ढोला मारू (भाग 2)

राजस्‍थान री चावी लोककथा ढोलामारू

 

          बादळा छाय रया, अंधारी रात में बीजळयां ओळां खैंचती, आंठा खाती, चारूं कानी चमक री, जाणै इंदराणी रा काळा घाघरा में सुनैरी जरी रौ काम व्है रियौ व्है। माळिया में ढोलौ सूतौ बीजळयां खिंवती देखै, माळिया रै नीचला घर सूं गाणै री तान ऊंची ऊठी। सीळी रात में मलार राग, झीणी-झीणी पड़ती मेह री बूंदा रै सागै, मधरा-मधरा चालता पवन में भरगी। ढोलौ, फण ऊंचा कीधा नाग ज्यूं राग पै झूमवा लाग्यौ। गावा वाळा मीठा गळा सूं साफ-साफ सबदां में कह्यौ-
                ढोलौ नरवर सेरियां,
                धणं पूंगळ गळियांह।

                ढोलौ चमक्यौ, वीं रौ अर वीं री बाळपणा में परणी मारूणी रौ नाम? बाळपणा में परणी मारूणी रौ नाम? सारौ ध्यान अेक जगा कर सुणवा लाग्यौ। बाळपणा रौ ब्याव! ढोला रौ भूल जावणौ!! मारूणी रा रूप रौ बखाण!!! जाणै पोथी खोल आगै राख दीधी।
                ओछा पाणी री माछळी ज्यूं ढोलौ तड़फै।
                बरखा बरसती री, ढाढी गातौ रियौ, ढोलौ सुणै-
     

                आंखड़िया डंबर हुई,
                नयण गमाया रोय।
                के साजण परदेस में,
                रह्या बिडाणा होय।।

                “आंख्यां लाल व्हैगी, रोय-रोय नैण गंवाय दीधा। साजन तौ परदेय में पराया व्हे रिया है।”
                बहु धंधाळू आव घर,
                कां सूं करै विदेस।
                संपत सगळी संपजै,        
                आ दिन कदी लहेस।।

सारी रात ढाढी गातौ रियौ, ढोलौ सुणतौ रियौ। आंगणौ, पोळ, ओवरा सारौ घर जाणै मारूणी रा संदेस सूं भरग्यौ। ढोलौ सुणतौ रियौ, ढोल्या पै सूतौ पण जाणै ताती खेह पै लोट रियौ व्है। दिन ऊगतां ही गावा वाळा नै बुलायौ।
“थां कठा सूं आय रिया हौ?”
“पूंगळ सूं, मारवण रौ सनेसौ ले’र। ढोलाजी री वाट देखतां-देखतां, मारूणी कुंझ रा बच्चा री नांई लांबी गरदन री व्हैगी है। वीं कंचनवरणी कामणी सूं झट जाय मिलौ!”
                दुज्जण वयण न सांभरी,
                मनां न वीसारेह।
                कूंझां लाल बचांह ज्यूं,
                खिण-खिण चींतारेह।।
“खोटा मिनखां री वातां में आय वींनै मन सूं मत उतारौ। कूंजां रा लाल बच्चां ज्यूं पल-पल थांनै याद करती रैवै वा मारूणी।”
आंसू सूं आला व्हीयोड़ा चीर नै निचोवतां-निचोवतां वींरी हथेळयां में छाळा पड़ग्या है।
                जे थूं साहिब नावियौ,
                सावण पहली तीज।
                बीज तणै झबूकड़ै,
                मूंध मरेसी खीज।।
“जो थां सावण री तीज पैला कोनी गिया तौ बीजळी खींवती देख वा मुगधा खीजनै मर जावैला।”
थांरी मारूणी रा रूप ने गुण रौ बखाण नीं व्है। घणा पूरब रा पुन्न कर्योड़ा व्है जींतै असी अस्तरी मिलै।
                नमणी खमणी, बहुगणी,       
                सुकोमळ सुकच्छ।
                गोरी गंगा नीर ज्यूं,             
                मन गरवी तन अच्छ।।
“घणा गुण वाळी, खमणी, नमणी ने कोमल है। गंगा रा पाणी सरीखी गोरी, आछा तन अर मन री।”
                गति गयंद जंघ केळ ग्रभ,
                केहर जिमि करि लंक।
                हीर डसण विप्रभ अधर,
                मारण भृकुटि मयंक।।
“हाथी जसी चाल, हीरा जस्या दांत, मंूगा सरीखा  होठ है। थांरी मारवण रै सिंघ सरीखी कमर, चंदरमा जस्या भूंवारा है।”           
                आदिता हूं ऊजळौ,               
                मारूणी मुख व्रण्ण।
                झीणा कपड़ा पैरणा,
                (जाणै) झांकेई सोव्रण्ण।।
“मारवणी रौ मंूडौ सूरज सूं ही ऊजळौ है। झीणा कपड़ा में सूं सरीर चमकै जाणै सोनौ झांक रियौ है।”
ढोला रौ काळजौ उछाळा खावा लाग्यौ। मन पंछी व्है अर प्राणां रै पांखां व्है तौ ई वन नै उलांघ वठै जाय पूगै। मन मारवणी कनै जाय पूगौ, जाणै बाज पंछी नै मूंठ में भरनै उड़ाय दीधौ व्है।


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लेखक परिचय

रानी लक्ष्‍मी कुमारी चूंडावत
उनका जन्म २४ जून १९१६ को मेवाड़ में हुआ। वे राजस्थान में मेवाड़ राजघराने की एक बड़ी रियासत देवगढ़ के रावत विजयसिंह की पुत्री थीं। उनका विवाह १९३४ में रावतसर के रावत तेज सिंह से हुआ। २४ मई २०१४ को उनका निधन हो गया। उन्होंने राजस्थानी भाषा की मान्यता दिलाने के भरसक प्रयास किये। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्या थीं और उन्होने देवगढ़ विधान सभा का १९६२ से १९७१ तक प्रतिनिधित्व किया। वे १९७२ से १९७८ तक राज्यसभा की सदस्या रहीं। वे राजस्थान प्रदेश कांग्रेस समिति की अध्यक्ष भी रहीं। राजस्थानी साहित्य में उनके योगदान के लिए १९८४ में उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। इसी तरह उन्हें साहित्य महमहोपाध्याय, राजस्थान रत्न टेसिटरी गोल्ड अवार्ड, महाराना कुम्भा पुरस्कार, सोवियत लैण्ड नेहरू अवार्ड आदि से भी पुरस्कृत किया गया। उन्होंने राजस्थानी और हिन्दी में अनेक पुस्तकों की रचना की। राजस्थानी में उनकी प्रमुख पुस्तकें मुमल, देवनारायण बगड़ावत महागाथा, राजस्थान के रीति-रिवाज, अंतरध्वनि, लेनिन री जीवनी, हिंदुकुश के उस पार हैं।

प्रस्‍तुति -

श्री महेश कुमार प्रजापत
जोधपुर जिले की शेरगढ तहसील अंतर्गत शेरगढ गांव में 10 जुलाई 1978 को जन्मे कवि महेश कुमार प्रजापत की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम शेरगढ व बाद में अहमदाबाद (गुजरात) में हुई।हायर सेकेंडरी शिक्षा शेरगढ से प्राप्‍त करने के बाद जोधपुर के जयनारायण विश्‍वविद्यालय से बी ए की डिग्री हासिल की । 2007 में बीएड करने के बाद अध्‍यापक तृतीय श्रेणी के पद पर चयनित हुए और फिर वर्धमान खुला विश्‍वविद्यालय कोटा से एम ए (हिन्‍दी) की डिग्री हासिल की। वर्तमान में ग्राम शेरगढ में अध्‍यापक पद पर पदस्थापित है। बचपन से ही साहित्‍य में रूचि होने के कारण लेखन व लुप्‍त प्राय राजस्‍थानी साहित्‍य के संकलन हेतु प्रयास रत हैं।