ढोला मारू (भाग 3)

राजस्‍थान री चावी लोककथा ढोलामारू

 

         आंख्या में हंसती, छाती पै मोत्यां रौ हार हलावती माळवण, मुळकती ढोला कनै आई। ढोला रा डोळ देख, उठ्योड़ा पग थमग्या- “यूं क्यूं? कालै हा जो आज नीं! ललाट माथै त्रिसूळ, नाक में सळ घाल राख्या है। कांई बात है, कठै ही मारवण री बात तौ याद नीं आयगी?”
                कनै बैठ पूछण लागी- “आज हंसौ नीं, बोलौ नीं, कांई म्हारा सूं रूसाया हौ? चिंता कीं री, बतावौ तौ!”
“थूं स्याणी है। सब समझै। हिरणाक्षी! राजी व्हे सीख दै तौ दिसावर जावूं! देस-देसांतर देखूं!” ढोलै भोळावौ दीधौ।
                  तंती नाद तंबोळ रस,
                  सुरही सुगंध ज्यांह।
                  आसण तुरि घर गोरड़ी,
                  तिकौ दिसावर क्यांह।।
                “जींरा घर में मीठा सुर रा बाजा बाजता व्है, तांबुल रस ने सुगंधी व्है। चढवा नै आछा घोड़ा, घर में रूपाळी स्त्री व्है, वींनै दिसावर जाणै री जरूरत कांई?” माळवण उŸार दीधौ।
                “ईडर जावूं तौ थांरै गैणा घड़ाय लावूं।”
                “घर बैठ्यां ही गैणा मंगाय लेवांला।”
                “मुलतान सूं घोड़ा खरीद लाणा है!”
                “सौदागर अपणै आप अठै लेय आवैगा। थां छांट-छांट नै बांका मूंडा रा घोड़ा खरीदजौ!”
                ढोला घणा आळखा लीधा- “कच्छ में यौ काम, गुजरात में वौ काम। गैणा लावूं, चीर लावूं, मोती ले’र आवूंगा।”
                “ढोलाजी, थां अणमणां व्हे रिया हौ, नखां सूं भींत खुरच रिया हौ। सांच-सांच बतावौ, मन में कांई है?” माळवण रौ वैम बढ़तौ ग्यौ।
“मारूणी सूं मिलणै री इच्छा व्हेय री है!” धीरै सूं ढोलौ बोल्यौ।
माळवण तौ सुणतां ही धड़ाक आंगणै जाय पड़ी, जाणै सांप खायग्यौ व्है। वींझणी कर, पाणी रौ छांटौ दे चेतौ करायौ। ढोलौ जाणै री त्यारी कीधी। जद माळवण बोली-
                “अबार चौमासा में कदै ही कोई घर सूं बारै नीसरै? ईं रित में तौ बुगला ही धरती माथै पग कोनी देवै! पपीया बोल रिया है, कोयलां सुरंगा सबद कर री है, डूंगर हर्या व्हे रिया है। इसी रित में बारै कुण जावै? के मांगवा वाळा, के चोर अर के चाकर घर छोड़’र नीसरै। नदियां चढ री है, बादळा झर रिया है, यां सुवावणा दिनां में म्हूं थां बिना किस्या रैवूंगी। धरती तौ लीली-लीली दीखैला अर थांरी माळवण थांरै गयां सूं पीळी पड़ जावैला। म्हनै यां बादळयां री नांई रोवती छोड़ कठै जावौ। चौमासै-चौमासै ठैर जावौ!”
                “दसरावा तांई और रूक जावूंला!” ढोलौ निसासौ न्हांकतौ बोल्यौ।
                                आज धरा दिस ऊनम्यौ
                                काळी धड़ सखरांह।
                                वा धण देसी ओळबा,
                                कर-कर लांबी बांह।।
                “इंदर धरती साम्हौ उलळ रियौ है, मगरा रा टूंचकां नै बादळयां छाती सूं लगाय राखी है। वठै बैठी वा मारूणी बांहा लांबी कर-कर म्हनै ओळंबा देय री व्हैली।”
                दिन जातां कांई देर लागै? चौमासौ निकळयौ, दसरावौ ही निकळयौ। अबै ढोलौ पूंगळ जाणै री त्यारी कीधी-
                “अबै पूंगळ जावा दौ, थांरै कैवा सूं चौमासौ रूकग्यौ, सियाळौ आयग्यौ, अबै जावूं। हंस’र विदा कर दौ!”
                “यै सियाळै रा दिन ही कोई जाणै रा व्है? पाळौ पड़ै, घोड़ा नै ही टापर ओढाणी पड़ै। जीं रित में सीपां में मोती नीपजै, हिरण्यां ग्याभणी वहै, उŸाराध रौ तीखौ पवन चालै, अस्या दिनां में ही कोई घर छोड़’र जावै? यां दिनां में तौ सांप ही बिल नीं छोड़ै।”
                       त्‍तर आज स उतरही,
                       वाजै लहर असाधि।
                       संजोगणी सोहावणौ,
                       वीजोगण अंग दाधि।।
                “उत्तर रौ पवन वाज रियौ है, पाळा री लैरां चाल री है। संजोगणियां नै तौ सुख देवै, पण विजोगणियां नै बाळनै राख कर देवै।”
                माळवण कैती री। ढोलौ सवार व्हेग्यौ। माळवण डब-डब आंख्यां करती, झब-झब करती पागड़ा रै झूंबगी।
ढोलौ बोल्यौ- “म्हूं जावूंला जरूर। थांनै नींद आय जावैला, सूता नै छोड़ विदा व्हेय जावूंला।”
                अबै माळवण सोवै हीज नीं, अेक पल ढोला नै अेकलौ नीं छोड़ै। ढोलै आछा तेज चालण्या ऊंट नै, जो अेक दिन में सौ कोस रौ गैलौ काटै, पलाण त्यार कर राख्यौ।
माळवण नै जक नीं। यूं करतां-करतां पनरा दिन बीतग्या। माळवण री आंख्यां सूजगी। अेक दिन नींद री हारी री पलकां झपगी। ढोलै तौ ऊंट नै पागड़ै लगाणै रौ हेलौ मार्यौ। चट ऊंट पै सवार व्हे अेड़ मारी। ऊंट ‘बळ-बळ’ बोलतौ उठ्यौ। ऊंट री बोली सुणतां ही तौ माळवण चमकी, देखै तौ कनै ढोलौ नीं। गोखड़ा में जाय नीचै झांकै तौ ऊंट पै सवार  ढोलौ जावतौ दीख्यौ। ढोलै गोखड़ा में ऊभी माळवण नै देखी जाणै बीजळी तड़फी व्हैै। ऊंट री मोरी खैंची, जो अेक पल में गाम रै बारै जातां ऊंट रौ पळकौ माळवण नै पड़यौ।
                माळवण हाका करती रैयगी- “कोई ढोलाजी नै रोकौ, कोई ढोलाजी नै रोकौ!”


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लेखक परिचय

रानी लक्ष्‍मी कुमारी चूंडावत
उनका जन्म २४ जून १९१६ को मेवाड़ में हुआ। वे राजस्थान में मेवाड़ राजघराने की एक बड़ी रियासत देवगढ़ के रावत विजयसिंह की पुत्री थीं। उनका विवाह १९३४ में रावतसर के रावत तेज सिंह से हुआ। २४ मई २०१४ को उनका निधन हो गया। उन्होंने राजस्थानी भाषा की मान्यता दिलाने के भरसक प्रयास किये। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्या थीं और उन्होने देवगढ़ विधान सभा का १९६२ से १९७१ तक प्रतिनिधित्व किया। वे १९७२ से १९७८ तक राज्यसभा की सदस्या रहीं। वे राजस्थान प्रदेश कांग्रेस समिति की अध्यक्ष भी रहीं। राजस्थानी साहित्य में उनके योगदान के लिए १९८४ में उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। इसी तरह उन्हें साहित्य महमहोपाध्याय, राजस्थान रत्न टेसिटरी गोल्ड अवार्ड, महाराना कुम्भा पुरस्कार, सोवियत लैण्ड नेहरू अवार्ड आदि से भी पुरस्कृत किया गया। उन्होंने राजस्थानी और हिन्दी में अनेक पुस्तकों की रचना की। राजस्थानी में उनकी प्रमुख पुस्तकें मुमल, देवनारायण बगड़ावत महागाथा, राजस्थान के रीति-रिवाज, अंतरध्वनि, लेनिन री जीवनी, हिंदुकुश के उस पार हैं।

प्रस्‍तुति -

श्री महेश कुमार प्रजापत
जोधपुर जिले की शेरगढ तहसील अंतर्गत शेरगढ गांव में 10 जुलाई 1978 को जन्मे कवि महेश कुमार प्रजापत की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम शेरगढ व बाद में अहमदाबाद (गुजरात) में हुई।हायर सेकेंडरी शिक्षा शेरगढ से प्राप्‍त करने के बाद जोधपुर के जयनारायण विश्‍वविद्यालय से बी ए की डिग्री हासिल की । 2007 में बीएड करने के बाद अध्‍यापक तृतीय श्रेणी के पद पर चयनित हुए और फिर वर्धमान खुला विश्‍वविद्यालय कोटा से एम ए (हिन्‍दी) की डिग्री हासिल की। वर्तमान में ग्राम शेरगढ में अध्‍यापक पद पर पदस्थापित है। बचपन से ही साहित्‍य में रूचि होने के कारण लेखन व लुप्‍त प्राय राजस्‍थानी साहित्‍य के संकलन हेतु प्रयास रत हैं।