ढोला मारू (भाग 4)

राजस्‍थान री चावी लोककथा ढोलामारू

 

         ढोलौ ऊंट नै दौड़ायौ जाणै उड़ रियौ व्है। माळवण कळपवा लागी। कदै ही विलाप करै, कदै ही ओळबां देवै, ऊंट नै सराप देवै, कदै ही याद कर झूरै। वींरी चूंदड़ी रा चारूं पल्ला आंसूड़ा सूं भींजग्या, आंख्यां रौ सारौ काजळ बैयग्यौ। कांचळी निचोवै जसी आली व्हेयगी। ढोला रा जाती वेळा आंगणां में पग मंड़्या वीं धूळा री मुट्ठयां भर-भर छाती रै लगावै।   
                ढोलौ उमंग भर्यौ पूंगळ रौ मारग पकड्यौ! घणा-घणा कोड करतौ, मोटा-मोटा मनसूबा बांधतौ, काळा ऊंट रै कामड़ी मारतौ, “सांतरौ चाल, सांतरौ चाल” करतौ, घाटी-वन-डूंगर पार करतौ बढ़्यौै। गैला में टीबां नै माथ अेक गुवाळियै देख्यौ, ऊंट रा गळा में झीणा-झीणा घूघरा वाज रिया है, दोई आड़ी नै जीण रै लांबा-लांबा फूंदा लटक रिया है, ऊंट अस्यौ चाल रियौ है जाणै पाणी रौ रेलौ बैवतोै आय रियौ व्है। सवार रौ मूंडौ कोड सूं चमक रियौ है।
गुवालियौ बोल्यौ- “घर कोई गोरी बाट नाळ री है, जीं रै खातर अस्या सी-पाळा में भाग्यौ जाय रियौ है?“
                “चांद जसी मारूणी सूं मिलवा जाय रियौ हूं।”
                “वा तौ म्हारी साथण है, म्हूं मारवण रौ मितर हूं।” गुवाळियौ मन में हंसतौ बोल्यौ।
                ढोला रा हाथ सूं ऊंट री मोरी छूटगी। कनै ही ऊमरा रौ चारण आय रियौ। ढोला नै पूंगळ जातां देख वीं रै लाय लागगी, झट साम्हौ झांक निसासौ भरतौ बोल्यौ- “ढोलाजी, जीं मारवण रै  खातर उमग्या जाय रिया हौ, वा तौ बूढी व्हेगी, सारौ माथौ धोळौ व्हेग्यौ। अबै जाय कांई करौला? घणा मोड़ा चेत्या”
                ढोला रौ मन पीपळी रा पत्ता री नांई कांपग्यौ। आगै पग पड़ै न पाछै। वठै हीज ऊंट री मोरी थाम ऊभौ व्हेग्यौ। कांई करूं, कांई नीं? अबै घरै जाय गाम रा मिनखां नै कस्यौ मूंडौ बताऊं?
                साम्हौ अेक आदमी आतौ दीख्यौ। उदास व्हीयौ ढोलै पूछ्यौ-“पूंगळ री मारवणी कांई बूढी व्हेगी है? जाणता व्हौ तौ सांच सांच बताऔ।”
“थांरी अकल कठै गी? थांरौ ब्याव हुयौ जद थां तीन बरस रा हा, मारवणी डोढ बरस री ही, थां तौ जोध जवान हौ अर वा बूढी किंयां व्हेगी?” बटाऊ सवाल कीधौ।
                अेक पल रूकनै कह्यौ-“मारू जिसी अस्त्री आज तांई नीं देखी अर नीं सुणी। म्हैलां में जद वा बोलती व्है जद यूं जाण पडै़ कठै ही वीणा वाज री है! गळा में चांदी रौ गैणौ पैर लै तौ मारूणी रा बदन री छाया पड़णै सूं वौ ही सोना रौ-सो दीखवा लाग जावै।”
                ढोलै झट मुट्ठी भर मोहरां वीं नै देय ऊंट हकाळयौ। पागड़ी नै कस’र बांध लीधी, मोरी ढीली मेली।
                ऊंट तौ वायरां सूं वातां करवा लाग्यौ। सांझ पड़तां-पड़तां पूंगळ जाय पूग्यौ। ढोलौ मारवणी सूं मिल्यौ, मारवणी ढोला सूं मिली। जाणै उनाळा में जेठ री लू सूं बळी बेलड़ी पै सावण री झड़ी लागी।
ढोलौ चार दिन रै, सीख मांग मारूणी नै लारै ले घरै विदा व्हीयौ। ऊंट नै सणगार्यौ। आगै ढोलाजी अर पाछै मारूणी ऊंट पे चढ्या। घर रौ आसूधौ ऊंट, उम्हाया ढोलाजी, वै ही आगता ने ऊंट ही आगतौ।
                ऊमरै सूमरै सुणी- ढोलौ अेकलौ मारूणी नै लीधां जाय रियौ है। वीं देख्यौ मारूणी नै लेवा रौ घणौ आछो मौकौ। गैला रै बीच जाजम ढाळणै बैठग्यौ। ज्यूं ही ढोला रौ ऊंट आयौ, रोकनै मनवार कीधी- “आऔ! आऔ! मनवार लो। घणा मूंघा पांवणा पधार्या!”
                ढोलौ, मारूणी नै ऊंट पै बैठी छोड़, आप जाजम पै बैठ मनवार लेवा लाग्यौ। ऊमरा सूमरा रा मन में तौ पाप, मौकौ देखनै ढोला नै मारवा री घात घाल राखी। मारूणी नै कांई वैम नीं। ढाढी दूहा देय रिया, ढोलाजी अमल री मनवार लेय रिया।
                ढाढी री लुगाई पूंगळ री। वा ऊंमरा सूमरा रा मन रौ पाप जाणै। छानै सूं मारूणी रा कान में जाय कह्यौ- “थांनै लेवा री घात है। ढोला नै ले भागौ, नीं तौ मार्यौ जावैला।”
                मारूणी तौ झट ऊंट रै कामड़ी री दीधी। ऊंट तौ कामड़ी री लागतां री उठ बैठ्यौ, चालवा लाग्यौ। ढोलै देख्यौ ऊंट भाग रियौ। झट ऊंट लारै भाग्यौ पकड़वा नै।
                मारूणी बोली-“धोखौ, झट ऊंट पै चढौ!”
                ढोलौ तौ देतां ही पगड़ा पै पग नै ऊंट पै चढनै मारी कामड़ी री, ऊंट भाग्यौ।
                ऊमरौ “अरे अरे” करतौ रैयग्यौ। झट घोड़ा पै चढनै लारै व्हीयौ, पण वौ काळौ टोरड़ौ! घोड़ा नै पूगवा कद देतौ! घोड़ा पाछै रैग्या। ढोला मारूणी घरै आया।
                ढोलाजी मारूणी रै अर माळवणी रै साथै घणा आणंद सूं रैवा लाग्या।

                   ।। समाप्त ।।
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लेखक परिचय

रानी लक्ष्‍मी कुमारी चूंडावत
उनका जन्म २४ जून १९१६ को मेवाड़ में हुआ। वे राजस्थान में मेवाड़ राजघराने की एक बड़ी रियासत देवगढ़ के रावत विजयसिंह की पुत्री थीं। उनका विवाह १९३४ में रावतसर के रावत तेज सिंह से हुआ। २४ मई २०१४ को उनका निधन हो गया। उन्होंने राजस्थानी भाषा की मान्यता दिलाने के भरसक प्रयास किये। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्या थीं और उन्होने देवगढ़ विधान सभा का १९६२ से १९७१ तक प्रतिनिधित्व किया। वे १९७२ से १९७८ तक राज्यसभा की सदस्या रहीं। वे राजस्थान प्रदेश कांग्रेस समिति की अध्यक्ष भी रहीं। राजस्थानी साहित्य में उनके योगदान के लिए १९८४ में उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। इसी तरह उन्हें साहित्य महमहोपाध्याय, राजस्थान रत्न टेसिटरी गोल्ड अवार्ड, महाराना कुम्भा पुरस्कार, सोवियत लैण्ड नेहरू अवार्ड आदि से भी पुरस्कृत किया गया। उन्होंने राजस्थानी और हिन्दी में अनेक पुस्तकों की रचना की। राजस्थानी में उनकी प्रमुख पुस्तकें मुमल, देवनारायण बगड़ावत महागाथा, राजस्थान के रीति-रिवाज, अंतरध्वनि, लेनिन री जीवनी, हिंदुकुश के उस पार हैं।

प्रस्‍तुति -

श्री महेश कुमार प्रजापत
जोधपुर जिले की शेरगढ तहसील अंतर्गत शेरगढ गांव में 10 जुलाई 1978 को जन्मे कवि महेश कुमार प्रजापत की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम शेरगढ व बाद में अहमदाबाद (गुजरात) में हुई।हायर सेकेंडरी शिक्षा शेरगढ से प्राप्‍त करने के बाद जोधपुर के जयनारायण विश्‍वविद्यालय से बी ए की डिग्री हासिल की । 2007 में बीएड करने के बाद अध्‍यापक तृतीय श्रेणी के पद पर चयनित हुए और फिर वर्धमान खुला विश्‍वविद्यालय कोटा से एम ए (हिन्‍दी) की डिग्री हासिल की। वर्तमान में ग्राम शेरगढ में अध्‍यापक पद पर पदस्थापित है। बचपन से ही साहित्‍य में रूचि होने के कारण लेखन व लुप्‍त प्राय राजस्‍थानी साहित्‍य के संकलन हेतु प्रयास रत हैं।