आ बात
फेरा में मैं संग फिरी हाथा में ले हाथ ।। 124 ।।

अनुभव हुयो ओ आज प्रभु रो पायो परस
कारण बिन ही काज महर करी थे मोकळी ।। 125 ।।

नैणा आयो नीर सुपना ने याद कर
धर हिवडे धीर बैण यूँ मीरा कह्या ।। 126 ।।

सांवरिया रो साथ घडी दो घडी घणो
हरी पकड़यो हाथ कीण मुंह कीरत कथू ।। 127 ।।

जीवण लियो जीत हार हियो हरी हित
चरणां में रख चीत सेवा करस्यु मैं सदा ।। 128 ।।

बिसरी सारी बात एक चीज अब याद है
रट्स्यु दिन रात नाम सदा मैं नाथ रो ।। 129 ।।

दुनिया री दीवार अब आड़े आवे नहीं
नित करू न्यौछार सब जीवन श्याम पर ।। 130 ।।

मीरा मन परणिजगी जगत रीत है जोर
लगन अब लिखाविया रणबंका राठौर ।। 131 ।।

लगन जोशी लेयने पुग्यो सांगा पोळ
झट लगन झिलाविया मोत्यां मूंघा मोल ।। 132 ।।

शुभ घडी सज्या सभी आया मेडत आण
मेवाड़ रा मोतबीर रावळ अर महाराण ।। 133 ।।

सूरा ने शुभराज कवी सुनावे कवित
बाजे सुरंगा बाज उच्छब बणियो ओपतो ।। 134 ।।

सगळा रो सन्मान कमधज खुद हाथा करयो
आ रजपुती आन जगत सरावे सब जगा ।। 135 ।।

मीरा मन ने मार बनडी देखो है बणी
तन ने कर तय्यार पैरी अब पोशाक ने ।। 136 ।।

मोहन मूरत साथ चंवरी ले मीरा चढ़ी
हाथ सौंपियो हाथ लोक लाज फेरा लिया ।। 137 ।।

बारे घणो उछाह बहु मीरा मन ने मार
राठोडा घर रीत सूं मान्या मंगलाचार ।। 138 ।।

बेटी री बिदाई आ दौरो घणो दस्तूर
पण रीत ने पालबा मानव व्हे मजबूर ।। 139 ।।

पग धरियो जद पालकी धरयो रह गयो धीर
मीरा मन माठो करयो नैणा टपक्यो नीर ।। 140 ।।

मेवाड़ धरा रे मारगा चाली मीरा चाल
मुड़ मुड़ देखे मेडतो पीपल उभी पाळ ।। 141 ।।

दादोसा संग दौड़ती जयमल संग जोर
यादा मन में आवई छुट्या सारा छोर ।। 142 ।।

चारभुजा रो चुन्तरो गोखा आंख्या गोय
बालपणा री बातड़ी सुन्दर घणी सजोय ।। 143 ।।

माँ कह्यो हो मने मोहन पति है मोर
मैं मान्यो माधवा अब परणाई और ।। 144 ।।

दो पति मैं देखिया एहडि मैं अणभाग
कुण सुने कुणसुं कहूँ उठी कलेजे आग ।। 145 ।।

राणी बण किम रैवस्यु दामोदर री दास
अँधेरा माहि उलझी आसी कदै उजास ।। 146 ।।

सेवा मोहन सूं सरयो कब लग सारो काज
जगत रीत जाणु नहीं अब पछताउँ आज ।। 147 ।।

मोटो घणो मेवाड़ राणा वाली घण रीत
पड़सी कैंया पार मीरा मन मुरझावती ।। 148 ।।

सोचत पहुंची सांकडे मेवाड़ धरा रे मांझ
डेरा दीनया जद डाल सूरज आंथ्यो साँझ ।। 149 ।।

निर्जन बन निर्झर नदी डूंगर दिखे डाव
बाराती बिसराम करयो पड्या रात पड़ाव ।। 150 ।।

रात करयो रहवास मझ जंगळ रे माय
मोहन मूरत पास मीरा पल छोड़ी नहीं ।। 151 ।।

पैली किरण प्रभात मारग लियो मेवाड़ को
जंगळ जोती ज़ात मन में मोहन ही बस्यो ।। 152 ।।

मगरा ऐ मेवाड़ रा रखवाला ज्यूँ राज
खड़ा ज्यां पर खाँखरा सुन्दर लागे साज ।। 153 ।।

हरियाली हर और देख्या दुःख व्हे दूर
मीरा रो मन मोर तनिक ने हरख्यो देखने ।। 154 ।।

बनवासी हरखे बहुत जाती देखे जान
हाथी घोडा हिण्डता रथ बैठ्या है राण ।। 155 ।।

दो दिना चाल्या दिशा पहुँच्या सांगा पोळ
बहुविध लिया बधावना ढमक बजता ढोल ।। 156 ।।

राणा वाली रीत सूं मीरा पधारी म्हेल
डावड़िया संग डागले पहुंची मीरा पैल ।। 157 ।।

राणा रे घर रावळे उच्छब जोरा आज
बाजे मृदंग ताल बहु सुने सभी शुभराज ।। 158 ।।

सांगा सोहवे सांतरा मझ महफल रे माय
जानक चंदो जोर रो तारा बीच सुहाय ।। 159 ।।

बड़ा राव उमराव बहु शोभा घणी सुहाय
सांगा घर आज सभी राणा रो जस गाय ।। 160 ।।

आनंद घण उछाव चित्तौड़गढ़ रे चौक में
भरया नेह रा भाव मीरा रा मोहन प्रति ।। 161 ।।

बैठी बादल महल मन मोहन ने याद कियो
कृष्ण फूल कँवल सौरम मीरा है बणी ।। 162 ।।

प्रगटया पिरथीनाथ मीरा री मन की सुणी
मीरा नमायो माथ बिराजो म्हारा सांवरा ।। 163 ।।

बनवारी सूं बात मीरा हंस हंस करे
तारा छाई रात बाता सुनिजे बारणै ।। 164 ।।

पग री बाजे पैंजनी घूँघर री घिमरोळ
महला नाचे मेडती पहुंची साद आ पोळ ।। 165 ।।

राणा आधी रात महला माहि मोकळ्या
बै सुणी जद बात अचरज मन में है अति ।। 166 ।।

पुरुष कुण है प्रथम मीरा जिणसूं बोलती
भांगू मैं ओ भरम मेडतनी रा मरम ने ।। 167 ।।

खोल्या भड़ किवाड़ मीरा बैठी मेडती
राणो मांडी राड पर पुरुष गयो कठै ।। 168 ।।

पर पुरुष नहीं पाय राणो भरियो रीस में
मीरा हंसे मन माय क्यूँ कोप्यो बिन काज ही ।। 169 ।।

नमूँ म्हारा नाथ रीष छोड़ ईश भजो
मैं नामवृं माथ चेरी थारा चरण री ।। 170 ।।

अरजी सुणो आप मैं ब्याही हूँ माधव
परस्या हुवै पाप एक पुरुष री नार मै ।। 171 ।।

बाळपणै में ब्याव मोहन संग म्हारो हुयो
दुनिया रे दरसाव लोक लाज फेरा लिया ।। 172 ।।

आगे मरजी आपरी पत राखो पिरथीनाथ ज्यूँ
रजा व्हे ज्यूँ रावरी केवो सो ही मैं करूँ ।। 173 ।।

राणो तजी रीस मीरा सूं यूँ कह्यो
अलख आपरो ईश सेवा करो थे श्याम री ।। 174 ।।

मैं करूँ नी मना पूजा प्रभु री करो
बिगड़ी देवे बना राजो तिहुँ लोक रो ।। 175 ।।

भगती थे करो भला पण रीत मेवाड़ी राखज्यो
सिसोदिया री सला मीरा रे मन भावती ।। 176 ।।

राणा रे रेवास मीरा मूरत थापवी
वीरो है विस्वास राखे ज्यूँ में रैवस्यु ।। 177 ।।

सेवा थारी सांवरा कमी न राखूं कोय
बडभागण हूँ बड़ी मोहन मिल्यो मोय ।। 178 ।।

महला माळा मोकळी मीरा काज महान
भगती सगती म भिळि अब रजपुती आन ।। 179 ।।

मंदिर बिराजे मोहना मीरा महला माय
राजावाली रीत तो नेड़ी दिसे नाय ।। 180 ।।

 गुण गोबिंद रा गावती रागा घणी रिझाय
मोहन एहड़ो मोकल्यो मीरा रे मन माय ।। 181 ।।

भाव बढ्यो है भोत नित नित नंदकिशोर सूं
ज्यूँ दिवला री जोत एकल घणी जगमगे ।। 182 ।।

राणो तजी रीस मीरा सूं यूँ कह्यो
अलख आपरो ईश सेवा करो थे श्याम री ।। 183 ।।

मैं करूँ नी मना पूजा प्रभु री करो
बिगड़ी देवे बना राजो तिहुँ लोक रो ।। 184 ।।

भगती थे करो भला पण रीत मेवाड़ी राखज्यो
सिसोदिया री सला मीरा रे मन भावती ।। 185 ।।

मीरा बैठी महल में गुण गोबिंद रा गाय
बैरी सब जग बण्यो साँवरियो इक साय ।। 186 ।।

बीत्या जुग रे बाद हरी भगत कोई हुवै
प्रभु रो प्रसाद मीरा रूप में मिल्यो ।। 187 ।।

राणा सांगा राजवी मीरा रो रख मान
हरी भगति रो हुकुम आप सुनायो आन ।। 188 ।।

रैवे ज्यूँ थे राखज्यो नैना पुतली नाय
भगति करे मीरा भले महला रे ई माय ।। 189 ।।

आनंद घण उछाव चित्तौड़गढ़ रे चौक में
भरया नेह रा भाव मीरा रा मोहन प्रति ।। 190 ।।

बैठी बादल महल मन मोहन ने याद कियो
कृष्ण फूल कँवल सौरम मीरा है बणी ।। 191 ।।

प्रगटया पिरथीनाथ मीरा री मन की सुणी
मीरा नमायो माथ बिराजो म्हारा सांवरा ।। 192 ।।

बनवारी सूं बात मीरा हंस हंस करे
तारा छाई रात बाता सुनिजे बारणै ।। 193 ।।

पग री बाजे पैंजनी घूँघर री घिमरोळ
महला नाचे मेडती पहुंची साद आ पोळ ।। 194 ।।

राणा आधी रात महला माहि मोकळ्या
बै सुणी जद बात अचरज मन में है अति ।। 195 ।।

पुरुष कुण है प्रथम मीरा जिणसूं बोलती
भांगू मैं ओ भरम मेडतनी रा मरम ने ।। 196 ।।

खोल्या भड़ किवाड़ मीरा बैठी मेडती
राणो मांडी राड पर पुरुष गयो कठै ।। 197 ।।

पर पुरुष नहीं पाय राणो भरियो रीस में
मीरा हंसे मन माय क्यूँ कोप्यो बिन काज ही ।। 198 ।।

नमूँ म्हारा नाथ रीष छोड़ ईश भजो
मैं नामवृं माथ चेरी थारा चरण री ।। 199 ।।

अरजी सुणो आप मैं ब्याही हूँ माधव
परस्या हुवै पाप एक पुरुष री नार मै ।। 200 ।।

बाळपणै में ब्याव मोहन संग म्हारो हुयो
दुनिया रे दरसाव लोक लाज फेरा लिया ।। 201 ।।

आगे मरजी आपरी पत राखो पिरथीनाथ ज्यूँ
रजा व्हे ज्यूँ रावरी केवो सो ही मैं करूँ ।। 202 ।।

राणो तजी रीस मीरा सूं यूँ कह्यो
अलख आपरो ईश सेवा करो थे श्याम री ।। 203 ।।

मैं करूँ नी मना पूजा प्रभु री करो
बिगड़ी देवे बना राजो तिहुँ लोक रो ।। 204 ।।

भगती थे करो भला( पण )रीत मेवाड़ी राखज्यो
सिसोदिया री सला मीरा रे मन भावती ।। 205 ।।

मीरा बैठी महल में गुण गोबिंद रा गाय
बैरी सब जग बण्यो साँवरियो इक साय ।। 206 ।।

बीत्या जुग रे बाद हरी भगत कोई हुवै
प्रभु रो प्रसाद मीरा रूप में मिल्यो ।। 207 ।।

राणा सांगा राजवी मीरा रो रख मान
हरी भगति रो हुकुम आप सुनायो आन ।। 208 ।।

रैवे ज्यूँ थे राखज्यो नैना पुतली नाय
भगति करे मीरा भले महला रे ई माय ।। 209 ।।

राणा रे घर रावले सट दीन्यो सन्देश
मीरा ने बरजो मति लडज्यो नी लवलेस ।। 210 ।।

मीरा मोहन में मगन भली हुई इण भांत
रात दिवस एक रट दिन उगता दिन आंथ ।। 211 ।।

भोजराज नर भलो निपट निभायो नेह
मीरा री मरजी सही धन धन रे नर देह ।। 212 ।।

आयो मास आषाढ़ बादल रे संग बीज
गोयो मन कर गाढ़ श्याम बरण नभ् सांतरो ।। 213 ।।

बादळ सुण तू बात श्याम रंग तव श्याम सो
जीवडो उमग्यो जात देख तोही असमान में ।। 214 ।।

रिमझिम बरसे रात खिंवे बीज खडीह
यदुनंदन री याद झट नैन लागी झडीह ।। 215 ।।

हरी भई वसुधा हमें बेलड़िया बिलमाय
सांवरिया बिन सून म्हाने काटे पुरवाय ।। 216 ।।

कुण हरी आवन कहे कान उडीके कान्ह
हरी बिना भू हरी जारे म्हारी जान्ह ।। 217 ।।

पौन तू बड़ पापणी ल्यावे क्यूँ नी लाल
संदेशो दे श्याम ने बिरहन न्हाले भाळ ।। 218 ।।

बायरिया सूं बोलती काम तू इतरो करेह
उण दिश सूं आवज्ये धणी जठै पाँव धरेह ।। 219 ।।

सावण रुत सुहावणी मुधरो बरसे मेह
मीरा मन मोहन बस्यो नैणा भरियो नेह ।। 220 ।।

बागा में नाचे बहु मनभावणा मोर
पंख देख पछतावती भलो न लागे भोर ।। 221 ।।

दादुर थे करो दया टेर छोड़ कान टेर
सुणसी जद सांवरो दर नी लगावे देर ।। 222 ।।

पापी तू पपिहरा पल न पुकारे पीव
प्रभु म्हारो पीव है ज्यो जलावे जीव ।। 223 ।।

पीवे पावस पाणी ओ बरसे बरखा बूँद
श्याम बिना नहीं सोवती मोहन आंख्या मूँद ।। 224 ।।

हरियाली घणी हुवी हियो न हरियो होय
मोहन बिन मैं मुवी हरखू दर्शन होय ।। 225 ।।

बड़भागण थूं बादळी अम्बर उठी आय
अनभागण मैं अति नटवर दिसे नाय ।। 226 ।।

बड़भागण थूं बिजली पल पल में पलकाय
अम्बर में अठखेलनी जब्बर मांडी जाय ।। 227 ।।

विरहन आळी वार्ता मीरा घणी मनाय
परमेशर तो पीव है विरहन मीरा वाय ।। 228 ।।

श्याम मिल्या होवे सुखी दुःख रो भर्यो दरियाव
बैरन सुण बादली नभ् ले जाती नाय ।। 229 ।।

शिव पूजता शिशोदिया विष्णु करियो वास
बम बम बाणी बदलगी श्याम रटे हर साँस ।। 230 ।।

निर्गुण रे नेडा रह्या सगुण आयो साथ
मीरा रे मन मही हांचा एक ही हाथ ।। 231 ।।

शिव श्याम दोन्यू सेवे राणा रे घर राज
मीरा दोन्यू मिलाइया अचरज ओहि आज ।। 232 ।।

मीरा अति महान चारभुजा चित्तोड़ में
गाती गोविन्द गान मझ महला में मेडती ।। 233 ।।

सरिता भगती सांतरी बही महला रे बीच
प्रेम फुहार जद पड़ी कम व्हियो काम कीच ।। 234 ।।

झूला मोहन झुलावने महला झूलो मांड
बनवारी ने बिठायके हिण्डा दिन्या छांड ।। 235 ।।

मीरा मोहन मूरती गरब सहित ले गोद
हींडा हरी संग हिंडती मन में भरियो मोद ।। 236 ।।

झूला तो झूलती मीरा मोहन संग लियो
उमंग अति उठती प्रेम पुलकित जद हुवी ।। 237 ।।

सुन्दर गीत सुनावती मोहन ने मीराह
पल न छोड़े प्रभु ने हिय जाणक हीराह ।। 238 ।।

अति हिय आनंद झूला मीरा झूलती
क़ने है कृष्ण चंद बड़ी घणी बात आ ।। 239 ।।

मास भादवो मोवनो बरसे बरखा बूँद
मन में ध्यायो माधवो मीरा आंख्या मूँद ।। 240 ।।

अंधेर पख री अष्टमी जन्मदिन कृष्ण रो जाण
हरख मनावे हिवडे मीरा आनंद मान ।। 241 ।।

सजाई मूरत सोवनी सकल करया सिणगार
रख उपवास रावळे उछब मनायो आर ।। 242 ।।

गोविन्द रा पद गावती भजन करे भरपूर
सेवा मोहन सांतरी दुखड़ा करती दूर ।। 243 ।।

सेवा में रहता सदा दरबारा रा दास
मीरा ममता मोकळी प्रथम बिठाया पास ।। 244 ।।

स्वामी एक है संवारो दुनिया सारी दास
ऊँच नीच नी उण घरां प्रभु सबरे पास ।। 245 ।।

भजन गावो थे भला रीझे जिणसूं राम
मोत्यां मूंघी मिनखजून काई आसी काम ।। 246 ।।

प्रेम रस प्यालो भर्यो पीवो थे रख प्यार
सबरो साई सांवरो व्यर्थ और विचार ।। 247 ।।

नाम जियां एक नावडी सरिता सब संसार
इणरो लेवे आसरो पहुंचे परले पार ।। 248 ।।

रसना तू तो राम रट कर न दूजो काम
आछो आयो अवसरों ठाकुर रे घर ठाम ।। 249 ।।

साँवरियो सांचो सखा झूठो जग जंजाळ
माया उलझ्यो मानखो किंकर काटे काळ ।। 250 ।।

जन्मदिवस जोर को मीरा रही मनाय
आनंद में डूबी अति जो न बरणी जाय ।। 251 ।।

बडभागन मीरा बड़ी प्रभु सूं पाळी प्रीत
हरी सूं सब हारता मीरा चावे जीत ।। 252 ।।

बढे सवाई प्रीत बहु हरी मीरा हेत
जग ने मीरा जानियो चारभुजा संग चेत ।। 253 ।।

आयो मास आसोज आयो पख उजास
शरद पूनम सांतरी रचियो मोहन रास ।। 254 ।।

मीरा आज मनावती पूनम अति पुनीत
चितोड़ महला चौक में गावन लागी गीत ।। 255 ।।

मीरा मन में मुदित नाचे नंदकिशोर
चांदी जेडी चांदनी अ छाई च्यारूं और ।। 256 ।।

गोपिया संग गोविन्द रच्यो हो जद रास
याद आज कर उने पहुंची मीरा पास ।। 257 ।।

रात रचायो रास मोहन संग मेडती
उर में हुयो उजास ज्यूँ चंदा री चाँदनी ।। 258 ।।

वेडी भाव विभोर देखि न कोई दूसरी
मन रो नाचे मोर मीरा हद भर नाचती ।। 259 ।।

मीरा मोहन प्रीत लिखिया नहीं लिखिजती
चरणा में रख चीत सांचो सुख जग मायने ।। 260 ।।

राच्यों घणो रास मोहन संग आ मेडती
पुहुप री सुवास जाणक दोन्यू एक सा ।। 261 ।।

मीरा रे मन माय मोहन बसियो मोकलो
छीन भी न छिपाय चोडा में चर्चा हुई ।। 262 ।।

भलो कँवर ओ भोज मीरा ने न मन करी
रावळे देखे रोज बढ़तो प्रेम हदभांत बो ।। 263 ।।

अन्नकूट रो अवसर महला मीरा मनावियो
धणी आगे भोग धर अरज करे अनभावती ।। 264 ।।

 भरिया छप्पन भोग थाल सजाया थिरचा कर
लारे देखे लोग मनवार करती मेडती ।। 265 ।।

राच्यों घणो रास मोहन संग आ मेडती
पुहुप री सुवास जाणक दोन्यू एक सा ।। 266 ।।

 मीरा रे मन माय मोहन बसियो मोकलो
छीन भी न छिपाय चोडा में चर्चा हुई ।। 267 ।।

 भलो कँवर ओ भोज मीरा ने न मन करी
रावळे देखे रोज बढ़तो प्रेम हदभांत बो ।। 268 ।।

अन्नकूट रो अवसर महला मीरा मनावियो
धणी आगे भोग धर अरज करे अनभावती ।। 269 ।।

भरिया छप्पन भोग थाल सजाया थिरचा कर
लारे देखे लोग मनवार करती मेडती ।। 270 ।।

अरज करे अनभावती जीमो थे जगदीश
मीरा री मनवार अब खाओ थे प्रभु खीच ।। 271 ।।

भरिया छप्पन भोग थाल सजाया थिरचा कर
लारे देखे लोग मनवार करती मेडती ।। 272 ।।

बाजरा रो ओ बण्यो अन्नकूट अनमोल
जल्दी सी जिमल्यो बोली मीरा बोल ।। 273 ।।

विदुरानी हेत विशेष छिलका तक छोड्या नहीं
हरी जीमो हमेश मनवार करे यूँ मेडती ।। 274 ।।

देखो दासी और विनती कर वाणी थकी
जोवती कर जोर जीमे कदै ओ सांवरो ।। 275 ।।

मीरा री मनवार प्रीतम आवो पावणा
बोले बारम्बार झट आवो जगदिशरा ।। 276 ।।

भोग लग्यो भगवान रे मीरा हरख मन माय
उछब बण्यो सुन्दर अति जो तो बरनी न जाय ।। 277 ।।

अन्नकूट रो अवसर महा महातम मान
गिरवर अर गाव री पूजा इणरे पाण ।। 278 ।।

इन्द्र कोप करयो अति बरसी घण बरखाह
गोविन्द धारयो गिरि राखी ब्रज रगसाह ।। 279 ।।

पूजा गिरि री प्रथम पाछे गऊ न पूज
देवेन्द्र दुखी भयो सक्यो और न सूझ ।। 280 ।।

आखर इन्द्र आवियो हरी सूं मानी हार
आज उणी री याद में तद् माना तुंवार ।। 281 ।।

पूजो पैली परकरती सरजे पाले संसार
ओ ही ईश्वर आपणो प्रभु करयो प्रचार ।। 282 ।।

रक्षा इणरी राखज्यो साँस देवे संसार
काटो बिरछा न कदै सबसूं मोटो सार ।। 283 ।।

नदी नाला रो नीर कदै न गंदलो करो
साजा रैवे शरीर बिरछ जो बढ़ता रवै ।। 284 ।।

जग रा सारा जीव प्रकृति सूं ही पलै
सुख री नी व्हे सींव जो आरी रगसा करा ।। 285 ।।

तरुवर जमना तीर मोहन मुरली बाजती
चढग्यो लेने चीर गोपिया जद न्हावती ।। 286 ।।

बांसुरी दे बांस मीठी धुन मन मोवती
नहीं करणो नास जंगल रो हे जीवड़ा ।। 287 ।।

देखो जीवता देव बिरछ सरोवर नदी तणा
सदा करो सेव जो सुख चावो जीव रो ।। 288 ।।

बीत्या आठ बरश् मीरा रा मेवाड़ में
हरी संग रहती हरष भोजराज रो भलपणो ।। 289 ।।

बैमाता लिखया बहुत बे आखर नी बांच
मीरा रा सुख भाग में आती दिसे आंच ।। 290 ।।

सुख थोड़ो आयो सही झट ओ जातो जाय
भोजराज छोड़े भलो मीरा एकली माय ।। 291 ।।

सूनी करगो सेज एक मोटो हो आसरो
नाभो हुयो निस्तेज दुःख रो घण दरियाव ओ ।। 292 ।।

विधना दिनी विपति परलोक सिधायो पीव
अनहोनी हुवी अधक जाणक निकस्यो जीव ।। 293 ।।

सांगा री संतान आंख्या सामै ओझली
भूंडी करी भगवान बुढ़ापो बैरी बण्यो ।। 294 ।।

सांगा सुत अति सूर बड़ो वीर बलवान
भांगी जाणक भुजा रोवण लाग्यो राण ।। 295 ।।

मिटी माथे मांग मीरा रे सुहाग री
सोचे राणो सांग चिंता में डूब्यो अधिक ।। 296 ।।

पड़ियो जाणक पहाड़, आंबर फाटयो अधिक
देसी कुण दहाड़ ,शेर आज सुरगां गयो ।। 297 ।।

जोधो जबर जवान, अणसमै ही आंथगो
हुवी मोटी हान, मेवाड़ धर माइने ।। 298 ।।

मीरा रो मनमीत, धरम राख्यो धीर धर
अजब हुई अणचित, सरग सिधायो साथ तज ।। 299 ।।

पति बिना नहीं प्रीत, जग सारो जंजाळ ज्यूँ
चरणा में रख चीत, नारी धर्म निभावती ।। 300 ।।

साथ रह्या म्हारे सदा, बणी रही सब बात
अब रहस्युं एकली, एहड़ी हुई अनाथ ।। 301 ।।

मोहन थारी मूरति, पहलो पति मै पाय
दूजो राणो देखियो, सदा रह्यो मम साय ।। 302 ।।

मन रो पति मुरार, तन रो पति सिसोदियो
नहीं मैं विधवा नार ,नहीं सुहागन ही रही ।। 303 ।।

मन सुहागन म्हावलो, विधवा हुयो तन्न
सुहाग दुहाग साथ में,सोच रह गई सन्न ।। 304 ।।

आंख्या सूख्या आय ,आँसुंडा निकसे नहीं
दुविधा री दवाय ,जग ढूंढ्या न मिले ।। 305 ।।

जाणे केड़ो जोग , करमा में म्हारे लिख्यो
रहसि जग रो रोग ,मिटे कदै न जगत में ।। 306 ।।

जावे मति जोगीह जीवन थारे बिन नहीं
हेकलि मैं होगीह मुश्किल होसी मारगो ।। 307 ।।

पंथी म्हारा पंथ रो सदा निभायो साथ
किंकर जमारो कटे नहीं रह्या नाथ ।। 308 ।।

सब आया सरदार राणा वाली रीत सूं
विरथा करे विचार सत उपजे तो सही ।। 309 ।।

बोली सुण आ बात मीरा मन सूं कही
नहीं छोड़ू मैं नाथ मोहन संग मई रहूँ ।। 310 ।।

अबहुँ न अग्निस्नान क्यूँ कर मै तो करूँ
जग कुरीत जाण सांगा खुद समझाय दी ।। 311 ।।

रूडी नहीं आ रीत सती न ही सती करे
पहचाने न प्रीत जीवत जलावे जीव ने ।। 312 ।।

पायो अमर मै पीव मीरा रो ओ मरे नहीं
जिणसूं लाग्यो जीव नहीं छूटे निस्चे कहूँ ।। 313 ।।

रोको अब आ रीत शरीर जल्या सती हुवे
जो लेवे है जीत आत्म सो सती हुवे ।। 314 ।।

सांगा दिन्यो साथ मीरा री मानी कही
नमी मेवाड़ नाथ आखर आज विदा हुया ।। 315 ।।

पञ्च तत्व ने पायगी भोजराज री देह
मेडतनी रोवत महि कुण सके आ केह ।। 316 ।।

सूनो हुयो संसार भोज बिना भव तरे
आत्म रो आधार ले मीरा अब जीवणो ।। 317 ।।

सांगा करी साय सती होणा सूं बची
कलपे घणी काय बिन सांगा काई बणे ।। 318 ।।

विधवा धारया वेश विधना री मरजी वही
काया घण क्लेश भोजराज बिन भोगसी ।। 319 ।।

पति गया परलोक अब मोहन रो आसरो
सदा रहे न शोक हरी सबरी विपति हरे ।। 320 ।।

नित हरी रो नाम रटती मीरा रात दिन
केवल ओ ही काम मीरा अब महला करे ।। 321 ।।

पैली उठ प्रभात नित नेम नित रा करे
गोविन्द गुण गात रोज रिझावे राम ने ।। 322 ।।

बेग गया दिन बीत मीरा मोहन में रमी
चरणां में रख चीत सदा सुमरती सांवरो ।। 323 ।।

कमी न राखे कोय सेवा में वा श्याम रे
दिखे उनने दोय स्वयं एक अर सांवरो ।। 324 ।।

पूजा करती प्रथम और काम पाछे करे
एहड़ी राह अगम मीरा चाली मनमते ।। 325 ।।

सेवा रो सुभाव सम्पयो मीरा सांतरो
भूली दूजा भाव दुनिया तजदी दूर सूं ।। 326 ।।

भगति वाळो भाव अंतस मीरा उपज्यो
ठाकर थारो ठाव अब पकड़यो मीरा एकली ।। 327 ।।

मोहन म्हारो मालको देखो मीरा दास
साठ घडी रट सांवरो वीरो ही विश्वास ।। 328 ।।

महल बण्यो मंदिर महा मोहन बैठ्या मांझ
खड़ताला खड़कावती झालर बजता झांझ ।। 329 ।।

पद बनावती प्रभु रा गाती खुद ही गान
मगन होवती मेडतनी भूल जावती भान ।। 330 ।।

रच पद खुद रिझावती सुन्दर प्यारो श्याम
गोविन्द रा गुण गावती सुबह देखे न शाम ।। 331 ।।

भाव व्हिवल होती भोत नैणा झरतो नीर
मन पंछी मंडरावतो सुधबुध भूल शरीर ।। 332 ।।

एक ध्यान बस आपको दूजो नी दरसात
मौन धारती मेड़ती बंद कर देती बात ।। 333 ।।

बनी जाने बावळी बा सुधबुध बिसराय
रीत भुलगी रावली हुवी आ कैडी हाय ।। 334 ।।

नींद भुलाई आ निशा रोती दिन आर रात
कहती सुन तू किसना तन ने क्यूँ तड़फ़ात ।। 335 ।।

विरहन आली विगत खुद ही जाने खूब
मोती लावे मानखो डरे नहीं जो डूब ।। 336 ।।

विरहन करे विलाप, सुण झट आजा सांवरा
धीरज राख्यो धाप, तो भी तू आयो नहीं ।। 337 ।।

धर नहीं भावे धान, नैना री गमगी निंदडली
मीरा मन न मान, हरी लारे जोगण हुवी ।। 338 ।।

पीली पड़ी ज्यूँ पान, रूप जाणक पिंड रोग
लंघन करबा वा लागी, जबरो साध्यो जोग ।। 339 ।।

रसना पर श्याम रट ,घट भीतर घनश्याम
रटती मीरा एक रट, आ मोहन अठ याम ।। 340 ।।

औषध हुवै अनेक, दुनिया रा हर दरद री
इणरी ओखद एक, श्याम सलोनो सांवरो ।। 341 ।।

बिरहन है बीमार, जनम जनम री जोगणि
मिल्या कृष्ण मुरार, रोग मिटे ओ रावले ।। 342 ।।

बिरथा हुयो बैद, इणरी कोई ओखद नहीं
काया तो है कैद, इणमें तडफे आत्मा ।। 343 ।।

विरहण रो व्योहार ,पागल जेहडो ही हुवै
करी आछी करतार, भूंडी व्ही भला घरा ।। 344 ।।

आहट सुण अखड़ीजति, दौड़ी जाती द्वार
सामो आयो न सांवरो, हिवड़ो जाती हार ।। 345 ।।

पल पल जोती पंथ ,आंगलिया दिन आ गिणे
कद आवेलो कंत, सोच समन्दर डूबती ।। 346 ।।

मीरा हरदम मूरती मोहन लीनो मान
लाड घणा लडावती धरती उणरो ध्यान ।। 347 ।।

अधखुली आंखिया सूरत मन संजोय
प्रभु जिणरो पिया कर सके किम कोय ।। 348 ।।

होठा फड़फडी हुई बोल सके न बोल
सारी बिसरी सुधबुधि एहड़ी हुई अडोल ।। 349 ।।

कंम्पत है दोय कर थर थर गात थरन्त
दुर्बल देह देख दशा उपजे पीर अनंत ।। 350 ।।

भूली पहरण भेख घूंघट गाती भूलगी
दशा अनमणि देख दुःख पावे दरबार सब ।। 351 ।।

मन में मनाती मोहना अब आसी इकबार
कृष्ण दर्शन कारणे करया जुगत कई बार ।। 352 ।।

पहचाने कुण पीड़ पड़ी न बिवाई पग्ग
विरहन की आ व्यथा जानत नहीं ओ जग्ग ।। 353 ।।

मीरा बनायो मीत सारा जग में सांवरो
बीखो जासी बीत श्याम मिल्या सुख होवसी ।। 354 ।।

घूमे घेर घुमेर केड़ो मीरा निरत करे
फोड़ा विधना फेर भाग लिख्या भुगतसी ।। 355 ।।

पागल हुई प्रेम में बोले अटपट बैन
सदा सुमरे सांवरो नींद न लेवे नैन ।। 356 ।।

बोले मीरा बावळी ,सांगा करे सहाय
करे सो करबा देवो, आ समझावे आय ।। 357 ।।

आ श्याम ने आदरे, माने पति मन माय
मन इणरो मोहन मही ,दिखे ओ दरसाय ।। 358 ।।

आज सुणी अजीब, सांगा रा समचार जद
जहर दियो है जीव ,दोखी रो लग्यो दाव अब ।। 359 ।।

हुवी मोटी हाण, मेवाड़ रो महीपति
जहर दीन्यो जाण, कोई दुस्मि कपट कर ।। 360 ।।

पेल्या पति सिधाय, सुसरो अब सुरगा गयो
पड़ी विपदा हाय, मीरा रे एक साथ ही ।। 361 ।।

सांगा रो हो साथ, भगति में न भंग पड्यो
नहीं रह्या दोन्यू नाथ ,हांची मीरा में हुई ।। 362 ।।

लीला लखी न जाय, लीलाधर केडी करी
हाय विधाता हाय ,मीरा पे मोटो पीसीयो ।। 363 ।।

मीरा एक दो मार ,एक साथ ही आवई
पड़सी कैंया पार ,लोग सोच आ ही करे ।। 364 ।।

सांगा घणो हो सूर, मोटो धणी मेवाड़पत
काळ बड़ो ही कूर, प्राण खिंचिया पल मही ।। 365 ।।

विष दीन्यो विचार, औषध नहीं अब हुवै
कुण जाने किरतार, लीला काई करणी चवै ।। 366 ।।

सांगा सरग सिधारता ,पलट्यो सारो पाट
विक्रम बैठ्यो विण जगा ,अनमी राखे आंट ।। 367 ।।

कुरब करे न कायदो, हेकड़ी घणी हमेश
बैरी भगति रो बड़ो ,दुखी हुयो सब देश ।। 368 ।।

महला माही मूरती, गिरधर रा सुण गान
रीसा भरियो राजवी, फट काढ्यो फरमान ।। 369 ।।

राजा वाळी रीत, पालण करनी प्रथम
मोहन माने मीत ,मीरा भाभी मुश्कल करे ।। 370 ।।

बोल्यो माँ ने बैन ,समझाय मीरा न सको
रटनो हरी दिन रैण, कोजो लागे काम ओ ।। 371 ।।

मैं हूँ अब मेवाड़पत, हुवै जग में हाँस
नीच कदै नमे नहीं, बड़ो हुवै ज्यूँ बांस ।। 372 ।।

मानो कुल मरजाद, राजा रा हाँ राजवी
बुरो हूँ अज रे बाद, मीरा भाभी न मानसी ।। 373 ।।

पूजा करो प्रेम सूं ,सुबह तथा शाम
मन में चाहे मोक्लो, नटवर नागर नाम ।। 374 ।।

मंदिर मूरत मेल ,सेवक राखूं सांतरा
पूजूं सबसूं पैल, कमी न राखू कांय री ।। 375 ।।

उच्छब करूँ ओपता ,किशन खातर कहो
नित बाजे नोपता, मंदिर मोहन माय ने ।। 376 ।।

अरजी आ ही आप सूं, भावज समझाज्यो भला
पुन्न बड़ो है पाप सूं ,जामण कर जोड़ कहूँ ।। 377 ।।

विक्रम री आ वारता, मायड़ मनडे माय
मीरा कने मोकळी , बोली यूँ बतळाय ।। 378 ।।

बेटी सुण तू बात , समझ इणने सांतरी
नहीं रह्या अब नाथ , क्यूं तू मनचाही करे ।। 379 ।।

भले ही कर तू भजन ,लख ने कुल री लाज
मीरा सुने व्हे मगन, धरे नहीं वा ध्यान जद ।। 380 ।।

दुबिधा में फंसी , मायड़ मन विचार करे
हड़ हड़ मीरा हंसी, मै नहीं छोड़ू श्याम ने ।। 381 ।।

कितरी मनवारा करी ,मीरा मानो बात
हिरदा में राखो हरी, पण निभावो पात ।। 382 ।।

रत्ती न माने रीत , मीरा मन चाही करे
प्रभु सूं लागी प्रीत, मैं न तोडू मावड़ी ।। 383 ।।

राणो करे भल रीस ,कोई परवा नी करूँ
एक म्हारो है ईश, दूजा न मानु नहीं ।। 384 ।।

होणी हो सो होय ,अनहोनी होवे नहीं
जलम्यो जग में जोय, मीरा ने जो मना करे ।। 385 ।।

ईश्वर रो आधार, राणा बिना ही रेवणो
चांदनी दिन च्यार ,क्यूं राणो लटका करे ।। 386 ।।

साँवरियो है साथ , पछे चिंता न पालणी
चार भुजा रो नाथ, चरणा करस्यूं चाकरी ।। 387 ।।

राणा सोचे रात दिन ,मीरा किम मनाय
सोच सोच अर सोचियो ,किम छुटकारो पाय ।। 388 ।।

मीरा भगती माय , एहड़ी रमी जोर सूं आ
आन करूँ मैं उपाय, सोच करे राणो सुभट ।। 389 ।।

शिव मंदिर सुहाय ,दर्शन करबा राण गयो
उपज्यो एक उपाय ,शिव गले में सर्प देख ।। 390 ।।

विषधर ने भेजू वठै ,मीरा महला माय
काटे तो कलंक कटे ,आछो ओ ही उपाय ।। 391 ।।

कालबेलिया ने कह्यो ; जंगी विषधर जोर
जहरी हुवै वो जबर; मनसा पूरो मोर ।। 392 ।।

कालिन्दर लायो कालच्यो , छबड़ी बिच छुपाय
भेज्यो राण भावज कने, परसादी मीरा पाय ।। 393 ।।

द्वारका सूं दर्शन कर, पंडत लायो प्रसाद
भाव सहित भेजवी, संता ने साधुवाद ।। 394 ।।

छाबड़ी ले न डावडी, मीरा महला मांझ
पावो प्रसादी प्रेम सूं,सुमिर सांवरो साँझ ।। 395 ।।

द्वारावती सू आयो द्विज ,प्रसादी ल्यो थे पाय
मीरा मोहन में मगन, लीन्हयो हाथ लगाय ।। 396 ।।

प्रसादी म्हारा परमेसरा ,हांची मन हरसाय
आज म्हारे आवई ,कमी नहीं अब काय ।। 397 ।।

दासी रह गई दंग ,पिटारो खोल्यो प्रथम
प्रभु हार बण्यो पनंग ,ओ अचरज देख्यो अजे ।। 398 ।।

हरी भेज्या मोहे हार, राजी व्हे मीरा रो पड़ी
नाथ अभागन नार, जाण कृपा मो पे करी ।। 399 ।।

धिन धिन दीनदयाल ,अरज करूँ मैं आपसू
सदा करज्यो संभाल ,मीरा थारो नाम ले ।। 400 ।।

दासी दौड़ी दौड़, राणा सूं कही विगत
छबड़ी आई छोड़, मौत बनी गज मोतिया ।। 401 ।।

मरे न मीरा मार ,आ हरी भगति रे आसरे
हांच्या बण्यो हार ,लीला आ अद्भुत हुई ।। 402 ।।

राणो करे रीस ,किंकर मीरा फंद कटे
आडो आवे ईस, जादू तो मीरा जानती ।। 403 ।।

हंसकर पैरयो हार ,मीरा मोहन ने कवे
आप भेज्यो उपहार ,धिनबाद थांको करूँ ।। 404 ।।

नमूँ थाने मैं नाथ ,महर घणी म्हा पर करी
सांवरिया रो साथ, जन्म सफल जाण्यो अबे ।। 405 ।।

हरी ने पैरायो हार ,पल पल पीळो पलकतो
अरपण करियो आर ,मीरा मोहन मूरती ।। 406 ।।

भगता रो भीड़ू सदा, आवे सुण आवाज
अंतस में आवास करे, लव में राखे लाज ।। 407 ।।

हुवी न कोई हाण , मृदंग बजावे मेडती
रोस भरियो राण ,करे तो अब काई करे ।। 408 ।।

दिन दिन बढ़तो दरद , राती आँख राणा हुई
मीरा आगे मरद , हिम्मत राणो हारियो ।। 409 ।।

करूँ अब मैं काय, राणो सोचे दिन रात आ
दरसे नहीं दिखाय , काई जतन राणो करे ।। 410 ।।

मायड़ री नी मानती ,मीरा महला माय
सोच आ चिंता सदा ,अब सूझे न उपाय ।। 411 ।।

निश री उडगी नींद ,माँरुँ कैया मैं मेडती
आंख्या हुई उनींद ,राणो जगरातो करे ।। 412 ।।

बड़ा घरा री बात ,लोक लाज जावन लगी
घणी भली है घात, मीरा ने मैं मारस्यु ।। 413 ।।

अनेक सोचे उपाय, कद मारूँ मीरा कहो
जोगण जीव जलाय ,देखत उपजे दुःखडो ।। 414 ।।

रावला री रीत ,कान कुरब करनी पड़े
भावज बणी भींत ,नीत रीत जाने नहीं ।। 415 ।।

आखर सोच उपाय , उदा ने याद करी
आ तो भागी आय, बचन कहो बीर सा ।। 416 ।।

बोल्यो मन री बात ,जहर दिराणो जोगणी
पेलोडे परभात ,विष हलाहल वैद रो ।। 417 ।।

प्यालो ले पीवी प्रथम ,उदा दौड़ी आय
मरसी मीरा मेडती, जुल्म न देख्यो जाय ।। 418 ।।

लीला जसोदा लाल री, विष भयो वरदान
भजन करती भाव सूं ,कर विश्वास न कान ।। 419 ।।

मीरा हुई न मून ,राणो भरियो रीस में
कपटी है ओ कुण, जहर दियो नी जाणके ।। 420 ।।

बुलावो पाछो बेद ,हलाहल हलको दियो
अब मिटी उमेद ,मीरा म्हासूं नी मरे ।। 421 ।।

बेद लियो बुलाय ,काई हुयो कारण कहो
मरी न मीरा माय ,भूल एड़ी थारी भइ ।। 422 ।।

रीस भर राणो कह्यो ,चिनो सो ल्यो चाख
चाखत ही सीधो चल्यो, इणरी फ़िरगी आँख ।। 423 ।।

मरियो बेद मजाक में ,हुई मोटी हाण
उदा दौड़ झट आवई ,रोवण लाग्यो राण ।। 424 ।।

रोवण री आवाज रुख, मीरा कानी मोकळी
देख सके नी दुःख ,कहती ओ काई हुयो ।। 425 ।।

बिष चढियो है बेद, प्राण पखेरू ऊड़िया
भले बतायो भेद ,राणो अब रो रो कवै ।। 426 ।।

मीरा मन ने मार, विष्णु सूं विनती करे
आप बचाओ आर, बेद तणो बिष हरो ।। 427 ।।

बड़ो रैवे बैचैन ,राणो सोवे न रात ने
मीरा ने मारण वास्ते, घणो लाग्यो घात में ।। 428 ।।

शिकारी बुलाया सांतरा, हुकम करयो हँकार
जावो थे जावो झट ,तुरत करो तैयार ।। 429 ।।

केहर इक ल्यावन कह्यो, पकड़ पिंजरा माय
जा घेरयो जंगल तुरत, हाको कीनो हाय ।। 430 ।।

पिंजरा में लियो पकड़, राजी हुयो राण
मीरा महला मोकळा ,पाछे बचे नी प्राण ।। 431 ।।

महला री खिड़की, माहि बब्बर दिनों बाड़
मीरा आज मरे परी ,खुलो पिंजर कवाड़ ।। 432 ।।

मीरा देख्यो महल में ,बड़ो पिंजरों बहोत
नेड़े जाने न्हालियो ,जगमग दमके जोत ।। 433 ।।

मायने बैठ्या मदन, मीरा देख मुस्काय
पूजा थाल ल्याई पुनः, लिलवट तिलक लगाय ।। 434 ।।

आरती करे अति, हंस हंस हरिजस गाय
राणा भजना रव सुनी ,ओ खुद देखण आय ।। 435 ।।

मीरा भजना में मगन, केहर सुने धर कान
मीरा घणी महान है, रुस्यो देखन राण ।। 436 ।।

मीरा हीरा मोती ज्यु, चमके च्यारूं कूंट
राणो कंकर रेत ज्यूँ, पड्यो रवै परपूंठ ।। 437 ।।

डरयो आज डाढाल, मीरा रो लख मोह
राखे ज्यांरी रखवाल, काई करे अब केहरि ।। 438 ।।

मीरा ने नमायो माथ, झट कूद जंगळ गयो
हरी ने जोड्या हाथ, शेर रूप थे सांवरा ।। 439 ।।

नरसिंह बन नाथ ,सहाय करी पहलाद री
सांवरिया बण साथ, मीरा रो दियो मृगा ।। 440 ।।

आंख्या आया आंसूडाह, दया देख दयाल री
साँवरियो री छाँह, कुण चिंता पाछे करे ।। 441 ।।

राणो माँडी राड ,मीरा न खुद मारस्यूं
बण्यो राणो बाड़, खुद खेत ने खावसी ।। 442 ।।

इक दिन सुणी आवाज, मीरा रा निज महल में
करस्यु पूरो काज, राणो आयो रीस में ।। 443 ।।

कुण्डी बजर किंवाड़, जा बजाई जोश में
पर पुरुष री आड़, मीरा बाता मैं सुणी ।। 444 ।।

खोलत बजर कपाट/ खुलगी आंख्या राण री
ठाकुर बैठ्या ठाट, मीरा मोहन मनावती ।। 445 ।।

राणो भरियो रीस में ,काढ़ी कमर करवार
पूछ्यो कुण है पर पुरुष, बाता करतो बार ।। 446 ।।

मीरा तने मारस्युं, पानी गयो पाताल
होणी सो अब होवसी, झट बोल्यो कर झाळ ।। 447 ।।

मीरा कह मारो मने ,तुरत हुई तैयार
राणो देखत ही रह्यो, होगी मीरा हजार ।। 448 ।।

कुण कुण ने काटसी, सेवट करियो सोच
मीरा ने अब मानियो, पड़ियो राणो पोच ।। 449 ।।

सब जगा है सांवरो, घट घट में घनश्याम
जन्म सुधारो जीव रो, करल्यो थे शुभ काम ।। 450 ।।

मीरा रो मोहन अबे दिनों परचो दिखाय
राणा रे मन रही बात घणी बिलमाय ।। 451 ।।

किणी घणी कुबद पड़ी एक न पार
मीरा राखे मालिका समझ्यो सारो सार ।। 452 ।।

मीरा अब नी मानती महला रहणो माय
भजन सुन भागती मोहन मंदिर माय ।। 453 ।।

गाती गोविन्द रा गीतड़ा खड़काती खड़ताल
नाथ आगे बा नाचती बजा बजा ने ताल ।। 454 ।।

साधू संता साथ हरी रा हरीजस गावती
मंदिर नमावन माथ महल छोडिया मेडती ।। 455 ।।

कर सूं मीरा अब कसे तंदूरा रा तार
मन का मोटा मानका बजावे बारम्बार ।। 456 ।।

हृदतंत्री ने हिलावती रसना अति रसाल
भाव भर हरी भजे गावे गुण गोपाल ।। 457 ।।

इकतारो इकतार रो ईश्वर मीरा एक
एक पकड़ बा एकली होगी एकमेक ।। 458 ।।

इक मोहन मूरत इक एकाएक अधिक
एक साधे सो एक व्हे नारायण नजदीक ।। 459 ।।

एक रे सागे एक व्हे एक करयो एकसार
उंच नीच आवे नहीं व्यर्थ करे न विचार ।। 460 ।।

साधा री संगत करे ,भजन भाव भरपूर
मीरा तो माने नहीं ,मेवाड़पत रो मदचूर ।। 461 ।।

गीत गोविन्द रा गावती ,नाचती बांध नुपुर
राणी अब दासी रही ,हाजर हरी रे हुजूर ।। 462 ।।

भगति रो ओ भाव लख ,साधू संत सुजान
आसपास सूं आवता ,गोविन्द रो कर गान ।। 463 ।।

बरजी मीरा ने बहुत ,लोक लाज दी छोड़
चर्चा आ चारुखूंट में ,चमक्यो गढ़ चित्तोड़ ।। 464 ।।

पद रचती नित प्रभु ,गाती खुद ही गान
मृदंग बाजतो मंदिरे ,धरती मोहन ध्यान ।। 465 ।।

मालवा रो मोलवी, बादशाह ने बतलाय
भगत देखा भगवान रो ,चालो चित्तोड़ माय ।। 466 ।।

दुश्मि रो है देश ,राणो चित्तोड़ रो राजवी
बदल्यो खुद रो भेष ,चाल्या बे चित्तोड़ ने ।। 467 ।।

झट मंदिर जाय ,मीरा नाचे मेडती
देख ओ दरसाय ,बादशाह राजी भयो ।। 468 ।।

भली चढ़ाई भेंट ,मीरा ने करके नमन
आया खेलण आखेट ,आ कह दोन्यू ओसरया ।। 469 ।।

अश्व हो असवार ,झट चाल्या जोर सूं
आ खबर पहुंची आर ,राणो भरियो रीस में ।। 470 ।।

दुस्मि आयो द्वार पे, पकड़ सक्यो नी पाय
मोको चुक्यो मोकलो, पुनि राणो पछताय ।। 471 ।।

मीरा रिपु अब म्हावली, रिपु सुण आयो राग
काँटों चुभे कालजे ,जोवे राता जाग ।। 472 ।।

मीरा दिन दिन माण्डियो ,नाच गाण संग नाथ
साधू संगत सांतरी, हरी माला निज हाथ ।। 473 ।।

भगति में भूली अबे ,सांगा र पति बिछोह
बिछोह एक ही बण्यो ,मोहन आळो मोह ।। 474 ।।

तन सूख्यो मन तड़फडयो ,छन छन हरी रो भाव
दन दन देह दुबळी, कण कण तन नहीं खाव ।। 475 ।।

भजन लगन है भली ,रटन लगी अब राम
सुवन जगन सुमरन यही, मदन मोहन घनश्याम ।। 476 ।।

खड़ताल रसाल खड़कावती ,भाल राख़ भुआल
चाल ढाल बदली अबे, जग छोड्यो जंजाल ।। 477 ।।

भगति रो भूषण पहर, हरी नाम सिंगार
एकतारो ओंकार शब्द, बा रटती बारम्बार ।। 478 ।।

योग साध हरी रूप संग ,प्रीतम प्राणायाम
सांसोसास सुमरनी ,अब यह आठौयाम ।। 479 ।।

प्रबल भगति प्रवाह, दिया बंधन तोड़
मीरा बनी मिहिराह ,किरण सहस करोड़ ।। 480 ।।

मीरा चावे मोक्ष आवागमन सूं आंतरी
बंधन लागे बोझ सहवे कैया सांवरी ।। 481 ।।

राणा करतो रीस मीरा ने मारण चवे
सुंप्यो मैं तो शीश सांवरिया रे हाथ में ।। 482 ।।

भली राड सूं बाड़ मीरा मन में सोचियो
चित्तोड़ देवूं छाड़ मैं तो जावूं मेड़ते ।। 483 ।।

मीरा जासी मेडते सुण आया सिरदार
आप बिराजो अठे बिनती बारम्बार ।। 484 ।।

गाँव चोबीस जागीर राज चाल बठे रहवो
नैणा भरियो नीर सरदार सब बिनती करे ।। 485 ।।

जागीर सुंपी जगदीश मृदंग तो म्हे लिया
भगति बिस्वाबिश् करस्यु म्हे संसार में ।। 486 ।।

रूड़ो राणो देस कूड़ो बसे करसान
मीरा जासी मेडते गोविन्द गासी गान ।। 487 ।।

चाली अब चित्तोड़ सूं पुनि पुनि कर प्रणाम
अब पाछी न आवस्युं राखो ज राम राम ।। 488 ।।

अन्नजल इतरो हो अठे जाऊं अब में जाण
सासरिया रा सांस ए पूरा हुया राण ।। 489 ।।

एकर मंदिर आवइ प्रभु ने करयो प्रणाम
रथड़े बैठी राजवी संग ले शालिग्राम ।। 490 ।।

मीरा तज मेवाड़, चाली छोड़ चित्तोड़ ने
फफक पड्या पहाड़, देख मीरा दुमनि ।। 491 ।।

सांगा ली सिरधार, भोज राखी भाव सूं
विक्रम रो व्योहार, मीरा तजि मेवाड़ ने ।। 492 ।।

जलम भोम जावूं अबै, होणी हो सो होय
भगति में भांगा पड़े ,क्यूं रहवै अब कोय ।। 493 ।।

मीरा पहुंची मेड़ते,मायड़ कीनो मान
सधवा गई विधवा भई, जबरी रोइ जाण ।। 494 ।।

उजड्यो मीरा अहवात, जोगन बणी जोर की
गोविन्द रा गुण गात, एक लगन लागी अबै ।। 495 ।।

श्याम कुञ्ज में साथ, मोहन मूरत मोकळी
नमूं द्वारका नाथ, शरणे थारे साँवरा ।। 496 ।।

दशा देख दीवानी सी ,मायड़ पकडयो माथ
राजघरां री राजवी, सो साधुडा साथ ।। 497 ।।

भूण्डा म्हारा भाग ,बेटी म्हारी बिलखती
साथ रह्यो न सुहाग ,करमा में खोटा लिख्या ।। 498 ।।

भखड़ा जेड़ो भेख ,साधू संगत साम्भली
रोवे करमा रेख, राजघरा री राजवी ।। 499 ।।

जलमति मर जाय ,सबूरी मैं लेती सही
करम करया मैं काय ,बेटी भगवा भेष में ।। 500 ।।

मीरा मनडे माय ,रमैयो नित ही रमै
गोविन्द गुण गाय, आनंद में डूबी अबै ।। 501 ।।

भजन भगति अर भाव, मीरा रे मनडे बसे
नित रटती तव नांव, सुमर सदा सुख पावती ।। 502 ।।

जलम भूमि में जाय, मीरा मोड़ मनावती
भलो जैमल भाय, भगत बड़ो ओ भाईडो ।। 503 ।।

चारभुजा रे चौक ,भाई बहन भगति करी
तारे ज तीनू लोक, बे भगति उणरी करी ।। 504 ।।

धन मेडत धराह ,संत सूर जलम्या सदा
कोटि नमन कराह ,जलमी मेड़तनि जठे ।। 505 ।।

प्रगट्यो कोई पुण्याय ,धर्म धजा धव धव करे
साँवरियो है साय ,अमर होगी आ धरा ।। 506 ।।

नैणा बरसे नीर ,भाव व्हिवल जद हुवै
धारे आ नहीं धीर ,श्याम मिलन री चावना ।। 507 ।।

मीरा वीणा हाथ ले ,गावे पद हरी गान
मंदरिये रे मायने, तगड़ी छेड़े तान ।। 508 ।।

दासी में दीनानाथ की ,करूँ सेवा मैं कांय
द्वारका रा नाथ थे ,ल्यो चरणा लिपटाय ।। 509 ।।

बड़भागी मैं हूँ बड़ी ,आप लीवी अपनाय
ओ जमारो यूँ जावतो, नीर अंजलि नाय ।। 510 ।।

जगतपिता मंदिर जठै ,भगति भाव भरपूर
मीरा मृदंग मंजीर संग ,नाचत बांध नूपूर ।। 511 ।।

रंगजी रो रहवास ,मंदिर घण मोटो बण्यो
पहुंची मीरा पास ,इकतारो ले आपणो ।। 512 ।।

पद गावे प्रेम सूं ,रंग जी रे दरबार
रीझे मोहन राग सूं ,मीरा गाय मल्हार ।। 513 ।।

भगति माही भूलगी ,सुध बुध दी बिसराय
गावे रोवे हंसे कदै, आ बात समझ न आय ।। 514 ।।

रोज श्याम रिझावती ,अरजी सुणने आव
दासी दरद दीवानगी, घण हिवडे में घाव ।। 515 ।।

घायल हुई मैं घणी, कुण जाणे मम कस्ट्
चारभुजा री चाकरी, अब करूँ पहर अस्ट ।। 516 ।।

लागी एहड़ी है लगन, स्याम माही समाय
आ विरह री अगन, पल पल में पलकाय ।। 517 ।।

नहीं आवडे नाथ बिन, बीते घडी न बिताय
म्हे जाणु मीरा कवै,दूजो जाण न पाय ।। 518 ।।

बिरहा तणी बीमार ,ओखद मिले न अब अठे
कानुडो करतार, बैद मिले जद बात व्हे ।। 519 ।।

मीरा रो अब मन ,मोहन खातर मसमसे
तडफे बैरी तन, कद मिलसी अब कानजी ।। 520 ।।

वृन्दावन अब विहरणी जासी खुद ही जाय
प्यास बुझी न पुष्करा मीरा कह मन माय ।। 521 ।।

पुष्कर करयो प्रणाम घाट जाय विनवी घणी
सन्मुख जास्यु श्याम वृन्दावन ने व्हीर हुई ।। 522 ।।

अति चाले ऊँतावली मीरा मार्ग माय
ब्रज देशा जो बसे झट मिलस्यू मैं जाय ।। 523 ।।

लगन लगाई लाल सूं दर्शन बिन दुखियार
सूरत देखूं सामने मिटसी दुखडा म्हार ।। 524 ।।

वृन्दावन विहार करतो नित कानो घणो
दर्शन उणरै द्वार म्हे करस्यु मनमीत रा ।। 525 ।।

राधा संग रमण करे म्हाने बिसरयो मीत
बांसुरी बैरण बड़ी चुरायो काना चीत ।। 526 ।।

अनभागी म्हे हूँ अति मोहन मिल्यो न मोय
जतन करया सब जगत रा कमी न राखी कोय ।। 527 ।।

एक ही लियो आधार मोहन थारे नाम रो
गुणी समझे या गंवार सब कुछ तने सोपियो ।। 528 ।।

मान म्हारी मनवार पल भर आजा पावणा
बार बार बलिहार जाऊँ मोहन आप पे ।। 529 ।।

मजल चली मीरा मधुर गिरधर रा गुण गात
मिलणो म्हारा मीत सूं बिसरी दूजी बात ।। 530 ।।

घडी न बिसरे राम नाम लेत नित नेम सूं
ठाकुर रे निज ठाम मीरा चाली मेडती ।। 531 ।।

ब्रजदेशा में बाग़ ,कदली चंपा केवड़ा
तरवर संग तड़ाग ,शोभा घणी सांतरी ।। 532 ।।

लटकी लटकनियाह ,बागा छाई बेलड़ी
कूके कोयलडियाह ,काना में अमृत घुले ।। 533 ।।

शीतल चाले समीर ,तनडा ने तरपत करे
भांगे सारी भीर ,आनंद हुवै मन में अति ।। 534 ।।

पड़िया मारग पान ,पग लाग्या यूँ फड़फड़े
जाणक कोई तान, सुर लय संग छेड़ दी ।। 535 ।।

हरी घणी हरियाल, चरे धेनु चरगाह में
गाया रा गवाल ,ले लाठी लारे फिरे ।। 536 ।।

बजावे कोई बांसुरी ,गावे कोई गीत
आणद करे आवास ,मानव रो बन मीत ।। 537 ।।

रामजी राजी घणो ,कमी न राखी काय
सीधा सादा सब जणा ,सुन्दर सुशील सुहाय ।। 538 ।।

कदम्ब बृच्छ कतार सूं ,बठे घणा बनराय
महके वांरी मिमझरा ,सौरम घणी सुहाय ।। 539 ।।

ब्रज देशा बसणो भलो ,रटनो भलो ज राम
सुख रो तो सुपनो भलो ,ठाकर रो भल ठाम ।। 540 ।।

ब्रज देशा में बिरहणी ,व्याकुल होवे बहोत
साँवरियो नी सांकडो ,रह किम मीरा रोत ।। 541 ।।

रमिया जठे रास ,कदम नीचे कानजी
आवण री अब आस, जुग जुग दुनिया जोवती ।। 542 ।।

बजाई मीठी बैण ,डाळ कदम ने ढूँढती
रीत गई बै रेण ,अब न पाछी आवसी ।। 543 ।।

कालंदी रो कूल ,छुया जो विष्णु चरण
झूला रिया झूल ,बे डाळ्या बुलावती ।। 544 ।।

मगन होय ने मोर ,निरभै वैन में नाचता
भली सुहानी भोर ,कमल दल बिगस्य घणा ।। 545 ।।

गिरि ओ गिरिराज ,हरयो भरयो हिंवाळ सो
तणयो जाणक ताज ,सोवे घणो सुहावणो ।। 546 ।।

घर घर में धीणो घणो, माखन मिश्री माल
दूध दही सूं धापतो ,निरभै ब्रज निहाल ।। 547 ।।

घणी रूपाली गोपिया ,रति लजावे रूप
हंसे खेले हरसे हिय ,आनंदमग्न अनूप ।। 548 ।।

सुन्दर ब्रज सुहावनो, सदा चरण रज श्याम
मीरा पहुंची मेडतनी ,सुमिर सदा मन श्याम ।। 549 ।।

ब्रज भूमि बिरहणी ,श्याम गया सिधाय
बिरहन सूं बिरहन मिली, दशा लिखी न जाय ।। 550 ।।

मीरा गोपी मानियो , जनमी कलजुग माय
गोपिया सखा कर मानियो, मीरा पति बनाय ।। 551 ।।

ब्रज रज चन्दन बणी, मीरा लगाई माथ
पावन हुई परमेशरा, रमिया राधा साथ ।। 552 ।।

ब्रजरज तू बडभागणि, रमिया राधानाथ
चरण चंचल चालिया ,भर भर मुठ्ठी खात ।। 553 ।।

कण रज रे कारणे ,मुख खुलवायो माय
जननी जशोदा ने जदे ,दी त्रिलोकी दिखाय ।। 554 ।।

जिन चरणन की धूल सूं ,अहल्या हुयो उद्धार
मीरा धरी माथ पे ,शीश यही सिंगार ।। 555 ।।

चरण रज ने चावती ,आज मिली अनपार
मीरा रो मन राजी व्हियो, ब्रज माहीने आर ।। 556 ।।

कालिंदी कल कल करे, निथरो जिणरो नीर
धारा धरा छु धन्य हुवी, तरवर खड़ा है तीर ।। 557 ।।

जमना थारो जल ,अमी सम बैवे अबै
कितरा खिल्या कमल ,सौरम फैली सांतरी ।। 558 ।।

मीरा मन में मोद ,ब्रज देख हुई बावली
आवागमन अवरोध ,अठे छूटसिअब अवस ।। 559 ।।

बृंदावन सुन्दर बड़ो ,श्याम सुंदर रो सैर
सकड़ी गलिया सांकरी ,श्याम नाम री लेर ।। 560 ।।

श्याम नाम ही सुणो ,गोविन्द नाम रो गान
श्याम मयी नगरी सुघड़ ,मंदिर महल मकान ।। 561 ।।

नीको घणो ओ नगर, होवे नहीं है होड़
प्रेम सुधा रस पीवतो ,तृष्णा सगळी तोड़ ।। 562 ।।

बिड़ला तुलसी रा बठे ,घर घर में घनश्याम
रोम रोम में रम रह्यो ,सुन्दर मोहन श्याम ।। 563 ।।

गुट्यो जिणरो गात ,मन रा मोटा मानवी
रस बरसे दिन रात ,कृष्ण प्रेम रो घणो ।। 564 ।।

बिलोवे दही बिलोवणो ,गोप्या हरजस गाय
श्याम रंग में संपडयो ,वृन्दावन यो माय ।। 565 ।।

घट्टी री घेघाट या ,श्रवण घणी सुहाय
जाणक बेदया वेद ने ,गण में बेठ्या गाय ।। 566 ।।

मीरा ने मंजिल मिली ,वृन्दावन रो वास
मोहन मंदिर मायने ,आप करयो आवास ।। 567 ।।

निधिवन रे नेडी उठे, मीरा कुटी बनाय
रैवण लागी राजवी ,गोविन्द रा गुण गाय ।। 568 ।।

वृन्दावन में आय बसी ,मोहन मिलबा तांय
पद गावे वा प्रेम सूं ,रहसि श्याम रिझाय ।। 569 ।।

नित उठ दर्शन नाथ रा ,पूजा संध्या प्रात
मीरा मन अर्पण करियो, भूली बीजी बात ।। 570 ।।

संग में जुडी साधव्या ,मण्डली बणी है जोर
भगति जुगति ही भली, जो चावो चितचोर ।। 571 ।।

ब्रह्मबेल्या निशि बिगत, उठती मीरा आप
हरजस गाती हालती ,जपती मोहन जाप ।। 572 ।।

जमना तट पे जावती ,सकल करण स्नान
नित नेम सु नाथ ने ,प्रथम करती प्रणाम ।। 573 ।।

मंगला रा दर्शन माही, पहली दरसन पाय
गुण गोविन्द रा गावती, मोहन मंदिर माय ।। 574 ।।

बालभोग तक बैठती ,मीरा मंदिर माय
मृदंग ताल मंजीर, संग श्याम पद सुनाय ।। 575 ।।

मीरा गाती हो मगन ,निरभै करतीं नाच
घुँघरिया घमकावती ,सुपनो करियो सांच ।। 576 ।।

सूरत निरखे सांवरा, अंतर गयो अकुलाय
कद मिलसी कानजी, यमुना तीरा आय ।। 577 ।।

कदम्ब झाड़ रे कने, जठे चुराया चीर
उभी बाट उड़ीकति ,सोंपन सकल शरीर ।। 578 ।।

मत तड़फा तू मने, मैं बिसरू न तोय
एकर तो तू आवजा ,मुख दिखलादे मोय ।। 579 ।।

दरस थारा देखबा ,ब्याकुल हूँ मैं बहोत
मुरली थारे मुख धरी ,सोहवे बण आ सोत ।। 580 ।।

मुरली तू मुंडै लगी ,कह सांवरिया जाय
मीरा दासी मनरली ,करणी थांसू चाय ।। 581 ।।

निधिवन में निशि, रोज रचे है रास
सुण मीरा हुई सुखी ,अब करस्यु अरदास ।। 582 ।।

मीरा पहुंची वन मही ,निशा हुई जब नाथ
बनवारी री बाटडी,जोवे मुंह धर हाथ ।। 583 ।।

रमसी कानो रास ,सुरती देंखू सांवरी
उर माहि उल्लास ,राजी हुवी राजवी ।। 584 ।।

शरद पूनम सुहावनी ,चमके जोरा चाँद
आ बैठी अब उड़ीकती,सुनियो सुन्दर नाद ।। 585 ।।

घर घर आई गोपिया ,मृदंग डफ अर मजीर्
बाजन लाग्या बाजा बठे ,शीतल बैवे समीर ।। 586 ।।

गोप्या करती गान, मोहन खातर मोहनी
प्रीतम प्रीती पाण ,आनन्द उर हुवे अति ।। 587 ।।

पहर बित्यो प्रथम ,मृदंग बाज्यो मद्धमा
आयो पुरुष अगम, मोर मुकट माथे धरयौ ।। 588 ।।

बंसि मिठा बैन ,काना में रस घुले
नहछे देखे नैन ,जी भर मीरा जोवियो ।। 589 ।।

रमता रमता रास ,मीरा ने देखि माधवो
पाछे आयो पास ,कर पकड़ लीनो किसन ।। 590 ।।

मीरा नमायो माथ ,जलम जलम जोई तने
नेडा आयो नाथ , पुन कोई है परबला ।। 591 ।।

हरी पकड़यो हाथ, रास रमबा रे ताई
सगळी सखिया साथ ,रमबा लागी रात में ।। 592 ।।

बनवारी है बीच में ,सखिया च्यारुंमेर
हाथ थामया हाथ में,घाल्यो मोटो घेर ।। 593 ।।

बाजे मीठी बांसुरी, मृदंग झांझ मजीर्
रमबा लागी रास बे ,चम् चम् चमके चीर ।। 594 ।।

शीतल रात सुहावनी ,सुन्दर शब्द साथ
सखिया संग में सांवरो ,नाचे जग रो नाथ ।। 595 ।।

रूड़ो घणो ओ रास ,शब्दा में सरजू कियां
परमात्म आत्म पास ,जाणक कोई आविया ।। 596 ।।

सखिया है सो श्याम, श्याम खुद सखी तणो
लख छब ललित ललाम ,कोटि काम शरम्या मरे ।। 597 ।।

मीरा रे मन माय ,एक धोखो ओ रियो
नाथ सुणे ओ नाय ,कद अपनासी कानजी ।। 598 ।।

रमता रमता रास ,दो पहर झट बीतिया
अति आनंद उल्लास ,किण विध महिमा मै कहूँ ।। 599 ।।

थमिया सारा थाट ,मोहन कर मनवार घणी
पकड़ी अपणी बाट ,सखिया हिलमिल व्हीर व्ही ।। 600 ।।

मीरा रो मन रह्यो ,ऊण छब में उलझाय
कद मिलसी मोहि एकलो ,सोच रही मन माय ।। 601 ।।

राजी हुई रच रास, निधिवन सूं निकली
अमर हुई अब आस ,मिलसी इक दिन माधवो ।। 602 ।।

नैना सूं निकसे नहीं ,छवि रही यूँ छाय
मुख मुरली मनभरी ,शीश मुकट सुहाय ।। 603 ।।

इण छवि पर वारूँ अबै ,सब सम्पद् संसार
एकर ओरयू आवसी ,म्हारो कृष्ण मुरार ।। 604 ।।

प्रीतम लियो पाय ,अब चावूं न अधिक
मोहन चरणा माय, रैवूं सदा मैं रात दिन ।। 605 ।।

धिन हुई मैं पाय धन ,कृष्ण रतन री खान
सांवरिया रे सामने, सब धन धूल समान ।। 606 ।।

खरच्या सूं खूटे नहीं ,चोर न लूटन चाय
नाम रतन रा नग घना ,मोत्यां मूंघा माय ।। 607 ।।

बो खरच्या ही बढे ,दिन सूं सवायो रात
नई खरचूं नष्ट हुवे ,लाला एहड़ी लखात ।। 608 ।।

नदी में सत री नाव ,सद्गुरु खेवट सांतरा
आन न कोय उपाय ,भवसागर सूं तरण ने ।। 609 ।।

अविनाशी प्रभु आप ,छीन भंगुर ओ जगत छै
पुरबला सब पाप ,मोहन नाम लिया मिटे ।। 610 ।।

चाकर थारा चरण री ,रेह्वु मैं ब्रजराज
इतरी विनती आप सूं ,करती मीरा आज ।। 611 ।।

चाकर राखो चरण री ,नहीं राखु कोई चूक
बाग लगाऊँ ब्रज में ,कोयल बन करूँ कूक ।। 612 ।।

हरिया बागा में हरी ,अवस पधारो आप
सेवा करस्यूं सांतरी ,आनंद सूं अणमाप ।। 613 ।।

क्यारी फूला री करू, गेंद फूल गुलाब
पहर कसुमल पोमचो ,पूजा करस्यु आव ।। 614 ।।

जोगी करता जोग ,तपसी तो तप करे
श्याम तणो संजोग ,सेवा साटे पावस्यु ।। 615 ।।

साधू संगत सांवरा, सेवा करस्यु श्याम
भाव भगत जागीरी, देवो थे बिन दाम ।। 616 ।।

सुमरन खरची सांवरा ,दर्शन ही है दाम
हरी दर्शन री हाकमी, करस्यु तीनू काम ।। 617 ।।

मोर मुकट है माथ पर ,पैरया पीताम्बर पीत
गोकुल माहि गायडी ,मोहन चरावे मीत ।। 618 ।।

चाकर घट चौबीस, सेवट राखो सांवरा
इक थे ही हो ईश, छोड़ थाने जांवुं कठे ।। 619 ।।

वृन्दावन रो वास ,सुंपो म्हाने सांवरा
आहि मोटी आश, पूरो म्हारा पीवजी ।। 620 ।।

चरणा रहूँ चिपटाय ,पल छोड़ू न परमेसरा
मीरा रे मन माय ,इच्छा बस आ ही रही ।। 621 ।।

मीरा री महिमा सुणी ,आवे संत अवधूत
धन धन मेडत रा धनी ,धन है कुल रजपूत ।। 622 ।।

भगति मीरा री भली, कीनी कृष्ण काज
वृन्दावन वासो कियो ,छोड़ सकल सुख साज ।। 623 ।।

भावे नित हरी भजन ,और न कोई आसरो
लागी एहड़ी लगन ,किकर टूटे आ कहो ।। 624 ।।

साठ घडी रटती सदा ,नित गोविन्द रो नाम
प्रभु प्रीतम रो आसरो ,सरे सकल अब काम ।। 625 ।।

हिवड़ा में बैठ्यो हरी ,मीरा मंदिर माय
जो छवि चित में बसी, न देखि जग माय ।। 626 ।।

आठ पहर आ एक रट ,कद मिलसी कानजी
कदै मंदिर कदे तट ,ढूंढ्त फिरती मेडतणी ।। 627 ।।

दिन बित्या संग रात, मीरा नेह पल पल बढ्यो
बात हुई बिख्यात ,मीरा मोहन प्रेम री ।। 628 ।।

आवे देखे लोग ,मोहन दीवानी मीरा जदै
प्रेम वालो रोग ,बिन ओखद संसार में ।। 629 ।।

तन तंदूरा संग रवै ,मन मोहन रे माय
तन मन दोन्यू तज पुनि, लो में लो समाय ।। 630 ।।

अलगी न रैवूं आज, मोहन में चांवु मिलण
किशन इणही काज ,लागी मीरा लाडली ।। 631 ।।

नित मंदिर में नाचणो गाणों गोविन्द गान
करणी हर सूं बिनती मीरा मोहन तान ।। 632 ।।

प्रेम पंथ री पावडी चाली मीरा चाल
हरी सूं लगायो हेत आ नित होती निहाल ।। 633 ।।

गोकुल री गलिया माही गाती गिरधर गान
गोपया संग संग गावती मीठी मीठी तान ।। 634 ।।

दरखत कदम्ब रो देखियो लाग्यो मीरा ध्यान
पूरब जनम री वार्ता लागी अब दर्शान ।। 635 ।।

मीरा ही जद माधवी बैठी रथ बिमान
लारे लारे लाडलो आयो कृषण आन ।। 636 ।।

रथ रुकायो राजवी कह मम प्रीतम कान
सब सखिया देखि अबै भावज मुख दिखलान ।। 637 ।।

मैं नहीं मानी माधवी अति ली घूंघट ओट
मोहन मोहि दर्शने नेड़े आयो लोट ।। 638 ।।

भावज मुख दिखलाय सुन्दर चन्द्र चकोर
देखि सारी गोपिया नहीं देखि नवलकिशोर ।। 639 ।।

बार बार री बिनती मानी गोपी नाय
पहली बोल्यो प्रेम सूं पाछे रीस दिखाय ।। 640 ।।

मुख दिखादे माधवी बिनवुं आखरी बार
गोकुल रो गोपाल ओ सृष्टि सरजनहार ।। 641 ।।

मोड़ लियो झट मुख नहीं दिखायो लाल ने
देख्यो हिरदे दुःख कृष्ण कलपत यूँ कह्यो ।। 642 ।।

मैं तरसुं तुझ मुख ने तरस रहेगी तोय
मीरा बनी वा माधवी जग में भटकी जोय ।। 643 ।।

सांवरिया रो श्राप मीरा ने महंगो पड्यो
अब पछतावे आप श्याम श्याम रटती फिरे ।। 644 ।।

चेतो हुयो चित्त में जागी मीरा जाग
गोकुल री ग्वालीना बेगी आई भाग ।। 645 ।।

सुध बुध भूली संवारी पल पल श्याम पुकार
घेर लियो है गोपिया नन्दगाँव नर नार ।। 646 ।।

कुण पुकारे कृष्ण ने मझ कलजुग रे माय
कुण देशा सूं आवई रहती रट लगाय ।। 647 ।।

राजकुल री राजवी साध्वी बणी सुहाय
एक रट अठ पोर आ गोविन्द गोविन्द गाय ।। 648 ।।

गरब गळ्यो है गोपिया देखत मीरा रूप
मोहन खातर मारयो सुन्दर सकल सरूप ।। 649 ।।

भगती इतरा भाव सूं नहीं देखि मैं नाय
राजघरा री राजवी आ लीनी अपनाय ।। 650 ।।

हुवै न कोई होड़ मीरा भगती मान री
जनमी एहड़ी जोड़ ब्रज माही अब तलक ।। 651 ।।

गोकुल री गोपिया सुनकर आई साद
मोहन नाम ऊचारता या कुण करती याद ।। 652 ।।

ग्वाला गाँव गिरिराज रा भेला हुया भाग
मोहन शब्द मन माहि उपजावै अनुराग ।। 653 ।।

ग्वाला अर गोपिया दोन्यू रह्या देख
मीरा रटती माधवा लिख्या लिलाड़ी लेख ।। 654 ।।

सुध बिसरी शरीर री मन रो नहीं मुकाम
खड़काती खड़ताल ने सदा सुमरती श्याम ।। 655 ।।

मीरा भगती मगन दूजी म्हे देखी नहीं
लागी एहड़ी लगन छोड्या सूं छूटे नहीं ।। 656 ।।

सुन्दर म्हारो सांवरो जनमयो जठै जाय
गोप्या थे उण गाँव री धिन है थारी धाय ।। 657 ।।

इण धर पर आवियो तीन लोक रो नाथ
नमन करूँ इण भूमि ने मैं लगाके माथ ।। 658 ।।

गोकुल जेड़ो गांव दुनिया में न दूसरो
ठाकर कीनो ठाँव बालपना में बहुत ।। 659 ।।

आनंद पायो आज इण धरा पे आयके
आती मधुर अवाज मुरली री मन मोवनि ।। 660 ।।

मीरा रे रहवे मन कृष्ण री कलरव सदा
बिचरती दासी बन मोहन मंदिर मायने ।। 661 ।।

मीरा मन मोहन बिना रुके नही पल एक
विरहण ज्यूं बिलखती दरसन री कर टेक ।। 662 ।।

सांस बसायो सावरो जपती ज्यू अणजाप
सूरत लागी श्याम सू बोले आपूआप ।। 663 ।।

और न कोई ईषणा किसना सू बस काम
खरच्या सू दूणा बढे राम नाम रा दाम ।। 664 ।।

वृन्दावन माही बसे जीव गुसाई संत
नाम सुण्यो जद मेडतणी हिया मे हरषंत ।। 665 ।।

मिलबा रो मतो कर्यो साधुड्या ले साथ
खडताला खडकावती हरिमाला ले हाथ ।। 666 ।।

गोविन्द रा गुण गावती पहुची संता द्वार
सेवक आया सामने ऊभा आडा आर ।। 667 ।।

रुको अठे रावले पूछा माही जाय
संत म्हारा उंचा घणा मिलसी थासू नाय ।। 668 ।।

संत संदेशो भेजियो नही देखे वे नार
नारी रो मुख जोवता जाऊ जमारो हार ।। 669 ।।

मीरा मुख मुलकी मना मै सुनी आ बात
पुरूष एक है सावरो दूजो नही लखात ।। 670 ।।

जा केवो संदेसडो संता ने थे जार
मीरा नारी है भली थे भी हो अब नार ।। 671 ।।

गयो सेवक गोसाई कने सुणी सो दी सुनाय
ज्ञान पट खुल्या घणा मीरा सामो आय ।। 672 ।।

मीरा आगे महात्मा अरज करी कर जोर
माफ कराज्यो म्हावली गलती कीनी और ।। 673 ।।

खोली आंख्या खूब थे आज तलक अनजान
मीरा कैवे मानज्यो कण कण मे भगवान ।। 674 ।।

नर नारी न्यारा नही सब है एक समान
भेद करे सो भूल है निस्चै वो नादान ।। 675 ।।

सब घट मे है सांवरो सदा रह्यो समाय
रोम रोम मे रम रह्यो नेणा दीसे नाय ।। 676 ।।

चकमक घीसिया चाणनो तिल माही ज्यूं तेल
सदा बिराजे सांवरो खेले जग मे खेल ।। 677 ।।

दूध जमाया बणे दही बीने देय बिलोय
माखन निकले मोकलो जतन करे जद कोय ।। 678 ।।

आसन दृढ जमाय अब मथे मन ने मजबूत
मिले माखन ज्यू मोहनो सांचो यो सबूत ।। 679 ।।

नाम जाप नित नेम सब साधन है इस काज
जो कोई जन वापरे मुगती व्हे महाराज ।। 680 ।।

प्रेम बडो संसार मे रीझे इणसू राम
प्रेम करो भगवान सूं करणो इतरो काम ।। 681 ।।

ईश्वर कोनी आंतरो सदा रैवतो साथ
प्रेम करिया परगटे तीन लोक रो नाथ ।। 682 ।।

पल बिसरो न राम ने सुमरो आठू जाम
हिरदे धारया राम ने करो जगत रा काम ।। 683 ।।

भजन करो भगवान का मगन होय मन माय
सदा संगत साधु री गोविन्द रा गुण गाय  ।। 684 ।।

राजा सारा जगत रो पूरे सबकी आश
पाले पोसे प्रेम सूं रखा वालो विश्वास ।। 685 ।।

मिनख जमारो ओ मिल्यो भगती करबा ताण
लखे चौरासी भोगिया इण जूणी मे आण ।। 686 ।।

क्रम सारा अरपण करो नंद नदन रे नाम
साँवरिया रे हाथ मे सब की है लगाम ।। 687 ।।

इक पल भी आगा नही हरदम रैवे साथ
सेवा करो सांतरी राजी हुवै नाथ ।। 688 ।।

लगन लगावो लाल सू पालो इणसू प्रीत 
सांचो है इक सांवरो सारा जग रो मीत ।। 689 ।।

माने उणने ही मिले पलभर रे ही माय
टको लागे न गांठ को लेवो क्यू न भाय ।। 690 ।।

सहज मिले है सांवरो लेल्यो थे बिन दाम
मोल एक ही मानज्यो राणा उणरो नाम ।। 691 ।।

धर ईश्वर रो ध्यान हिवडो करो खालीह
प्रेम रस ने पीवणो नेणा निज प्यालीह ।। 692 ।।

भगती करो बडभाग है रटो नाम दिन रैन
मनडो लागे मसकबा तनडो व्हे बैचैन ।। 693 ।।

मन मे बसावो मोहना दूजा री नह ठौर
किसन नाम रो काजलियो नैना लेवो कोर ।। 694 ।।

भगती करणी भालके झूठ कपट सब त्याग
बिन भगती बैचेत है जल्दी नर तू जाग ।। 695 ।।

सुख दुख समझ समान दुख ने दुख मानो मति
भल देवे भगवान राजी व्हे न सब सहो ।। 696 ।।

प्रेम कठिन है पंथ सम्भल सम्भल ने चालणो
किसन जेडो कंथ मिले न जग रे मायने ।। 697 ।।

सत ने चित मे धारणो मन मे करो आणन्द
जग तो बस जंजाल है माया मोटो फंद ।। 698 ।।

विषया सू वेराग कर छोड द्वेष अर राग
काया राखो निरमली लागे न कोई दाग ।। 699 ।।

हरी भगती करता रहो आही मोटी बात
जीवन तो झट जावसी ज्यू तारा परभात ।। 700 ।।

रेणो नही चलणो है चलणो बिस्वा बीस
चार दिना री चाणनी जपले तू जगदीश ।। 701 ।।

सांवरियो सारे सदा निज भगता रा काज
ज्यो सुमरे जगदीश ने राखे वांरी लाज ।। 702 ।।

हिरदे लेवो बिठाय तीन लोक रा नाथ ने
बिरथा जनम गाय ज्यो न सुमरयो सांवरो ।। 703 ।।

मन ने लेवो बुहार तप बुहारी लेयने
ज्ञान रो चीर बिछार आसन ढालो ईशरा  ।। 704 ।।

सारा जग री संपदा समपौ चरणे श्याम
साथ न चाले संपदा साथ चालसी नाम ।। 705 ।।

धारो नाम रतन धन और धन है धूर
जद मिलसी नाम धन दारद वहेसी दूर ।। 706 ।।

कोटिक माया जगत की साथ न चाले छदाम
छोड सकल जंजाल ने सुमिर सदा नर श्याम ।। 707 ।।

सतसंग करणो है सदा विरथा तज विचार
शरण लेवो श्याम री जद होसी भवपार ।। 708 ।।

रिधे बसावो राम सुध राखो शरीर ने
तजो क्रोध अर काम मोहमाया ने मारके ।। 709 ।।

.संता संग सतसंग कर मीरा राजी होय
जावन री रजा लयी आई मंदिर जोय ।। 710 ।।

संत माने उपकार मीरा सी नह दूसरी
भगती तणा विचार घण अमोलक आपरा ।। 711 ।।

संत समागम सांतरो ज्ञान भगती भरपूर
मोहन मंदिर मायने मीरा व्ही मशहूर ।। 712 ।।

वृन्दावन बसणो नहीं जाणो आज जरूर
द्वारका रा नाथ रो मंदिर घण है दूर ।। 713 ।।

दौड़ी जाऊं द्वारका नेड़े म्हारे नाथ
तुरत वृन्दावन तज्यो साथडिया घन साथ ।। 714 ।।

नाचे ले ले नाम चाली मीरा ब्रज छोड़ने
गोकुल रा ए गाम रुख विरख है रोवता ।। 715 ।।

गाया करे गुहार मत जावो इ मावड़ी
जमना जल री धार रोकण खातर उमगी ।। 716 ।।

गोपिया संग में ग्वाल मीरा सूं अरजी करे
मत न जावो चाल ब्रज माही बासो करो ।। 717 ।।

गया जदी नन्दलाल आज तलक न आविया
होसी काई हवाल थे भी जावो छोड़ने ।। 718 ।।

ब्रज होसी बेहाल था बिन सूनो सब लगे
गाया अर ग्वाल था बिन सूना है सकल ।। 719 ।।

गोवर्धन गिरिराज मीरा बिन मगसो पड्यो
आछो लागे न आज मीरा ब्रज सूं मोकळी ।। 720 ।।

मुधरो चाले बायरो छायी जाणक सून
मीरा संग ने छोड़ता पछतावे है पून ।। 721 ।।

ब्रजबासी कह बोल मीरा थे जावो मती
कुण करसी किलोल मोहन मानसरोवरा ।। 722 ।।

मीरा होय मगन मारग माथे मोकळी
लागी जिणरे लगन दर्शन करस्यु द्वारका ।। 723 ।।

इकतारा पर आंगळि कंठा कृष्ण नाम
झांझरिया झंकारती वा न करे विश्राम ।। 724 ।।

आई देश ढूंढाड़ कूर्म करे राज उत्
पाणी बीच पहाड़ मीठो भरियो मावठो ।। 725 ।।

ओ नगर आम्बेर जगत शिरोमणि जठै
मंदिर पहुंची फेर मूरत है हद सोवनी ।। 726 ।।

मोहन की आ मूरति मनड़ो लेत लुभाय
मीरा मंदिर मायने गोविन्द लागी गाय ।। 727 ।।

मीरा अठे मोकळी खबर हुई चहु मेर
मीरा देखण वास्ते उमडयो सारो सेर ।। 728 ।।

मीरा जनमी मेडते राठौडा कुल मोड़
कूर्म राजो आवियो दर्शन करबा दौड़ ।। 729 ।।

मीरा भगता मायने सिरे बणी है आज
कृष्ण दर्शन कारणे लेश न राखी लाज ।। 730 ।।

दर्शन कर प्रसन हुई जगत मंदिर जाय
मीरा रे इक लगन गोविन्द गोंविंद गाय ।। 731 ।।

मोहन की आ मूरती सुन्दर घणी सुहाय
कूर्म वंश रे कारणे आमेर बिराजी आय ।। 732 ।।

भाव भरया भजन जद मीरा गाई झूम
भगत आया भाव सूं मंदिर मंडयो हुजूम ।। 733 ।।

आज देखो आमेर में बरसे भगती बौछार
भीजे भगत भाव सूं मीरा गावे मल्हार ।। 734 ।।

आछा नर आमेर का भगती तणी पिछाण
सुनबा लाग्या प्रेम सूं मीरा छेड़े तान ।। 735 ।।

मीरा खातिर मोकळी कूर्म रो रनिवास
प्रेम तणो पद पाइयो मीरा मोहन पास ।। 736 ।।

मीरा भगती में मगन करयो नहीं कोई ध्यान
भगती देख्या भाव संग अचरज करयो महान ।। 737 ।।

मीरा अब मुख सूं कह्यो मोटो ईश्वर नाम
सदा लेवो प्रेम सूं मिलसी हरी रो धाम ।। 738 ।।

हरी नाम में हाजरी सदा रहो निशंक
प्रभु प्रेम ने पावसी राजा हो वा रंक ।। 739 ।।

एक घडी नित आप ज्यो सुमरो सांवर सेठ
मीरा कैवे मानवा हरी सूं मिल्स्यो ठेठ ।। 740 ।।

राखो भरोसो राम रो रटो नाम दिन रात
हरी ने हिरदे बसाइलयो इतरी सी है बात ।। 741 ।।

हरी भरोसे नावडी देवो जल में छोड़
पार लगासी सांवरो रमैयो रणछोड़ ।। 742 ।।

सदा रुखाली सांवरो भगता रे हित काज
ज्यो ध्यावे जगदीश ने अटल रहे वो राज ।। 743 ।।

दृढ राखो थे धरम ने थाने रखसी करतार
थे मांगो दो हाथ सूं वो देवे हाथा चार ।। 744 ।।

क्यूँ थे अब चिंता करो राखण वालो राम
हरदम थाने राखसी लेसी हाथा थाम ।। 745 ।।

जग में सब झूठ है सांचो हरी विस्वास
हरी नाम ने हमेश ही राखो अपने पास ।। 746 ।।

हरी नाम हीरो बड़ो घणी अमोलक चीज
मुक्ति थारी मुठ्ठी में राम नाम है बीज ।। 747 ।।

राम नाम रा बीज ने बावो भगती खेत
मुगति रा फल लागसी सोनो बणसी रेत ।। 748 ।।

राम नाम की बाजरी भगती खेता बीज
मुगती सर्रो लागसी प्रेम रस में रीझ ।। 749 ।।

मन दर्पण रे मायने सूरत बसी है श्याम
बार बार में निरखता राजी व्हे घनश्याम ।। 750 ।।

पल पल में जात है जीवन घण अनमोल
राम सुमर रे मानखा विरथा मत ना डोल ।। 751 ।।

भजनों सदा भगवान ने छोड़ जगत री रीत
शरम करो न सुमरता मोहन जग रो मीत ।। 752 ।।

तारा ज्यूँ जग समझ हरी चंदा ज्यूँ मान
चंदो करे चांदनी तारा सूं नह चान ।। 753 ।।

तिमिर नाश न तारा करे करे चंद्र पल माय
हिय में करणो उजास तो हरी सूं लीव लगाय ।। 754 ।।

हरी सुमर हरी सुमर सांचो ओ सन्देश
मीरा बचन अमोल ये कैवे देश परदेश ।। 755 ।।

मीरा रे मुख मोहन और न कोई ध्यान
सत्संग सुण राजी हुया करिया अब प्रस्थान ।। 756 ।।

मीरा रुकिया सात दिन सेर आमेरा माय
पाछे पकड़यो मारगो द्वारका रे ताय ।। 757 ।।

दखन दिश ने चालिया मीरा गावत गीत
चोखो नगर चाटसु हरी चरणा में प्रीत ।। 758 ।।

मंदिर गोपीनाथ रो हद बणियो अनहूत
नगर चाटसु चोवटे अनहद अर अदभूत ।। 759 ।।

कूर्म करतो राज उत् गोविन्द सेवक आप
चरण पड़िया चाटसु कटिया कोटिन पाप ।। 760 ।।

गुहिल करता राज कदै बापा जेड़ा वीर
वा चाटसु आज तो मीरा हेत अधीर ।। 761 ।।

शहर घणो हद सोवणो धरम धजा फहराय
गोपीनाथ रे आंगणे मीरा पूगी जाय ।। 762 ।।

दरशन कीना देव रा हियो घण हरसाय
गावण लागी गुण प्रभु सुन्दर राग सुहाय ।। 763 ।।

हरजी सुणो मम हिव री थाने कैवूं बात
जीवन थाने सोपियो बाजी थारे हाथ ।। 764 ।।

थारे बिना मैं नहीं पल भी एक रहाय
सुन्दर म्हारा सांवरा हरदम राख सहाय ।। 765 ।।

गुण सारा गोविन्द में मैं औगुन री खान
राखे ज्यूँ ही रेवस्यु तज मान अपमान ।। 766 ।।

चाटसु रो राजवी आयो दरसण ताण
बैन सुण्या जद भूल्यो बात सुणी दे कान ।। 767 ।।

नमन करयो मीरा तणै अरजी कीनी आप
अठे बिराजो बापजी सेवा करस्यु धाप ।। 768 ।।

बड़भागी मैं बहुत आज पधारया आप
जीवन म्हारो धन्य है खुसी हुई अनमाप ।। 769 ।।

आप रहवाडो अठे करो भगती खूब
प्रजा म्हारी प्रेम सूं रहसी भगती डूब ।।770।।

इतरी सी मानो अरज सेवक जाण सुनोह
हाथ जोड़ अरजी करूँ रजा मुझ पर करोह ।।771।।

नहीं पीर नह सासरो दोन्यू दिया छोड़
बृंदावन नह द्वारका किम रुकूँ तीजी ठोड़ ।।772।।

तुलसी ने लिखियो तुरत कठे रहूँ मैं जाय
तुलसी भेजी पत्रिका साँची राय बताय ।।773।।

हरी विमुख जठे रहे रहो न एक घडीह
पीहर हो क सासरो चाहे भींत्या हीर जडीह ।।774।।

न जाऊं में मेडते नहीं गढ़ चित्तोड़
दौड़ी जाऊं द्वारका बेगी छोड़ूँ ठोड़ ।।775।।

राजा सूं मांगी रजा जाऊं मैं महाराज
सफल थारी सेवना करज्यो जन रा काज ।।776।।

हरी भजन नित नेम सूं करता आप रेवोह
कृपा रखसी कानजी प्रजा नित सेवोह ।।777।।

बार बार आ बिनती करतो कुरम राज
आप पधारया राज में सरया मन रा काज ।।778।।

मीरा पकड़यो मारगो मेडत मेवाड़ रे बीच
पीहर अर सासरो दोन्यू माया कीच ।।779।।

जाऊं म्हारा नाथ कने दूजो नाही सुहाय
पीहर अर सासरो दोन्यू तजिया माय ।।780।।

मोहन ही मंजिल बणी मारग हरी रो नाम
धीरज पगल्या धारती सदा सुमरति श्याम ।।781।।

चाली छोड़ चाटसु मारग कियो मंडाण
गोविन्द गुण गावती नेड़े डिग्गी कल्याण ।।782।।

विष्णु रो वासो जठे मंदिर बण्यो विशाल
मूरत घणी मोवनी नेड़ी सरवर पाळ ।।783।।

मीरा पुगी मदरिये खनकाती खड़ताल
दाढ़ी में हीरो दमके मुकुट भलके भाल ।।784।।

डिग्गी बिराजे डिग्गीपति शोभा सुन्दर साज
दरशन कर परशन भई अनहद मीरा आज ।।785।।

सोहवे कलंगी कल्याण के जरी हन्दो है जाम
काना कुंडल सोवना लाजे कोटिक काम ।।786।।

शीश मुकुट सुहावनो गल बैजंती माल
अदभुत शोभा आपरी भगता रा प्रतिपाल ।।787।।

गावे मीरा गुण हरी मंदिर माही बैठ
अरज करूँ कल्याण ने ठाकर द्वारे ठेठ ।।788।।

देश बड़ो ढूंढाड़ डिग्गी बिराजे कल्याण जी
मीरा गावे मांड हरी रीझो थे म्हारपे ।।789।।

शोभा बरनन न कर सकूँ आप हो कलानिधान
कलाधनि किरपा करो बैठी शरणे आन ।।790।।

द्वापर में द्वारिकापत कलजुग में कल्याण
दोन्यू करता दीन पर किरपा अनहद आन ।।791।।

आरती हुवै कल्याण की नौबत बाजे नगार
चारो दिशा में होवती थारी जै जै कार ।।792।।

दुखिया आता दूर सूं मेटण कष्ट क्लेश
डिग्गीपति कहलावता सेवा करता नरेश ।।793।।

महिमा थारी मोकळी रही जग में छाय
तोहि सिमरया सांवरा चार पदारथ पाय ।।794।।

मीरा आई है अठे सुनत लगी है भीड़
संता दरशन कारणे भुल्या निज री पीड़ ।।795।।

मीरा भजन सुनावती रीझे सुन नर नार
मेलो हाँचो है मंडयो डिग्गीपति दरबार ।।796।।

नाचे मीरा झूमने देखे खुद कल्याण
धिन धिन मीरा है तने तजदी कुल री आण ।।797।।

मंदिर मीरा सासरो मंदिर मीरा पहिर
सांवरा री सेव में संपयो सकल शरीर ।।798।।

एक भाव इक आश ले इक ईश्वर आधार
छोड्यो सारा जगत ने करती भव ने पार ।।799।।

एक ही धुन इक लगन इक ही अब है काम
सेवा करूँ सांवरा अब थारी आठो याम ।।800।।

नमन करया पुनि नाथ ने कर जोड़ कल्याण
डिग्गी सु पकड़ी डगर करयो है प्रस्थान ।।801।।

मीरा चाले झूमती मगन होय मन माय
चाली आ चारभुजा गढ़बोर रे ताय ।।802।।

मेवाड़ गोडवाड़ बिच मंदर बण्यो जोर
चारभुजा चौखूंट में गाँव नाम गढ़बोर ।।803।।

मोहन बैठया मायने चक्र पदम् ले हाथ
दुनिया आवे दौड़ती चारभुजा रा नाथ ।।804।।

मीरा पूंची जायने चारभुजा रे चौक
दुनिया आई देखबा देवे मंदर धोक ।।805।।

राणी आ चित्तोड़ री मोहन रा गुण गाय
सुण अचम्भो सब करे धिन धिन मीरा माय ।।806।।

भगत मंडली भेली हुयी गावे गोविन्द गान
चारभुजा रे चोक में मीरा छेड़े तान ।।807।।

था बिन म्हारा सांवरा घडी रहूँ न एक
बेग आओ सांवरा राखण मीरा टेक ।।808।।

थारे बिन मैं रहूँ ज्यूँ पानी बिन मीन
तू म्हारो नाथ है मीरा तौ आधीन ।।809।।

दरश दिखा दे सांवरा पल पल जोवुं बाट
थारे दरशन पावता होसी आनंद ठाट ।।810।।

अरजी म्हारी साम्भलो चारभुजा रा नाथ
राखो चाही डुबोये दयो नैया थारे हाथ ।।811।।

चारभुजा अरजी सुणो दर्शन दयो नित मोय
एक यही चावूं अबे और न चावूं कोय ।।812।।

शरणे रखले सांवरा तुझ बिन रह्यो न जाय
तड़फू तुझ बिन सांवरा बेगो बेगो आय ।।813।।

सुध बिसराया न सरे तुझ बिन में अनाथ
अरज सुन र आवज्यो चारभुजा रा नाथ ।।814।।

नह भावे मने और कुछ नाही और सुहाय
एक तू ही भावे मने साँची दयु बतलाय ।।815।।

बेगो आजा सांवरा हाथ पकड़ ले जाय
थारे बिना इण जगत में करसी कुण सहाय ।।816।।

बात बता तू सांवरा म्हे दासी तव एक
सुध म्हारी ले ले अबे आजा मोहन छैक ।।817।।

नहीं कोई अब दुसरो म्हारो मालिक आप
मिलसी एक दिन मोहना दर्शन करस्यु धाप ।।818।।

नैना माहि है बस्यो एक तू म्हारा श्याम
मीरा रे इण माँजने दूजो नी दरसाय ।।819।।

थारे बिना सांवरा धारू किम मैं धीर
ज्यूँ ज्यूँ बीते टेम ओ हिवड़ो हुवे अधीर ।।820।।

आणो है तो आयज्या क्यूँ म्हणे तरसाय
मोहन सूं विनती करे चारभुजा रे माय ।।821।।

म्हारा सा थारे घणा म्हारे तो तू एक
टेम मिले तो आव्जये राखण म्हारी टेक ।।822।।

आस एक है आपसू दर्शन देस्यो नाथ
पूरण करज्यो सांवरा म्हारे मन अभिलाष ।।823।।

अर्पण थारे सांवरा सारो जीवन नाथ
चाहूँ एक ही सांवरा जन्म जन्म तव साथ ।।824।।

नहीं और कोई चावना नहीं और कोई आस
दरश दिरावो सांवरा पूरो मन अभिलाष ।।825।।

मोर मुकुट सोवणो मुरली सोहवे हाथ
आ छवि नेना बसी और न कछु सुहात ।।826।।

आवो मीरा कारणे राजी व्हे थे श्याम
मीरा मन नेहचो हुवे लख छवि आप ललाम ।।827।।

मैं जानूँ नहीं और गत इतरी जाणु श्याम
थे चावो तो तार दयो मीरा ने घनश्याम ।।828।।

घणा भगत थे तारिया घणा रा सारया काज
म्हे तो चांवु दरश नित थारा नित घनश्याम ।।829।।

नहीं कछु और चाइज्ये मीरा ने सुण श्याम
एक झलक थारी मिले सरे काम तमाम ।।830।।

मैं अभागन जन्म री लियो बालपने बैराग
नहीं रही संसार की एहडी मै अणभाग ।।831।।

चारभुजा सूं चालती मीरा नमायन माथ
द्वारावती जाऊं अबे द्वारका रे नाथ ।।832।।

मीरा रे संग साथ भगत घण व्हिया व्हीर
भगती नहीं कोई एक री सबरो इण में सीर ।।833।।

गाती गोविन्द गान मीरा मोहन वास्ते
धरियो इक ही ध्यान मोहन सूं कद मिलूं ।।834।।

चालत बीच पहाड़ नदी नाला पारकर
देखे गाँव गुवाड़ मीरा जावे झूमती ।।835।।

शहर दिख्यो सुहावनो भलो ज भीनमाल
वरहश्याम विराजता दीना रा दयाल ।।836।।

विष्णु लियो अवतार हिरण्याक्ष मारयो जदै
रूप वराह धार सारा जग न तारियो ।।837।।

मंदिर बण्यो सांतरो सहरा बीच बजार
भीनमाल रे मायने हो रही जै जैकार ।।838।।

मीरा मंदिर मायने आप विराजी आय
पद गावे प्रेम सूं वराहश्याम रे तांय ।।839।।

भगत जगत उबारने आओ प्रभुजी आप
कष्ट पड़े जद भगत पे झट मेटो संताप ।।840।।

विष्णु रूप वराह पिरथी लाया पाताल सूं
आपरो विरद अथाह किम कर कुण कथे ।।841।।

भीनमाल रा भाग बड़ा जन्मयो जठे माघ
अब आई मीरा अठे साहित रा शलाघ ।।842।।

सुन्दर सहर सुहावणो धर्म कर्म भरपूर
मीरा मंदिर मायने गावे ले तंदूर ।।843।।

पद गावे प्रेम सूं छेड़े अद्भुत तान
भगती भूखो सांवरो सुण हरखे भगवान् ।।844।।

रचे पद वा रोज का गोविन्द ने सुनाय
एक लगाई है रट दूजी चिंता नाय ।।845।।

नाम हरी पर नाखियो जीवन सगलो जाण
दर्शन हरी रे बिना चैन न पावे प्राण ।।846।।

तड़फत मीरा एकली ज्यूँ जल बिन मीन
रखनो व्हे तो राखले मीरा तौ आधीन ।।847।।

अब और न चाइज्ये केवल दर्शन नाथ
जग छोड्यो जानके थाम्यो थारो हाथ ।।848।।

अब मत न छोड़ज्ये मीरा ने अधबीच
जग में रहूँ न जीवती जिनमे भरियो कीच ।।849।।

स्वार्थ रो संसार सब झूठा ऊँच अर नीच
समता है संजीवनी पीवो आंख्या मीच ।।850।।

परमेसर सबसूं बड़ो दुनिया रो पातशाह
एक आसरो आपरो दूजा रो ल्यूं नाह ।।851।।

मीरा भगती महल में सदा बिराजे श्याम
मीरा सेवे मोहना नितप्रत रटती नाम ।।852।।

नाम झरोखे बैठके दर्शन सांवलियाह
मीरा करती प्रेम सूं जी भर आँखड़ियाह ।।853।।

मुजरो मानो मोहना झुक झुक नमन करूँह
अंतस खाली आपरो श्याम सरूप भरुंह ।।854।।

हीदे बिराजो हे हरी आहि मन इच्छाह
छोड़ दियो जगत सब डर अब मने काह ।।855।।

आप संगाती सांवरा कमी रही अब काह
दूजा मारग छोड़ सब पकड़ी थारी राह ।।856।।

बीच राह मत छोड़ज्ये इतरी अरज करूँह
चावे ज्यूँ म्हे रेवस्यु हाजरी रोज भरुंह ।।857।।

नहीं चाइज्ये सांवरा थारा सूं कछु और
इतरो दिज्ये सांवरा मै ताकू थारी और ।।858।।

मीरा थारी शरण में इतरी सुणले श्याम
और कछु जाणु नहीं सुमरू आठो याम ।।859।।

नाम जपूँ पद कहूँ नाचू दे दे ताल
इणसूं ज्यादा सांवरा काई करूँ कमाल ।।860।।

थारे खातर जोगणी बणी सांवरा देख
घण भगता ने तारिया म्हारी सामी देख ।।861।।

रोम रोम में तू रमे तू ही सांसोसाँस
मीरा मन में यूँ बस्यो हरदम रहत उजास ।।862।।

म्हारा मन री वेदना तू जाणे है नाथ
औरा ने तू मिल्यो म्हे मिलस्यू थारे साथ ।।863।।

इण खातर करणो पड़े चाहे कितरो जोग
पण करके ही रहूँ काना संग संजोग ।।864।।

अब नहीं है आवडे थारा बिन मोहि श्याम
कद मिलस्यू म्हे थार सूं आहि सोच अठजाम ।।865।।

मीरा हुई बैचेन हरी बिना न आवडे
दिन देख्यो न रैन मीरा पकड़यो मारगो ।।866।।

भगता वाली भीड़ भीनमाल सूं साथ व्ही
मीरा मन री पीड़ तू ही समझे सांवरा ।।867।।

चाली मीरा उनतावाली खींचे सांवरो डोर
भजन भाव गावती जा पहुंची सांचोर ।।868।।

सांचोर सु सीधी गयी पाटन शहर विख्यात
सोलंकी रेता कदी वांरी मोटी ख्यात ।।869।।

पाटन शहर सुहावनो सहस्रलिंग रो धाम
मीरा रे तो एक धुन सदा सुमरति श्याम ।।870।।

मीरा भगती ले चली चर्चा च्यारूं मेर
कृष्ण नाम रे कारणे मीरा पियो जेर ।।871।।

छोड्यो पीहर सासरो तज्यो सकल परिवार
वा ही मीरा मोकळी सुण आवे नर नार ।।872।।

गावे गिरधर गीतड़ा भरिया मोटा भाव
अरज करूँ हे सांवरा अब तो बेगो आव ।।873।।

चरण रज म्हे चावती आवो दीनदयाल
मीरा माले महर अबे करो तुरत प्रतपाळ ।।874।।

#REF! आश निराश करो मती दरशन दयो घनश्याम ।।875।।
कद सूं हेलो पाड़ती लेवो कर थे थाम

मिलणो चाहूँ आपमें ज्यूँ चन्दन में नीर ।।876।।
तिलक करे जद सांवरो मिटे मन री पीर

मोती माला बीच में ज्यूँ धागों सुहाय ।।877।।
विया ही मैं सांवरा था संग रहणो चाय

कनक सुहागे साथ मिल जिम दोउ व्हे एक ।।878।।
विया ही मैं सांवरा होवुं मैं एकमेक

रहूँ आप संग सांवरा इतरो दयो वरदान ।।879।।
बनकर आवो सांवरा म्हारा हिवड़ा रा मिजमान

सेवा करस्यु सांतरी आसन रिदै बिछाय ।।880।।
एक घडी भी सांवरा म्हारे ताणी आय

थारे आया सांवरा सरे सकल मम काम ।।881।।
दर्शन थारा हुया बिन नहीं घडी बिश्राम

म्हे तो थारी बाट में गमा दई निज नींद ।।882।।
आजा बेगो सांवरा पूरी कर उम्मीद

अब रह्यो न जावतो थारे बिन घनश्याम ।।883।।
एकर आजा सांवरा मीरा करे प्रणाम
मोहन निरख्या ही हुवे मीरा रे मन चैन
पथराई आंख्या लागे रटे नाम दिन रैन ।।884।।

पाटन सुन उन्झे चली मच्यो गली हर शोर
मीरा सी भगती मायने नी देखी कोई और ।।885।।

काका भतीजा दो तुरक काबुल सूं है आय
मलेच्छ बनावे मुल्क ने चमत्कार दिखलाय ।।886।।

दुनिया ने दिखावता परचो ए भरपूर
धरम वांरो पल्टावता कह अल्लाह को नूर ।।887।।

कहता खुद ने दूत वे आया हुकुम बजान
चमत्कार रा चक्करा चढ़ता लोग सुजान ।।888।।

मनचाया मंगावता मेवा मिश्री पान
हाथ माहि हाजिर करे लोग हुवे हैरान ।।889।।

करता ऊंचो हाथ मन माहि मंतर पढ़े
चीजां हाथोहाथ झट सामी रख देवता ।।890।।

पढता पांच नमाज अल्लाह अकबर बोलता
धरम रे हित काज लोग बनाता तुरक घण ।।891।।

सुण्या बे समचार मीरा आई मेवाड़ सूं
भगती रो प्रचार अब होसी गुजरात में ।।892।।

डूब्या सोच समंद करा तो काई करा
फसियो बेजा फंद किकर होसी कामडा ।।893।।

भीड़ बढ़ी भगता तणी बध्यो भाव तहँ जोर
च्यारूं और होने लगी जय जय नंदकिशोर ।।894।।

काका भतीजा अब अठे करे घणो बिचार
मीरा फीटो माजनो करता लागे न बार ।।895।।

काई तो अब करा जीसू धाक जमेह
मीरा नाम प्रभाव ओ किकर जाय थमेह ।।896।।

दोन्यू पूग्या जाय जठे मीरा जावती
ओछी कह बतलाय क्यूं तू नाटक है करे ।।897।।

म्हारी करामात थे हाल देखी नहीं
देवूं चीज मंगात ज्यो चावो सो तुरत ।।898।।

कदै मंगावे कायफल कदै बिड़ला पान
रोली चन्दन अरगजा पूजा का सामान ।।899।।

कैवे मीरा ने जदै थे भी दयो मंगवाय
मीरा कैवे सांवरो सबने पूरे भाय ।।900।।

मांगे सो देवे तुरत चारभुजा रो नाथ
दीन दुखी हर जीव ने पूरे इक ही नाथ ।।901।।

चींटी न कण देवे मण हाथी रे ताण
सब ने देवे सांवरो उने लेवो पिछाण ।।902।।

क्यूँ भरमावो बावला भोली जनता जाण
ठग बिद्या है बड़ी जादूगरी जाण ।।903।।

इणसूं नी हुवे भलो क्यूं बिगाड़ो जूण
देवे सबने सांवरो थे देवनवाला कूण ।।904।।

सारी सृस्टि सरजियो पाले पिरथीपाल
पेट भरे हर जीवरो मोटो घणो कमाल ।।905।।

अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम
चींटी सूं हाथी ताई देवे सबने राम ।।906।।

देवे सब ने दिलखोलने एहडो वो दातार
खाली कोई जावे नहीं एहडो उणरो द्वार ।।907।।

थे देवोला कद ताई कुण कुण ने थे जाय
वो देवे हर जीव ने आपुआप ही आय ।।908।।

इणसूं नहीं हुवे भलो भलो करो थे आप
दिन दुखी सेवो सदा मेटो जग संताप ।।909।।

मन में मतना मद करो निमित मात्र है जीव
देवण वालो सांवरो उणरी नहीं कोई सींव ।।910।।

बण्यो भिखारी जगत सब देव बड़ो दातार
याद करया वो आवतो देतो धन अपार ।।911।।

छोडो करणो फरेब नाम जपो दातार रो
इतरा औगुन एब भलो हुवे पण कियां ।।912।।

सुन मीरा री बात उडी हवाई मुख तणी
नमन करां मैं मात साँची बात सुनावई ।।913।।

मीरा आज बतावियो कुण है असल दातार
म्हे छोड़ा फरेब सब कहवा सोगन खार ।।914।।

साँची बात सुणी जद पड्या पगा में आर
मीरा दिनों ज्ञान जठे वा जगे मीरा दातार ।।915।।

काका भतीजा कोड सूं कीनी आ स्वीकार
जग ने देवे जो सदा वो है मीरा दातार ।।916।।

लोगा रा कष्ट हरे सारे सगळा काज
मीरा भगती प्रताप सूं जगे पुजिजी आज ।।917।।

उंझा सूं नेड़ी घणी जगा आज उन्नाव
मीरा दातार जग कहे मोटो इणरो नाँव ।।918।।

#REF! मीरा चाली द्वारका निज ठाकुर रे ताण ।।919।।
भगती सरिता उमड़ी किकर करूँ बखाण

मृदंग तंदुरा बाजता झांझर की रिमझोल ।।920।।
चाले मीरा मारगे करत कृष्ण किलोल

म्हारा सुन्दर सांवरा तुझ बिन फीको संसार ।।921।।
रहूँ पल न एकली सुनो जी नंदकुमार

म्हारी प्रीत निभावज्यो नन्द नदन यदुराय ।।922।।
बीच भंवर नैया पड़ी तू ही पार लगाय

आप बसो नित द्वारका नाम बड़ो जगदीश ।।923।।
मैं मीरा अनभागणि रज धारू निज शीश

आई शरणे आपरे छोड़ सासरो पीर ।।924।।
एक भरोसो आपरो पार लगावो तीर

मीरा री मन वारता सुनो आप घनश्याम ।।925।।
हिरदे में बसो हरी आप सदा अठजाम

म्हे कैवूं सुन मोहना म्हारे मन री बात ।।926।।
जनम लिख्यो तव जामनी सबकुछ थारे हाथ

मोटो धनी तू मोहना पूरे सब की आस ।।927।।
इतरी सी अरजी करूँ रखज्ये चरणा पास
छोड़ चरण न जवास्युं चाहे जावो प्राण
जिन दिन छूटे चरण तव तज देस्यूं मैं प्राण ।।928।।

थारे खातर सांवरा छोड्यो सब संसार
मत छोड़ज्ये सांवरा नैया बीच मझार ।।929।।

थारे बिना सांवरा नहीं सुहावे नाथ
हरदम राखो हे हरी मीरा ने अब साथ ।।930।।

राखो म्हने रणछोड़ निज दासी जाणके
दयो चरणा में ठोड़ इतरी महर मोपे करो ।।931।।

लेवो थे अपनाय ज्यो भी लेवे आसरो
शरणे आपरी आय अब मैं जावूं कठे ।।932।।

भगती म्हारी नाथ थारे ही हित कारणे
चारभुजा रा नाथ तू ही पार लगावज्ये ।।933।।

समंदर तीरा द्वारका मंदिर बणियो जोर
चरण पखारे गोमती हवा चले अठपोर ।।934।।

ऊंचो मंदिर ओपतो शिखर घणो सुहाय
मंदिर माथे मोकळी धजा रही फहराय ।।935।।

अड़सठ सीढ़ी ओपति पूरब मंदिर द्वार
गोमती तट ओ बण्यो मंदिर शिखरदार ।।936।।

जठे बिराजे सांवरो नाम द्वारकाधीश
श्याम वर्ण अति सोवणो जाणक चमके शीश ।।937।।

मोर मुकुट मन मोवनो कुंडल झलकादार
जामो पैरयो जोर रो द्वारका दरबार ।।938।।

चन्दन तिलक भाल पे पग माही पाजेब
हाथा कंगन हीर रा सोहवे है साहेब ।।939।।

मोहन थारी मूरती अद्भुत इणरी आब
लागे मंदिर मायने पंकज खिल्यों तलाब ।।940।।

दीपक दीप रेण दिन अखंड जोत अपार
मंदिर माहि बाजता झालर शंख नगार ।।941।।

अद्भुत झांकी आपरी मनड़ो लीनो मोय
द्वारका रे नाथ री होड़ करे न कोय ।।942।।

मीरा गोमती तीर मझ पूगी है अब जाय
झांझ मजीरा जोर रा भगत रह्या बजाय ।।943।।

द्वारकाधीश दरबार रे देखो आया द्वार
मेल्यो मंडियों मोकळो नाचे है नर नार ।।944।।

पहली चढ़ता पाँवडि मीरा टेक्यो माथ
थारे शरणे आवई दासी द्वारकानाथ ।।945।।

अड़सठ पेड़ी आपरी तीरथ जिम अडसाठ
पग धरता पूरा हुवे सारा मंदिर घाट ।।946।।

चढ़ पेड़या चौक सूं पूगी मंदर माय
दर्शन किना द्वारका हिवड़ो घण हरसाय ।।947।।

नैन मूँद मीरा खड़ी बोले मुख सूं नाई
तू जाणे सब सांवरा बैठ्यो हर घाट माई ।।948।।

नैना सूं आंसू झरे भाव व्हिवल भरपूर
घणी भटकी मैं सावरा अब न करज्ये दूर ।।949।।

सदा बिराजे सांवरा नगर द्वारका माय
थारे दर्शन वास्ते घूमी घणी घुमाय ।।950।।

अब पूरी आसा हुवी आय द्वारका माय
करस्यूं थारी चाकरी सुणो थे यदुराय ।।951।।

वाल्हा लागो बंसी लिया चितवन जिम चकोर
मीरा कैवे सांवरा देखो दासी ओर ।।952।।

अनभागण आई अठे भाग भला भगवान
अबे मने थे राखज्यो चरणा चाकर जान ।।953।।

बचन मीरा बोलती बार बार कर जोर
मीरा रे बस मोहनो न कोई दूसर और ।।954।।

खड़ी खड़ी खड़कावती खनक खनक खड़ताल
मंदिर माहि मेडतनी मोहन मोती माल ।।955।।

आंख्या लागी एकटक जाणक गई पथराय
जोत मिली ज्यूँ जोत सूं समंदर सीप सुहाय ।।956।।

और कछु न आवतो मीरा मुख सूं बैन
म्हारा मोहन मालका निश दिन रेवो नैन ।।957।।

मीरा ने मोहन मिल्या सरिता समंदर सोय
जनम जनम सूं जोवती जाणक बाटा जोय ।।958।।

अब अपनाले ईशरा आई शरणे आज
अब न पाछी जावस्यु कर मम पूरण काज ।।959।।

तुम बिन म्हारा सांवरा कुण म्हारो धनीह
इतरो चावूं सांवरा बना पदरज कणिह ।।960।।

सागर रा पंछी तणी मैं हूँ म्हारा नाथ
तू ही म्हारो सांवरा सदा निभाज्ये साथ ।।961।।

मैं छोड़ आई सबे ज्यूँ जलबिंदु अकाश
आप मिल्या मैं बचूँ नहीं हुवे विनाश ।।962।।

पाछी जावूं मैं नहीं मिलस्यू थारे माय
गर अब भी न मिलूँ जनम अकारथ जाय ।।963।।

मोहन अरजी मानले करूँ नाथ कर जोड़
थारा जेडो एक तू ही मो सी लाख करोड़ ।।964।।

मनड़ो म्हारो मोहना पल पल मरतो प्यास
समंद घनेरो सांवरा अब आई थारे पास ।।965।।

हूँ दर्शन कर हर्षित हुई अब बढ़ी घणी आस
नैणा नित नट नागरा आप करो आवास ।।966।।

मंजिल नेड़ी मोहना अब लख लीनी आज
मोहन मिलस्यूं आपमें करस्यू ओ ही काज ।।967।।

बूँद वही बड़भागनी ज्यो समंदर रल जाय
म्हारो समंदर सांवरो अब ले तू अपनाय ।।968।।

जनम जनम सूं जोवती औसर आयो आन
द्वारका रा धाम में मिलसी मने कान ।।969।।

पेली बनायो निज पति राख्यो नैणा गोय
दासी बन सेवा करी पल पल मुखड़ो जोय ।।970।।

अब जान्यो तव अंश में मिलूँ मूल रे माय
किन बिध सरसी काजडो अब सोचु नाथ उपाय ।।971।।

जगत सारो जाणियों मरतो इक छण माय
दूजी बार न जनमनो धारी मन रे माय ।।972।।

बून्द बापड़ी किम करे सके न सागर जाय
मैं मीरा बड़भागनी समदरियो दरशाय ।।973।।

कद घड़ी व आवसी सागर बणसी बुंद
महर करज्ये सांवरा कहवे नैना मुँद ।।974।।

मीरा बैठी मंदरिये पूंची मंजिल पास
मेदपाट रे मायने रीतों है रनिवास ।।975।।

राणा रे हुयो अरे घणो जलोदर रोग
दवा दिया दूनो हुवे जबरो बणियो जोग ।।976।।

ओ मिटे नह औषधि करी हुई बेकार
बुझा कीनी बावजी अब काई उपचार ।।977।।

मीरा तज्यो मेवाड़ ने भूंडा हुआ भाग
नींद तज नृप तू जाग मूढ़मत जाग ।।978।।

भगती तो ही भली मोटो हुयो मेवाड़
मीरा रे गया पाछे हारया हा हर राड़ ।।979।।

ज्यो चावो मेवाड़ ने पाछी ल्यावो जार
मीरा बैठी द्वारका गुण गोविन्द रा गार ।।980।।

राणा मानी राय ने भेजो भल सरदार
पंडित भेजो साथ में चारण भी दो चार ।।981।।

मीरा गर जे मानज्या ले आवो तत्काल
मीरा रे ही आविया होसी चोखा हाल ।।982।।

पंडित संग में पारधी संग चारण सरदार
मीरा मनावन वास्ते तुरत हुया तैयार ।।983।।

धर मजला मेवाड़ धर पहुँच्या धर सौराठ
कद आवे मीरा कहो अर होवे आनंद ठाठ ।।984।।

मीरा मनावन मोकळ्या गया द्वारका धाम
मीरा बिन मेवाड़ रो सरे न एको काम ।।985।।

जा पूग्या मंदिर जठे मीरा गावे झूम
मृदंग बजे मोकळा माचे जोरा धूम ।।986।।

दर्शन किना द्वारका खुसी भई अनपार
मोहन मूरत मोहनी निरखे बारंबार ।।987।।

अरजी करे आज ए मीरा मेलो मेवाड़
मेदपाट रे माथ पर टूट्यो दुःख पहाड़ ।।988।।

बिन मीरा न मिटे मेवाड़ री पीड़
अब तो म्हे ले जावस्या मीरा माँ न तीड़ ।।989।।

मीरा रा भजना माहि आ बैठया है आप
राणो मीरा रूठ के लियो घणो ही शाप ।।990।।

मीरा ठहरी गावती सब मिल करया प्रणाम
देखत मीरा दाखवि जाणक आया जाम ।।991।।

नमन करे मीरा कने बोल्या है आ बात
चालो मायड मेवाड़ में जोड़ा लामा हात ।।992।।

राणो थाने रीस कर दिनया कष्ट अपार
फल भोगे अब राणसी बहुत पड्यो बीमार ।।993।।

और कोई ओखद नहीं औखध बनो थे आप
आप पधारया ही मिटे राणा कीधा पाप ।।994।।

गलती राणा री घणी मीरा करावो माफ़
अब थाने बुलाविया अंतर करने साफ़ ।।995।।

भगती थाने भावती धणी करावो धाप
अरजी है आपसू घरे पधारो आप ।।996।।

आप बिना सरे नहीँ म्हारा कोई काम
म्हाने तो अब तारसी आप जप्योडो नाम ।।997।।

कोई अब न कुबद करे भगती करज्यो भरपूर
रेहवो आप रावले द्वारका है दूर ।।998।।

बोली मीरा बात सुण कहवुं हूँ कर जोर
मैं पतंग री जिंया हाथ सांवरे डोर ।।999।।

चावे ज्यूँ ही सांवरो म्हे तो रोज करूँह
म्हे मोहन मस्टरोल में हाजरडी भरुंह ।।1000।।

इक इक साँस अनमोल है स्याम सुमरया न जाय
इतरो ही जाणू अबे थाने कैवूं काय ।।1001।।

पीहर तज्यो मैं सासरो मेडतियो चित्तोड़
म्हारो इक ही आसरो साँवरियो रणछोड़ ।।1002।।

लियो शरणो लाल रो बंसी बजावन वाल
छोड़ जावूं छण में कियां मीरा मन जंजाल ।।1003।।

तीन दिन रो टेम दयो उत्तर देस्यू आय
म्हारो मालक मोहन पुछु उनने जाय ।।1004।।

मीरा ने मालक मिल्यो मंजिल पूगी जाय
अब पाछी किम बावड़े सोच रही मन माय ।।1005।।

द्वारका ने छोड़ मैं जाऊँ किम मेवाड़
उण घर में जाऊँ कियां दिनों कद रो छाड़ ।।1006।।

बिंदु सिंधु ने चली आ पूगी समद मुहान
अब सरिता रे मायने कैया मिलसी जाय ।।1007।।

कलि फूल सी खिली सौरम रही छाय
अब पाछी कलि कहो कैसे बनी सुहाय ।।1008।।

धारणा सूं समाधी धारली पुनि न धारण होय
अगम पंथ यो योग रो सहज सधे न कोय ।।1009।।

माटी पकी कुम्भ बनी किम माटी पुनि होय
मीरा रे दुविधा घणी घणी राखी गोय ।।1010।।

अब जाणो नहीं हाथ में छोड़ द्वारकानाथ
अब जाया न सरे तज सांवरिया रो साथ ।।1011।।

तन जासी मेवाड़ भल मन रहसी चरणा माय
एक जीव दो जगा किकर रहसी हाय ।।1012।।

मैं शरीर हूँ नहीं आ नह जाणे कोय
आ म्हे ही जाणती साँची कैवूं सोय ।।1013।।

तीन दिन तो बितसी देस्यू काई जवाब
सोच सोच मीरा तणी उतरी मुखड़े आब ।।1014।।

देह देउँ मैं भले मन मोहन ने देय
कारज तो दोन्यू सरे मीरा मन में केय ।।1015।।

दुविधा हुवी दूर मीरा मन मुस्कावती
भजन हुया भरपूर मिलस्यू मोहन मायने ।।1016।।

जानणो शुरू कियो करयो जतन भरपूर
अब होनो बाक़ी रह्यो वो भी होसी जरूर ।।1017।।

मैं नहीं छोड़ू मोहना थाने कहूँ बतलाय
देह छोड़ू द्वारका मूरत जाऊं समाय ।।1018।।

बूँद समुदर जा मिले वाही है बड़भाग
मीरा मन विचार कर करसी देह त्याग ।।1019।।

ओ फैसलो है अटल मीरा मन लियो धार
मोहन मूरत में मिलूँ अब न करूँ अंवार ।।1020।।

सुबह तीसरे दिवस मिल्या सब सरदार
कैवण लाग्या मात थे बोलो आप विचार ।।1021।।

मीरा बोली थे सुणो म्हे पुछू मोहन जाय
रजा मिले जो श्याम री कहस्यु थाने आय ।।1022।।

मीरा एकतारो लियो गावण लागी गीत
छोड़ू किकर सांवरा जनम जनम री प्रीत ।।1023।।

सब कुछ छोड्यो सांवरा प्रीत निभावन ताण
थे प्रभु प्रीत निभावज्यो औसर पड़ियो आण ।।1024।।

प्रीत निभाज्यो सांवरा नहीं हांसी जग में होय
मीरा समावे मूरती पल्लो न पकड़े कोय ।।1025।।

आखर इक अरदास हाथ जोड़ आ करी
राखिजो विस्वास सांचो इक ही सांवरो ।।1026।।

एकतारो राख्यो अबे गयी ग्रभ गृह माय
हुयो उजालो जोर को मीरा दिखी नाय ।।1027।।

आंख्या देखत आदमी मूरत माहि समाय
भगती मीरा री भली सदेह मुक्ति पाय ।।1028।।

जीव समावे ब्रह्म में एहड़ा हुआ हजार
देह समाई मूरती मीरा पहली बार ।।1029।।

ढूंढन मीरा मोकळा मिली न मंदिर माय
भगवा मीरा चुनड़ी मूरत संग दरसाय ।।1030।।

मीरा मोहन मूरती किन बिध गयी समाय
अ जाणे इक सांवरो दूजा जाणे नाय ।।1031।।

धन धन मीरा मेडतनी अमर कीनो नाम
भगता री शिरोमणी श्रवण करे प्रणाम ।।1032।।

मीरा चरित म्हे लिख्यो भगती बढ़ावण हेत
ओ लिखायो है कुणी इण रो नहीं चेत ।।1033।।

टूटा फूटा आखरा जुगती कर मै जोड़
नमन करूँ मीरा थने थारी नी कोई होड़ ।।1034।।

मीरा बैठी मंदरिये पूंची मंजिल पास
मेदपाट रे मायने रीतों है रनिवास ।।1035।।

राणा रे हुयो अरे घणो जलोदर रोग
दवा दिया दूनो हुवे जबरो बणियो जोग ।।1036।।

ओ मिटे नह औषधि करी हुई बेकार
बुझा कीनी बावजी अब काई उपचार ।।1037।।

मीरा तज्यो मेवाड़ ने भूंडा हुआ भाग
नींद तज नृप तू जाग मूढ़मत जाग ।।1038।।

भगती तो ही भली मोटो हुयो मेवाड़
मीरा रे गया पाछे हारया हा हर राड़ ।।1039।।

ज्यो चावो मेवाड़ ने पाछी ल्यावो जार
मीरा बैठी द्वारका गुण गोविन्द रा गार ।।1040।।

राणा मानी राय ने भेजो भल सरदार
पंडित भेजो साथ में चारण भी दो चार ।।1041।।

मीरा गर जे मानज्या ले आवो तत्काल
मीरा रे ही आविया होसी चोखा हाल ।।1042।।

पंडित संग में पारधी संग चारण सरदार
मीरा मनावन वास्ते तुरत हुया तैयार ।।1043।।

धर मजला मेवाड़ धर पहुँच्या धर सौराठ
कद आवे मीरा कहो अर होवे आनंद ठाठ ।।1044।।

मीरा मनावन मोकळ्या गया द्वारका धाम
मीरा बिन मेवाड़ रो सरे न एको काम ।।1045।।

जा पूग्या मंदिर जठे मीरा गावे झूम
मृदंग बजे मोकळा माचे जोरा धूम ।।1046।।

दर्शन किना द्वारका खुसी भई अनपार
मोहन मूरत मोहनी निरखे बारंबार ।।1047।।

अरजी करे आज ए मीरा मेलो मेवाड़
मेदपाट रे माथ पर टूट्यो दुःख पहाड़ ।।1048।।

बिन मीरा न मिटे मेवाड़ री पीड़
अब तो म्हे ले जावस्या मीरा माँ न तीड़ ।।1049।।

मीरा रा भजना माहि आ बैठया है आप
राणो मीरा रूठ के लियो घणो ही शाप ।।1050।।

मीरा ठहरी गावती सब मिल करया प्रणाम
देखत मीरा दाखवि जाणक आया जाम ।।1051।।

नमन करे मीरा कने बोल्या है आ बात
चालो मायड मेवाड़ में जोड़ा लामा हात ।।1052।।

राणो थाने रीस कर दिनया कष्ट अपार
फल भोगे अब राणसी बहुत पड्यो बीमार ।।1053।।

और कोई ओखद नहीं औखध बनो थे आप
आप पधारया ही मिटे राणा कीधा पाप ।।1054।।

गलती राणा री घणी मीरा करावो माफ़
अब थाने बुलाविया अंतर करने साफ़ ।।1055।।

भगती थाने भावती धणी करावो धाप
अरजी है आपसू घरे पधारो आप ।।1056।।

आप बिना सरे नहीँ म्हारा कोई काम
म्हाने तो अब तारसी आप जप्योडो नाम ।।1057।।

कोई अब न कुबद करे भगती करज्यो भरपूर
रेहवो आप रावले द्वारका है दूर ।।1058।।

बोली मीरा बात सुण कहवुं हूँ कर जोर
मैं पतंग री जिंया हाथ सांवरे डोर ।।1059।।

चावे ज्यूँ ही सांवरो म्हे तो रोज करूँह
म्हे मोहन मस्टरोल में हाजरडी भरुंह ।।1060।।

इक इक साँस अनमोल है स्याम सुमरया न जाय
इतरो ही जाणू अबे थाने कैवूं काय ।।1061।।

पीहर तज्यो मैं सासरो मेडतियो चित्तोड़
म्हारो इक ही आसरो साँवरियो रणछोड़ ।।1062।।

लियो शरणो लाल रो बंसी बजावन वाल
छोड़ जावूं छण में कियां मीरा मन जंजाल ।।1063।।

तीन दिन रो टेम दयो उत्तर देस्यू आय
म्हारो मालक मोहन पुछु उनने जाय ।।1064।।

मीरा ने मालक मिल्यो मंजिल पूगी जाय
अब पाछी किम बावड़े सोच रही मन माय ।।1065।।

द्वारका ने छोड़ मैं जाऊँ किम मेवाड़
उण घर में जाऊँ कियां दिनों कद रो छाड़ ।।1066।।

बिंदु सिंधु ने चली आ पूगी समद मुहान
अब सरिता रे मायने कैया मिलसी जाय ।।1067।।

कलि फूल सी खिली सौरम रही छाय
अब पाछी कलि कहो कैसे बनी सुहाय ।।1068।।

धारणा सूं समाधी धारली पुनि न धारण होय
अगम पंथ यो योग रो सहज सधे न कोय ।।1069।।

माटी पकी कुम्भ बनी किम माटी पुनि होय
मीरा रे दुविधा घणी घणी राखी गोय ।।1070।।

अब जाणो नहीं हाथ में छोड़ द्वारकानाथ
अब जाया न सरे तज सांवरिया रो साथ ।।1071।।

तन जासी मेवाड़ भल मन रहसी चरणा माय
एक जीव दो जगा किकर रहसी हाय ।।1072।।

मैं शरीर हूँ नहीं आ नह जाणे कोय
आ म्हे ही जाणती साँची कैवूं सोय ।।1073।।

तीन दिन तो बितसी देस्यू काई जवाब
सोच सोच मीरा तणी उतरी मुखड़े आब ।।1074।।

देह देउँ मैं भले मन मोहन ने देय
कारज तो दोन्यू सरे मीरा मन में केय ।।1075।।

दुविधा हुवी दूर मीरा मन मुस्कावती
भजन हुया भरपूर मिलस्यू मोहन मायने ।।1076।।

जानणो शुरू कियो करयो जतन भरपूर
अब होनो बाक़ी रह्यो वो भी होसी जरूर ।।1077।।

मैं नहीं छोड़ू मोहना थाने कहूँ बतलाय
देह छोड़ू द्वारका मूरत जाऊं समाय ।।1078।।

बूँद समुदर जा मिले वाही है बड़भाग
मीरा मन विचार कर करसी देह त्याग ।।1079।।

ओ फैसलो है अटल मीरा मन लियो धार
मोहन मूरत में मिलूँ अब न करूँ अंवार ।।1080।।

सुबह तीसरे दिवस मिल्या सब सरदार
कैवण लाग्या मात थे बोलो आप विचार ।।1081।।

मीरा बोली थे सुणो म्हे पुछू मोहन जाय
रजा मिले जो श्याम री कहस्यु थाने आय ।।1082।।

मीरा एकतारो लियो गावण लागी गीत
छोड़ू किकर सांवरा जनम जनम री प्रीत ।।1083।।

सब कुछ छोड्यो सांवरा प्रीत निभावन ताण
थे प्रभु प्रीत निभावज्यो औसर पड़ियो आण ।।1084।।

प्रीत निभाज्यो सांवरा नहीं हांसी जग में होय
मीरा समावे मूरती पल्लो न पकड़े कोय ।।1085।।

आखर इक अरदास हाथ जोड़ आ करी
राखिजो विस्वास सांचो इक ही सांवरो ।।1086।।

एकतारो राख्यो अबे गयी ग्रभ गृह माय
हुयो उजालो जोर को मीरा दिखी नाय ।।1087।।

आंख्या देखत आदमी मूरत माहि समाय
भगती मीरा री भली सदेह मुक्ति पाय ।।1088।।

जीव समावे ब्रह्म में एहड़ा हुआ हजार
देह समाई मूरती मीरा पहली बार ।।1089।।

ढूंढन मीरा मोकळा मिली न मंदिर माय
भगवा मीरा चुनड़ी मूरत संग दरसाय ।।1090।।

मीरा मोहन मूरती किन बिध गयी समाय
अ जाणे इक सांवरो दूजा जाणे नाय ।।1091।।

धन धन मीरा मेडतनी अमर कीनो नाम
भगता री शिरोमणी श्रवण करे प्रणाम ।।1092।।

मीरा चरित म्हे लिख्यो भगती बढ़ावण हेत
ओ लिखायो है कुणी इण रो नहीं चेत ।।1093।।

टूटा फूटा आखरा जुगती कर मै जोड़
नमन करूँ मीरा थने थारी नी कोई होड़ ।।1094।।

II समाप्‍त II

                                                               

)
Mayar bhasha Rajasthani