MayarBhasha राजस्‍थानी

श्री रामचरित पदावली

                पद ।।1।।

अब जागो रघुनाथ बना अरुण शिखा धुनि आय रही

राजमहल पलना  पर पोढ़े रजनी आय सुलाय रही

नैन खोल देखो नारायण सुन्दर सुबह सुहाय रही।।1।।

ब्रह्म मुहूर्त में ब्रह्मा जाग्या वेद री धुनि सुनाय रही

जाप ताप तो करता तपसी जोगी जोग लगाय रही।।2।।

मंदिर माही ठाकुर पूजा आरती थाल सजाय रही

ढोल नगारा नोबत बाजे कर खड़ताल बजाय रही।।3।।

जाचक झोली लेकर चाल्या दानी दान लुटात रही

खुली किवाड़ी गो धन की धेनु दूध दुहाय रही।।4।।

उठो राम अब प्रात भयो दुनिया दर्शन चाय रही

मात कौशल्या राम जगावे राग प्रभात सुनाय रही।।5।।

 

 

                पद ।।2।।

अब जागो रघुनाथ कँवर प्राची में रवि उदित भयो

तारा संग में उग्यो चंद्रमा देखो अब वो अस्त भयो

छाई अरुणिमा नभ् मंडल में शीतल मंद समीर बह्यो।।1।।

रजनी की कालिमा देखो धीरे धीरे लुप्त भई

नव प्रकाश की किरण आज तिमिर पुञ्ज को लील गई।।2।।

बिग़से कुसुम पर देखो प्यारे भ्रमर मंडरात रहे

सुन्दर रूप मनोहर छवि  क्यों न आप दिखलात रहे।।3।।

उठो राम अब दरश दिखावो नयन हमारे अकुलात रहे

आप बिना सब कुछ सूना दो दर्शन परभात रहे।।4।।

 

 

                पद ।।3।।

देखो रघुवर कँवर आज आँगन देहरी लाँघ परे

पलना से उतरे चुपके से घुटुवन आँगन चाल परे

धीरे धीरे घुटुवण के बल चालत आँगन में बिचरे।।1।।

आँगन चालत इत उत देखत कोई हमको ना पकरे

मंद गति से चले चतुर बन पांव धरे अधरे अधरे।।2।।

जा पहुंचे द्वार समीप अब बाहर घर से किम निकरे

दोनो कर से पकरी देहरी अरु पार करन की जतन करे।।3।।

पैर उठात धरे देहरी पर पुनि पग आँगन माहि धरे

पार उतारत जो जग को देहरी लाँघत आज डरे।।4।।

आखिर पांव धरयो देहरी पर कर अपनों बाहर धरे

बड़े जुगत से जग के दाता घर की देहरी पार करे।।5।।

कह श्रवण यह दृश्य अलौकिक कैसे वर्णन जात करे

राम आज देहरी लांघी धन्य देख निज भाग करे।।6।।

 

 

                पद ।।4।।

महल झरोखे बैठ राम आज माखन रोटी खात रहे

स्वर्ण कटोरी माखन भरियो रतन थाळ पुरसात रहे

जल झारी कनक अति सुन्दर नीलम बाजोट सुहात रहे।।1।।

रोटी ग्रास हाथ एक तोड़यो लिए हाथ इठलात रहे

माखन संग जीमण खातर बार बार दिखलात रहे।।2।।

ताहि समय काग बड़भागी आम्र तरु पर आत रहे

उड़कर महल झरोखे बैठ्यो माखन खातर घात रहे।।3।।

काग उड़त ग्रास कर छीनयो पुनि अकाश उड़ जात रहे

रोटी छीनत रघुकुल नंदन देखो रुदन मचात रहे।।4।।

बड़े भाग काग के देखो रोटी राम चुरात रहे

श्रवण लख यह सुन्दर शोभा कैसे आज लिखात रहे।।5।।

                पद ।।5।।

देखो रघुवर कँवर आज संग भ्रात पटशाल चले।

मुंडित सिर पर शिखा धार के काँधे पर जनुआत धरे

पाटी पोथी एक हाथ में दूजे में धनुआ पकरे।।1।।

श्वेत वसन गले तुलसी माला मस्तक चन्दन तिलक करे

मात पिता को करके वंदन गुरु संग महलो से निकरे।।2।।

नगर निवासी भये उदासी दर्शन नित अब काहि करे

शिक्षा खातिर गुरुकुल रहसी सारे मन में सोच करे।।3।।

आगे गुरु पाछे राजकुंवर सब पुरी अवध से गमन करे

जा पहुंचे गुरुकुल सब ही आश्रम द्वार को नमन करे।।4।।

श्रवण वर्णन करत यह शोभा हर्षित मन से नमन रे

सभी शास्त्र जाके ही रचे है आज शिष्य बन पठन करे।।5।।

 

 

                पद ।।6।।

देखो गुरुवर चारो भ्रात को विद्या सकल सिखात रहे।।

वर्ण अक्षर आज सिखावे बार बार  समझात रहे

व्याकरण ज्ञान अरु उच्चारण मुख बोल सिखलात रहे।।1।।

चार वेद को मर्मभेद अरु पुराण पढ़ात रहे

खगोल भूगोल को ज्ञान करा निशि आकाश दिखात रहे।।2।।

जोतिष विद्या अंक शास्त्र अरु नक्षत्र  योग बतलात रहे

यंत्र मंत्र तंत्र की शिक्षा अर्थ गूढ़ समझात रहे।।3।।

अस्त्र शस्त्र धनुर्विद्या का अभ्यास करात रहे

सकल बाण सृष्टि के सारे कैसे चलात सिखात रहे।।4।।

कूटनीति और राजनीती संग अर्थनीति समझात रहे

चरित्र धर्म अरु राजधर्म की मर्याद बतलात रहे।।5।।

जो ज्ञान के सागर प्रभु उन्हें ज्ञान पढ़ात रहे

श्रवण यह भेद कोई नह जानत पढ़त वही जो पढ़ात रहे।।6।।

 

 

                पद ।।7।।

देखो रघुवर कँवर आज मृगया खेलन जात परे

कांधे धनुवा तरकश धारे घोड़े हो असवार चले

दौड़त अश्व पहुंचे जंगल में देखत मृग दौड़त उछले।।1।।

आगे मृग पीछे रघुवर बार बार संधान करे

बड़े भाग मृगन के देखो जो रघुवर हाथ मरे।।2।।

मृगछौना इक अति सुन्दर देखत रघुवर चौंक परे

रोक दियो तीर पुनि अपने अश्व से नीचे उतर परे।।3।।

कह रघुवर मन ही मन में नही मृगया अब वो करे

निरपराध को व्याध की भांति नहीं उनसे जात परे।।4।।

मृगछौना को लिए गोद प्रेम व्हिवल नयन झरे

श्रवण देख प्रेम अति सुन्दर सुर नर मुनि जयकार करे।।5।।

 

 

                पद ।।8।।

देखो रघुवर कँवर आज कनखो जात उडात रहे

एक हाथ में कनखो लीनो दूजे में गुड़ी  पकडात रहे

चढ़े चौबारे छत के उपर शीतल मंद समीर बहे।।1।।

पतंग चढ़ाई नभ् आकाशा बार बार इठलात रहे

कभी चढ़ावे कभी उतारे करतब घने दिखात रहे।।2।।

सुरपति की सुता जयंता अमरपुरी से देखात रहे

कर बढ़ाकर पकड़यो कनखा ऐसे बचन सुनात रहे।।3।।

सुनो पिता मैं वरुं उसीको जो यह कनखा चढ़ात रहे

कहे सुरपति सुनो सुता यह तीन लोक के नाथ रहे।।4।।

सारे जग के स्वामी है ये कहकर पतंग छुडात रहे

कहे श्रवण रघुवर को कनखा कैसे बरणो जात रहे।।5।।

 

 

                पद ।।9।।

देखो अवधपुर आय गुरूजी राम लखन दोय मांग रहे

असुर अधम अपराध करे जग विध्वंस कराय रहे

जग्य बिना हुवै धर्म की हानि वचन आप सुनाय रहे।।1।।

ताड़क बन में रहे ताड़का संग मारीच बताय रहे

जगधूम् को देखत ही जग विध्वंस कराय रहे।।2।।

चार कुंवर दशरथ के कहिये बड़े धनुर्धर बताय रहे

दो सुत राम लखन खातिर गुरु हुक्म फरमाय रहे।।3।।

हाथी घोडा सेना देवूं  संग खुद पठात रहे

राम लखन मेरे दो नैना बालक छोटे बतात रहे।।4।।

राम लखन बिन मरे न राक्षस गुरूजी बचन सुनाय रहे

लेके दोनों कँवर आज वन को गुरूजी सिधाय रहे।।5।।

धनुष बान ले चले भ्रात दो शोभा अति सुहाय रहे

श्रवण लख छबि राम लखन की कोटि काम शरमाय रहे।।6।।

 

                पद ।।10।।

 देखो रघुवर लखन आज असुर अनेक संहार रहे

ताड़क वन सूं चाल्या गुरु संग रागस अनेक डकार रहे

उत्तर दिशा सूं आंधी आई देखत मन यह विचार रहे।।1।।

कहे गुरूजी सुनो कँवर तुम नहीं यह अंधकार रहे

इक ताड़का नाम पिशाचन इत आवत अबार रहे।।2।।

इतने में आई ताड़का रूप कुरूप अणपार रहे

गुरु आज्ञा से बाण चलायो पल माहि तेहि संहार रहे।।3।।

इतने में मारीच चल आयो करतो हाहाकार रहे

बिन फर को शर एसो मारयो जात समंदर पार रहे।।4।।

देख राम को कौशल भारी सुरमुनि जय पुकार रहे

कह श्रवण गुरु आज्ञा से रघुवर रागस मार रहे।।5।।

 

 

                पद ।।11।।

पत्थर की नारी देख राम गुरु से बात करे रे करे

राम लखन संग गुरु आज जनक पुर को जात परे

मार्ग में नारी शीला को देख गुरु संग बात करे।।1।।

गुरुवर बोले यह गौतम नारी शाप विवश यह रूप धरे

गर रज मिलती आप चरण की पुनि बन जावे नार अरे।।2।।

इन्द्र चंद्र दउ छल कीनो गौतम नार को शील हरे

शाप दियो गौतम खुद ही तब पाहन को रूप धरे।।3।।

गुरु आज्ञा से रघुकुलनंदन गौतम सिला पर पैर धरे

तुरत संजीवन हुई बन नारी रघुवर की जयकार करे।।4।।

जुग जुग से बनी शीला का रघुवर आज उद्धार करे

श्रवण लख प्रताप राम को वर्णन कैसे जात परे।।5।।

 

 

                पद ।।12।।

देखो गुरुवर संग आज जनकपुरी में जात रहे

दुल्हन जैसी सजी जनकपुर सुन्दर तोरण द्वार बने

ध्वजा फहरावे ऊँची नभ् में आँगन मंगल फूल बने।।1।।

सुन्दर लहरी सप्तस्वर में देखो ढोल नगार बजे

मीठी मीठी बजे शहनाई सुन्दर मार्ग आज सजे।।2।।

गीत मधुर सुर गावे गणिका मगन होयकर निरत करे

बालक वृद्ध अरु तरुणी सबके उर में उमंग भरे।।3।।

सुन जनक विश्वामित्र आये चरण कमल पखार रहे

आशीष देवत गुरुवर उनको वेदमंत्र उच्चार रहे।।4।।

बहुविध कीनी पूजा गुरु की जग्य धनुष दिखलाय रहे

श्रवण आज जनकपुर शोभा देख त्रिलोक शर्माय रहे।।5।।

 

 

                पद ।।13।।

देखो रघुवर कँवर आज नगर निहारण काज चले

आगे आगे राम चलत है शीश मुकुट कर धनुष धरे

श्यामल गात सुन्दर अलकावली देख काम खुद लाज मरे।।1।।

पाछे पाछे लखन लाल सुन्दर गौर किशोर अरे

राम लखन की अनुपम जोड़ी चपल चपल निज पांव धरे।।2।।

देख झरोखे नार नवेली देखत खुद को धन्य करे

महल अटारी खड़े नर नारी मन में अति मोद भरे।।3।।

जनकपुरी देखत दोउ भाई देखत मन उल्लास भरे

राजा जनक की सुन्दर नगरी स्वर्गलोक ने दूर धरे।।4।।

राम लखन दोउ नगरी देखत शोभा बरनी न जात परे

श्रवण लख नगरी की शोभा कैसे बरनी जात अरे।।5।।

 

 

                पद ।।14।।

नगर नवेली देख कुंवर को ऐसे बचन सुनात परे

श्यामल गौर किशोर दउ भ्रात कोटि काम लजात अरे

सिंह कंध आजानुबाहु करधर धनुष सुहात अरे।।1।।

सुन्दर रूप छवि मनोहर देखत फिर कल न परे

बांके नयन सुभाव सरल है देखत हमरे मन को हरे।।2।।

ताड़क वन में ताड़का मारी राक्षस सारे मार धरे

गौतम नर अहल्या तारी सुर नर जय जय कार करे।।3।।

अरी सखी मेरे मन माहि जनकदुलारि को यही वरे

शिव धनुष विशाल अति रघुवर कैसे उठात परे।।4।।

मनोकामना पूरी करने अब गौरी मनात धरे

सिय संग कल मंदिर जाकर विनती यही सुनात अरे।।5।।

श्रवण लख राम लखन को नगर नवेली हरशात रहे

जनकदुलारि याहि वरे बार बार यह बात कहे।।6।।

 

 

                पद ।।15।।

देखो रघुवर कँवर आज पुष्प वाटिका जा विचरे

पूजा खातिर पुष्प लेन दुहु कँवर जब निकरे

प्रात समै लागत यूँ शोभा चंद्र सूरज दोउ निकरे।।1।।

जनक नंदिनी संग सहेली गौरी पूजन आई परे

सब सखिया मिल मंगल गावत धीरे धीरे पांव धरे।।2।।

इधर कुंवर पुष्प चुनत है भृमर कलि गुंजार करे

देख मगन भये दोउ भाई हिय माहि हुलास भरे।।3।।

तोडत पुष्प इधर रघुवर उधर सिय दिखात परे

सुन्दर शील सुभाग सती देख राम ठिठक परे।।4।।

दो से चार हुए जो नैना देखत मन लुभात परे

नैनो से नैनो की बतिया श्रवण कैसे लिखात परे।।5।।

                पद ।।16।।

जनकदुलारि गौरी पूजत बार बार वर मांग रही

पुष्पवाटिका मैं लख रघुवर को पुष्प लेय गौरी सदन चली

सिया रूपी पुष्प ऊपर रघुवर भरमत बनके अली।।1।।

कर जोर करे बिनती सीता माँ तुमसे मैं अरज करूँ

श्यामल कुंवर किशोर अवध को ही माँ मैं वरुं।।2।।

बार बार वर मांग रही गौरी आगे अरदास करे

धनुष जग्य में रघुवर मैया तोड़ धनुष उल्लास भरे।।3।।

और न कछु मांगत मैया एक यही मोहि वर दे दे

पूर्ण हो अभिलाष हमारी मैया मोरी अवसर दे दे।।4।।

बार बार मनावत गौरी आशीष दियो है माता

धन्य हुयो लख यह श्रवण सीता मंगल वर पाता।।5।।

 

 

                पद ।।17।।

देखो गुरुवर संग राम ले जग्य भूमि दिखात परे।

वो धरयो शिवधनुष जो शिव राजा देत परे

यही धनुष पे चाप चढ़ावत ताहि गल वरमाल परे।।1।।

यह सभा बनी जहां बिराजत भूप अनूप आय करे

उधर बिराजत ऋषि मुनिगण सुन्दर आसन के उपरे।।2।।

इक पंडाल बण्यो अति सुन्दर तह बैठे सब लोग अरे

सब के सुन्दर लगे चंदवा शोभा सुन्दर धाम अरे।।3।।

ऊँचे आसन जनक बिराजत जो निज प्रण को उचरे

जो भूपति तोड़े धनुवा ता संग सीता भंवर परे।।4।।

जनकपुरी की नवल नारी मधुर कंठ से गान करे

बाजत सप्त स्वर में बाजे सब के हिय आनंद भरे।।5।।

श्रवण लख धनु जग्य की शोभा आखर ओछत मोर परे

जग जननी सीता को स्वयम्बर मुझसे बरणो न जात परे।।6।।

 

 

                पद ।।18।।

देखो जनकराज आज सिया स्वयंबर रचाय रहे।

जज्ञभूमि में पहुंचे जाकर ऊँचे मचान सुहाय रहे

जनकदुलारि को कौन वरे सारी बात बताय रहे।।1।।

शिवधनुष देखो वो सुन्दर जो इनको उठाय रहे

धनुष उठाकर चाप चढावे ता संग सिय परनाय रहे।।2।।

दूर दूर से आये भूपति वीर बड़े बलवान रहे

धनुष चलावत रोज रोज हम ऐसे बचन बखान रहे।।3।।

पल में तोड़े शिव धनुष को ऐसे बचन सुनाय रहे

उठे भूपति एक एक कर पर न धनुष हिलाय रहे।।4।।

मन शरमाकर वापिश आवे नीची नाड झुकाय रहे

धनुवा छोटा उठ नहीं पावे जोर सभी अजमाय रहे।।5।।

सब राजन को बल जद थाक्यों जनक राज घबराय रहे

कह श्रवण लख यह शोभा सभी देव मुस्काय रहे।।6।।

 

 

                पद ।।19।।

शिवधनुष न उठत देख जनक विचार करे रे करे।।

एक धनुष मम सुता उठावत रोज इधर से उधर धरे

वोहि धनुष सकल जग भूपत अंगुल एक न हटात परे।।1।।

वीर बड़े महावीर सकल सब जग के आये अरे

पर न धनुआ उठो किसी से कैसे सिया जाय वरे।।2।।

मन सोच यही राजा पुनि बोलत मुख से अब यो उचरे

वीर विहीन भई ये वसुधा सुनत सकल शरमात परे।।3।।

सुनत बचन लखन पुनि बोले गुरु आज्ञा मिल जात अरे

माहि उठाऊ कंदुक सम धनुष की किम बात करे।।4।।

वीर विहीन हुई न वसुधा रघुकुल नंदन कहत परे

यह हुंकार सुनी सब नृप सुनकर सारे मन में डरे।।5।।

गुरु समझात क्रोध न कीजे आज्ञा रघुवर देत परे

श्रवण लख वीर वचन को सब जन जय जयकार करे।।6।।

 

 

                पद ।।20।।

देखो रघुवर कँवर आज शिवधनुष उठात परे।

राजा जनक की बात सुनी तब गुरुवर आदेश करे

उठो राम अब चाप चढ़ाओ कहत गुरु सन्देश अरे।।1।।

ज्यो मृगन बिच सिंह चले त्यों रघुवर चाल परे

गुरु सहित सभी मुनिजन को रघुवर अब प्रणाम करे।।2।।

जज्ञधनुष को शीश नवाकर धनुष के निज हाथ धरे

एक हाथ से धनुष उठायो दूजे चाप चढ़ात परे।।3।।

चाप चढ़ावत धनुवा टूटत सब जन जय जयकार करे

जनकदुलारि भई सुखियारी भूपत सारे देख डरे।।4।।

सखी सहित सीता तह आई गले राम वरमाल परे

श्रवण लख सुन्दर ये जोड़ी कैसे हमसे जात वरे।।5।।

 

 

                पद ।।21।।

शिवधनुष के टूटत ही परसराम कोप करे रे

शीश जटा कर परसा लेकर नेत्र लाल ले आय परे

फड़ फड़ होठ फड़कत देखो आवत ही हुंकार करे।1।।

धनु भंजन किया किसने वो विलग सभा से होत परे

नहीं मारूँ भूपत सकल जगत के मुनी मुख से यों उचरे।।2।।

अरे जनक तो ही लाज न आवत शिव धनुष किम टरे

यह धनुष विप्र अस्थि कृत कैसे टुकड़े करत परे।।3।।

मैं मारू उस राजा को जिसने टुकड़े करत परे

छत्री विहीन करी मैं वसुधा तो भी पिनाक टूट परे।।4।।

लखन नमन कर गुरु को बोले क्यों बकबाद मुनि करे

जूनो धनुष छुअत ही टूटे तब हम नाथ न चूक परे।।5।।

सब धनुष सम यह नाही बालक तुझे न सूझ परे

श्रवण लख परशुराम लखन की बाता कैसे सबद आज सरे।।6

 

 

                पद ।।22।।

देखो लछमण कुंवर आज परशुराम से उलझ परे

धनुष सभी एक सरीखा भेद धनुष में न दीख परे

चाप चढ़ावत टूट गयो न गलती हमरी दीख परे।।1।।

वीर आप मुनिजन महि पर मन में यह न भरम धरे

बार बार दिखात कुठारु पर हम यासे नाही डरे।।2।।

छुईमुई की बेल नहीं हम छुअत अंगुली मुरझात परे

कियो काम नहीं कोई खोटो फिर काहे को नाथ डरे।।3।।

रणभूमि नहीं देखी तुमने काटत निज ही मात सिरे

नहीं भिड़े वीर कभी तुम गाल बजावत जग में फिरे।।4।।

हम रजपूत भिड़े भयंकर यम से भी नाही डरे

फिर तुमसे डर काहे का विप्र जात तुम ठहरे।।5।।

लखन राम संवाद देखके राम मधुर मुस्कात अरे

श्रवण कह आज यज्ञभूमि कही रणभूमि न बन जात परे।।6।।

 

 

                पद ।।23।।

देखो रघुवर कँवर आज परशुराम से अरज करे

लखन अगन में घी डारत ज्यूँ मुनि से कटु बचन कहे

अति क्रोध में होकर मुनिवर आँख लाल ज्यूँ अगन दहे।।1।।

जोर जोर हुंकार करे थर थर कांपत गात रहे

बार बार कुठार हिलावत तब उठ रघुवर बचन कहे।।2।।

सुनो मुनि जो धनुवा तोड़े वो तुम्हरो ही दास कहे

नाम अधूर आप ही को तोड़न वालो राम अहे।।3 ।।

राजा जनक को प्रण पूरण को धनुष यह उठात रहे

धनुष उठावत टूट परो नहीं कछु गलती हमरी अहे।।4।।

मीठे बचन राम के सुन मुनिवर शीतल शांत भये

श्रवण लख राम की शोभा सुर नार मुनि सरहात भये।।5।।

 

 

                पद ।।24।।

देखो रघुवर बचन मधुर सुन परसराम हरषात भये

तेज अगन सम परसराम पर शीतल जल बरशात रहे

कर जोरत विनय वचन से परसराम लुभात रहे।।1।।

कर कुठार कंधे पुनि धारत आशीष बचन सुनात रहे

जनकनंदिनी को आशीष दिनी सदा अमर अहिवात रहे।।2।।

जय हो सदा आपकी रघुवर दे आशीष चल जात भये

जगयसभा अब शांत हुई जिम अंधड़ कोई शांत भये।।3।।

जय रघुवर जय जनक नंदिनी सब नार नारी पुकार रहे

हो बधाई जनकराज को सुर नर मुनि उच्चार रहे।।4।।

करी घोषणा जनकराज ने सिया स्वयंबर पूर्ण भये

तोड़ धनुष रामचंद्र ने सकल मनोरथ पूर दिये।।5।।

श्रवण लख खुशिया राजन हिय कैसे वरणत जात परे

सियाराम की सुन्दर जोड़ी कोटि काम लजात परे।।6।।

 

 

                पद ।।25।।

जनकपुरी से ले संदेशो अवधपुरी पहुंचात परे।।

राजा दशरथ हरषत मन में नगर सभी में सुनात अरे

रामचंद्र धनुषभंग कीन्हो सिया स्वयंबर जात अरे।।1।।

अब बिबाह रस्म करने को तुरत सजात बरात अरे

जनकपुरी देखन खातिर लोग सभी उकसात् अरे।।2 ।।

हाथी घोडा रथ पालकी नाना बिध बिमान सजे

ध्वज पताका गाजा बाजा सुन्दर सारे साज सजे।।3।।

बाजत शहनाई बाजे गावत बंदी गान घने

मंगलगीत गली गली में गावत कंठ मधुर सुनात बने।।4।।

राम विवाह की तयारी अवध दुल्हन सी आज सजे

श्रवण सुन्दर बरात की शोभा हम से लिखी न जात अजे।।5।।

                पद ।।26।।

अवधपुरी से बरात बनाकर जनकपुरी को जात रहे।

राजा दशरथ हरखत मन में सुन्दर रूप सजात रहे

भरत शत्रुघन संग में लेकर जनकपुरी पठात रहे।।1।।

कवी बंदीगण सुत अरु चारण नगर निवासी साथ रहे

गावत मंगल गान सकल तँह गायक गणिका जात रहे।।2।।

सुन्दर हर भांत बरात बनी देख देव लजात रहे

जनकपुरी मग जावत देखो गगन सकल गुंजात रहे।।3।।

जनकपुरी में पहुंचे जाकर सभी सुकर जनवास दिए

ध्वजा पताका फर फर फहरे आँगन रंग अबीर लिए।।4।।

राजा जनक संग सभी जन आकर के अगवान किये

मिले परस्पर दोनों समधी श्रवण उमड़त प्रेम हिये।।5।।

 

 

                पद ।।27।।

देखो राजा जनक आज बहुविध तो अगवान करे।

दशरथ मुनि संग बैठे आसन जाय जनक गलबाथ मिले

कंचन झारी हाथ लिए चरण धोय सम्मान किये।।1।।

चंपा तेल फुलेल केवड़ा इत्र सुंगंधित महकात रहे

लौंग इलाची और सुपारी पान सुपान मुखवास अहे।।2।।

सेवक सुन्दर चंवर ढुलावे चारण चरित सुनात रहे

बिरुदावली जस वीरो के मागध भाट बचात रहे।।3।।

वास् सुवास सभी को दीने राग छत्तीसू बाज रहे

जनवासा में अति उल्लासा मंगल सारे काज रहे।।4।।

अवध निवासी सब सुभराशि हरषित मन उल्लास रहे

श्रवण लख जनवास मनोहर अमरावती शरमात रहे।।5।।

 

 

                पद ।।28।।

जनकपुरी में आज रामजी दूल्हा रूप धरे रे धरे

माथे बांधे तुरी कलंगी सुंदर शेहरो घणो फबे

जामो केसरियो मलमल वालो पहनयो सुन्दर आज अबे।।1।।

गले हर मोतियन को दमके कंठलो में चमकार करे

हीरक मूठ की असि धार कर कमरबंध कटार अरे।।2।।

ऊँचे भाल तिलक अति सोवत नेना सूरमो घाल सरे

काना कुण्डल हाथ कड़ो मणि मंडित झलकात अरे।।3।।

मणि मंडित पहनी मोचडी चरड मरड चूंचाट करे

दूल्हा रूप सज्यो अति सुन्दर देखत मन सुहात अरे।।4।।

श्रवण लख छवि मनोहर कैसे बरणो जात अरे

राम बने दूल्हा अति सुन्दर जनक लली के काज सरे।।5।।

 

 

                पद ।।29।।

देखो जनकदुलारि आज दुल्हन रूप सजी।

चीर अनारी पहनी सारी जाणक खिली हो कलि

सब अंग भूषण पहर आभूषण बैठी बीच अली।।1।।

कानन कुण्डल नाक नथ पहने चमकत हीर कनी

माथे मुकुट सुहावत नीको सुन्दर रूप धनी।।2

गले बीच हार करे चमकार लटके मोती सजी

पहन बाजूबंद पूणछ हाथ में सुन्दर रूप सजी।।3।।

कनक करघनी धारी कटि में बाजत नुपुर घनी

पग पैजनी पहर सियाजी सोहत आज बनी।।4।।

हाथा मेहंदी पग में महावर दुल्हन आज बनी

श्रवण लख मात सिया को बण्यो भाग धनी।।5।।

 

 

                पद ।।30।।

देखो जी रघुवर तोरण द्वार खड़े

सावकरण असवार आज हो दूल्हा रूप सजे

सिर पर सेहरा हाथ असि ले सुन्दर रूप सजे।।1।।

तोरण द्वार सज्यो अति सुन्दर फूल अनेक सजे

असि कर वार तोरण हरि मारयो मंगल ध्वनि बजे।।2।।

मात उतारत आरत सुन्दर कंचन थाल सजे

कर निछवार कनक मोहर की शोभा बहुत सजे।।3।।

बहुत बिनोद करे सुआसिनि रीत अनेक करे

मायापति माया के बस हो सारे काज करे।।4।।

दर्पण दिखावे कोई सखी कोई घुंघुरू बजात अरे

नाक खिंच लेवे कोई सखिया परछन करे।।5।।

श्रवण लख मन सकुचावत कैसे छवि उतरे

परछन होत आज राम को जो जग परख करे।।6।।

 

 

                पद ।।31।।

देखो जी मिथिला कंवरी चंवरी चढ़ी।

तीन लोक रा नाथ रघुवर करत बिबाह धनी

राजा राम बने दूल्हा सिया जी बनी रे बनी।।1।।

विप्र बहुत विध बेद उच्चारे गुंजत मधुर ध्वनि

मंडप बीच बैठे सब सुन्दर होम करत अग्नि।।2।।

सभी सुआसन संग बड़भागन गावत गीत सखी

कर में कर लेकर रघुवर सिय को ले हरखी।।3।।

लगन मंडप में परे भँवारे सुर नर सब मन हरखी

ब्रह्म आज माया बस देखो बंध्यो है कैसे सखी।।4।।

पुष्प बरसत गगन मंडल से शोभा अति सखरी

श्रवण मगन हुयो अब तो जोड़ी यह लख री।।5।।

 

 

                पद ।।32।।

देखो जनकपुर जाय परण रहे चारो भाई।

राम सिया की पड़ी भँवारे आनंद बजी बधाई

सीर ध्वज की तीन सुता की हुवी आज सगाई।।1।।

भरत मांडवी संग बिहाय सुन्दर जोड़ी सुहाई

लक्ष्मण संग ब्याही उर्मिला शोभा बरनी न जाई।।2।।

श्रुतकीर्ति संग रिपुघन शादी आज रचाई

राजा दशरथ भाग सरावे हिय अति आनंद छाई।।3।।

जनकपुरी के भाग भले जो आये रघुराई

चारो कन्या जनकपुरी की परणी चारो भाई।।4।।

चारो दिशा भयो उजारो सारो तिमिर नशाइ

श्रवण कह रघुकुल के दीपक आज करी रोशनाई।।5।।

 

 

                पद ।।33।।

देखो अवधपुर नगर आज बंटत रही है बधाई।।

जनकपुरी से चले जनेती अवधपुर पहुंचे आई

राजा दशरथ संग गुरु जी हरषत है मन माहि।।1।।

दूल्हा संग में चारो दुल्हन अवधपुरी है आई

नगर निवासी निरखत नैना आनंद अति दर्शाइ।।2।।

पुलकत मन में फिरे निवासी बांटत घणी बधाई

मात कौशल्या करत आरती सुबरन थाल सजाई।।3।।

बड़े भाग राजा के कहिये चार वधू घर आई

आनंद असीम अवधपुर आयो श्रवण बरनी न जाई।।4।।

 

 

                पद ।।34।।

देखो मिथिला कुंवरी आज महल अवधपुर पांव धरे।

मंगल आँगन चौक पुरायो रंग गुलाल सुहात अरे

चारो दुल्हन संग कँवर के देहरी भीतर पांव धरे।।1।।

पुनि परछन कंवरी के कीने सभी मात उल्लास भरे

पूजत गौरी गणेश आज पावत है आशीष अरे।।2।।

पितर देव अनेक नमन कर कुल रीत सहित प्रणाम करे

चारो भाई अति सुखदाई सब जन को नमन करे।।3।।

आज अवधपुर आनंद छायो वर्णन कैसे जात परे

श्रवण लख आनंद अनंत बार बार तब नमन करे।।4।।

 

 

                पद ।।35।।

आज नरेश अवधपुर देखो मन विचार करे रे करे।

गुरु कृपा भई मेरे ऊपर सुत चार हम प्राप्त करे

चारो ही सुत है चोखे ऐसी किरपा हमपे करे।।1।।

सकल पढाई गुरु कराई कोई कमी न राख धरे

चारो सुत ब्याहे नीके सुन्दर सारे काज सरे।।2।।

अब आयो मेरो बुढापो वन जावण को टेम अरे

राज राम को अब मैं देउँ मन में राज बिचार करे।।3।।

राम घणो गुणवान धीर है कारज सारे पल में करे

राज अयोध्या देवूं उनको मन में बड़ो बिचार करे।।4।।

गुरु वशिष्ठ को बेग बुलाऊँ आज्ञा उनकी लेत परे

कहे श्रवण राज अवधपुर राम हाथ कब लेत धरे।।5।।

                पद ।।36।।

राजतिलक रघुवर करने को गुरुवर पतड़ो देख परे

गुरु आया दशरथ बुलवाया सारी बाता अरज करे

मैं छोड़ू राजपाट अब गुरु तब यूँ आदेश करे।।1।।

राम नाम अति सुन्दर गुण अथाह जामे भरे

राजतिलक करो उनको गुरु मुख सूं यूँ उच्चरे।।2।।

गुरुवर पतड़ो लेकर जोयो शुभ मुहरत देख परे

राज तिलक की करो तैयारी कहकर गुरु जात परे।।3।।

नगर निवासी मन उल्लासी सुन यह बचन आनंद भरे

मंगल गावत मन हर्षावत नगर अवधपुर में बिचरे।।4।।

राजा राम जानकी रानी अवधपुरी निज भाग सरे

कह श्रवण राजतिलक को सुन्दर वर्णन दिख परे।।5।।

 

 

                पद ।।37।।

राजतिलक की बात सुनी जद नगर निवासी मुदित भये।

बड़े भाग है अवधपुरी के राम जहां पर प्रगट भये

अब राजा बन जाय राम तो आनंद उर न समात भये।।1।।

नगर निवासी भये उल्लासी नगर सकल सजात भये

अवधपुर नारी हरषित भारी मंगल गीत सुनात भये।।2।।

राजमहल आँगन में रंग बधावा गात भये

उत सुर सब पड़े सोच में कैसे काम सरात भये।।3। ।

सुर सारे गए सुरसती सन्मुख बचन यह सुनात भये

आप सुरसती उपाय करो  काज हमारे सरजात भये।।4।।

सुरसती तब हाँ भर लीनी जाय मंथरा जीभ थये

श्रवण सुन हरी की लीला कोई से समझी न जात अये।।5।।

 

 

                पद ।।38।।

देखो सुरसत आज अवधपुर जाय मन्थरा जीभ चढ़े।

राजा दशरथ हरखत मन में पुरी सकल हरखात अरे

तीनो मात पुनि मन हरखी केकई भी हरखात परे।।1।।

मति फिरि तब मंथरा जाय कैकेई के कान भरे

तव सुत को ननिहाल पठायो चुपके चुपके तिलक करे।।2।।

राम अगर राजा बन जासी हवाल हमरो होत बुरे

कौशल्या को लाल राज में कौन तुम्हे पुछात अरे।।3।।

दो बचन दीन्हे राजा तुमको देवासुर संग्राम अरे

अब मांगो तुम रानी ऐसे रही समझात अरे।।4।।

तू मतिहीन हमको सिखावत कहकर मारत लात अरे

श्रवण कह कैकेई को पुनि मंथरा रही भरमात  अरे।।5।।

 

 

                पद ।।39।।

देखो कैकई कोप  करत अरु कोप भवन में जात परे।।

दासी मंथरा आखिर बोली बात कही मैं सही अरे

जो तुम न मानो  महारानी तो हमरो का बिगरे ।।1।।

मैं तो आखिर चेरी रहनी मुकुट धार कोउ राज करे

बात करी रानी तव हित की जैसी मुझको सूझ परे।।2।।

आखिर कैकई मान गई अब कोप भवन में जा विचरे

काले कपडे पहन कैकई रूप अनूप बनात् अरे।।3।।

राजा दशरथ सुनत खबर यह तुरत महल में जात परे

त्रिया चरित कैकई कीनो कैसे यह समझात परे।।4।।

कह श्रवण लख दशरथ चिंतन हमसे न बरने जात अरे

ख़ुसी आज चिंता में बदली दशरथ मन घबरात परे।।5।।

 

 

                पद ।।40।।

देखो अवधपुर नृपति आज कैकेई हाथ ठगात परे

राजा दशरथ जात महल उत कोप भवन को गमन करे

किम रूठी हो राज महिषी मधुर वचन तब बोल परे।।1।।

राम को तिलक करूँ मैं रानी शुभ मुहूर्त आन परे

राजा बनसी राम जबे आनंद असीम न समात परे।।2।।

बोली कैकेई तुम सतवादी बचन आप तो भूल परे

देवासुर संग्राम समय दो बचन नाथ तुम देत परे।।3।।

मांगो मांगो रानी तुम जो मांगो सो हम देत परे

दो बचन पूरे हम करिहै बोलो तो तुम मुख से अरे।।4।।

मांगत वचन सुनत कैकेई कोप भवन से उठत परे

श्रवण कह यह बचन आज तो नृप के छन में प्राण हरे।।5।।

 

 

                पद ।।41।।

कैकेई मांगत बचन दोय तब सुनत नाथ थर्रात रहे।

प्रथम बचन सुनो नृप मेरो राज भरत संभलात रहे

मम सुत भरत अवधपत होवे तो मम उर कुशलात रहे।।1।।

दूसर बचन अब मैं मांगू जो आज्ञा तव नाथ रहे

चौदह बरस राम वन जावे मांगत मन मुस्कात रहे।।2।।

दशरथ सुनत बचन दोय बोलत जोड़त हाथ रहे

प्रथम बचन अवस मैं देउँ दूजो बचन आघात रहे।।3।।

सुनो कैकेई राम मम प्यारो प्राण समान लगात रहे

कैसे उनको वन में भेजूं विनती यही करात रहे।।4।।

बार बार राजन करे बिनती पत्थर उर न पिघलात रहे

कह श्रवण निठुर भई रानी राजा हृदयाघात सहे।।5।।

 

 

                पद ।।42।।

देखो दशरथ राज आज सुनत बचन निढाल भये।

राम प्राण समान हमारे राजन ऐसे बैन कहे

बिछुरत हमसे राम अगर जीवत फिर हम न रहे।।1।।

और कोई वर मांगो रानी सब कुछ है स्वीकार अहे

पर बन जाये राम अवध से कैसे हमसे जात कहे।।2।।

बार बार कर जोरे राजन कैकेई मन मुस्कात रहे

दिन हीन दशरथ को देखो त्रिया वश अकुलात रहे।।3।।

कैकेई बोली बचन लोप कर राजन राखो राम हिये

दोनों बचन करो नही पूर्ण जो राजन तुमने दिए।।4।।

हा राम हा राम कहे राम राम पुनि उच्चार किये

घायल मृग सो आज नरपति श्रवण नाही लिखात जिये

 

 

                पद ।।43।।

देखो रघुवर कँवर आज हाथ जोड़ यूँ अरज करे

राजा दशरथ राम उचारत सुनत राम तहँ आत परे

कहो पिता आदेश हमें जो उचित हम करात परे।।1।।

मुख बचन न आवत राजन के होठ नहीं हिलात अरे

प्राण समान राम को कैसे वन को पठात परे।।2।।

कहो पिताश्री आदेश हमें हाथ जोड़ यूँ अरज करे

तब कैकेई खुद उठ बोली सुनो राम आदेश अरे।।3।।

दो बचन राजन हमें दीन्हे उनको आज सुनात अरे

भरत को राज अवध को दीन्हों बात यह सुनात परे।।4।।

चौदह बरस बन तुम जावो दूजो बचन यह वरे

मात बचन तव हम माने राम जोर कर शीश धरे।।5।।

 

 

                पद ।।44।।

देखो रघुवर कँवर आज तज अवध चले

कैकेई मुख से बचन सुने पुनि पुनि नमन करे

है पितु आज्ञा शिरोधार्य पालू बचन सगरे।।1।।

बचन पिता के भंग करूँ तो लोपे मरजाद अरे

बन जाऊँ छण न गमाउं ऐसे बचन उचरे।।2।।

चले राम कौशल्या दर पे मांगत रजा तब रे

कहे मात धन्य हुई मैं सुत तुम जानत रे।।3।।

राम गमन सुन लखन भ्रात भी संग वन जावत रे

तीन लोक की जननी जानकी संग पठावत रे।।4।।

राम लखन संग जानकी वन प्रस्थान करे

राजन तब सुमित्र बुलावत उनसे बचन करे।।5।।

 

 

                पद ।।45।।

राजा दशरथ कहत सुमित सो सुनो बचन तुम ध्यान धरे

राम लखन सीता हठ कीने तीनो वन जात परे

तुम ले जाओ रथ में उनको वन दिखात ले आत अरे।।1।।

चौदह बरस की बात कही तुम उनको समझात अरे

चौदह घडी बन में राखत वापिस तुम ले आत घरे।।2।।

सुनो सुमित तुम समझदार हो राम बिना नह काज सरे

राम बिना नही रह पॉउं एक घडी भी आज अरे।।3।।

रथ बैठावत राम लखन सिय सुमित वन प्रस्थान करे

नगर निवासी पीछे पीछे चलत आज अमान अरे।।4।।

जहँ नह राम वहँ नह रहनो नगर निवासी बात करे

श्रवण लख वियोग राम को नैनन व्हे बरसात अरे।।5।।

                पद ।।46।।

तज राज अवधपुर राम अजे अब जावत वन नाथ अरे

संग सिय अनुज लखन को लेकर छोड़ अवध प्रस्थान करे

पीछे पीछे चला नगर सब कहत विधि न विधान टरे।।1।।

होवत राम अवध के राजा आनंद उर नर नार भरे

राज छोड़ नगरी पुनि छोड़ी कैसी कैकई मात करे।।2।।

मति फिरि आज मंथरा कीन्हो कैसो घात अरे

राज भले भरत हित मांगत पर वन काहे पठात अरे।।3।।

फूटे भाग अवध के देखो कैसी घडी यह आन परे

चौदह बरस बन बन डोलत हमरे राजा राम अरे।।4।।

राम संग नगर सब जावत प्रेम अपार न पार परे

श्रवण लख प्रेम नगर को नैनं अश्रु धार झरे।।5।।

 

 

                पद ।।47।।

देखो रघुवर कँवर आज नगर निवासी छोड़ चले

रात समै सोये सब सारे सुबह राम न दीख परे

नहीं तहँ राम लखन अरु सीता नगर निवासी सोच करे।।1।।

देखो फूटे भाग हमारे राम हमें ही छोड़ चले

अब जो होनी सो ही होसी कहकर वापस लोग चले।।2।।

रथ ले सुमंत पहुंचे वन भीतर तब रघुवर से अरज करे

सुनो राम नरपत हम केहे अब अवधपुर जाये घरे।।3।।

कहत राम सुमित तुम जाओ हम तो वन में गमन करे

पितु आज्ञा माने हम सारी हाथ जोड़ पुनि नमन करे।।4।।

उतरे राम लखन रथ से सिय सहित यह वचन करे

चौदह बरस बीते हम आहे कहकर वन को गमन करे।।5।।

 

 

                पद ।।48।।

देखो रघुवर कँवर आज तो वल्कल वेश धरे।

राजपुत्र मखमल पर पोढत अब धरती सोत अरे

अम्बर ओढ़त धरती बिछावत कैसी विपत परे।।1।।

जटा मुकुट अब अति सोहे पांव खड़ाऊ धरे

वल्कल वेश राम जब पहने नौ निधि धूर परे।।2।।

चौदह भुवन के नाथ आज देखो वन विचरे

हे विधना तू ही उनको चौदह बरस बनवास करे।।3।।

ऊपर तपता सूरज देखो बहे पसीना अरे

चंवर ढुलत जाके सिर ऊपर अब पवन पंखा ढुरे।।5।।

संग सिय सी सुन्दर भामा कंटक पांव भरे

श्रवण लख दुःख आज राम को उर भर जात अरे।।6।।

 

 

                पद ।।49।।

देखो रघुवर कँवर आज तो वल्कल वेश धरे।

राजपुत्र मखमल पर पोढत अब धरती सोत अरे

अम्बर ओढ़त धरती बिछावत कैसी विपत परे।।1।।

जटा मुकुट अब अति सोहे पांव खड़ाऊ धरे

वल्कल वेश राम जब पहने नौ निधि धूर परे।।2।।

चौदह भुवन के नाथ आज देखो वन विचरे

हे विधना तू ही उनको चौदह बरस बनवास करे।।3।।

ऊपर तपता सूरज देखो बहे पसीना अरे

चंवर ढुलत जाके सिर ऊपर अब पवन पंखा ढुरे।।4।।

संग सिय सी सुन्दर भामा कंटक पांव भरे

श्रवण लख दुःख आज राम को उर भर जात अरे।।5।।

 

 

                पद ।।50।।

देखो रघुवर कँवर आज सुरसरी तीर खड़े रे खड़े

चलत राम गंगा तट आये बहती अति तेज अरे

जाना प्रभु  को पार उधर कैसे अब पार करे।।1।।

यह गंगा भगीरथ लाये कहत राम समझात अरे

सकल पुत्र सागर के तारे पतित उद्धार करे।।2।।

विष्णु कमल से यह प्रगटी शिव याहि शीश धरे

शिव जटा से निकली सुरसरी जन कल्याण करे।।3।।

निर्मल जल बहता कलकल सुन सुर आनंद उभरे

जो भवसागर पार उतारत वो ही ईश्वर आज तीर खड़े।।4।।

मायापति की माया देखो कैसे खेल करे

सुरसरी पार उतारन खातिर खुद इन्तजार करे।।5।।

 

 

                पद ।।51।।

सुरसरी तीर खड़े आज रघुवर केवट आज मनाय रहे

सुरसरी तट पर लेके नौका केवट एक दिखात परे

बोले राम सुनो रे खिवैया नदिया पार करात अरे।।1।।

केवट बोले कौन आप है कौन नगर से आत रहे

कौन नगर को है अब जानो पूरी बात बतात रहे।।2।।

रघुवर कँवर अवधपुर नगरी राजा दशरथ तात रहे

पितु बचन से वल्कल धारा वन में आज पठात रहे।।3।।

संग अनुज मम अरु सीता सुन्दर नार रहे

तिंहु चाहत पार उतरनो ऐसे बचन सुनात रहे।।4।।

नाम राम मम सुन ओ केवट सारी बात बतात रहे

पार उतारो अब हमको रघुवर बचन सुनात रहे।।5।।

पार उतारत सकल जगत को वो ही आज पुकार रहे

श्रवण कहत समै बलवंतो करत  आज मजाक रहे।।6।।

 

 

                पद ।।52।।

देखो केवट आज नाथ को नाव बिठात नटे रे नटे।

कैवे केवट सुनो कुंवर तुम नीर नही है उत गहरे

घाट से थोरिक दूर नाथ कटिजल ही रह्यो ठहरे।।1।।

उतरो पार बड़े आराम नाव न नाथ लेवो हमरे

हमने सुनो है नाथ आपके चरनन है कुछ जादू भरे।।2।।

छुअत शिला भई है नारी ऐसे तुमरे चरण अरे

नाव मेरी बन जावे नारी तो कैसे हम काज करे।।3।।

नाव चलाकर टाबर पालूं और नही रुजगार अरे

नाव मेरी नारी बन जावे नित नारी मुझसे झगरे।।4।।

पत्थर ही नारी बन जावे काठ बिचारो काई करे

नाही बिठावुं नाथ नाव में मम अपराध नाथ हरे।।5।।

 

 

                पद ।।53।।

देखो केवट चतुर आज निज मुगती हित जतन करे।

बार बार मैं बिनवू प्रभु जी कैसे पार न उतार परे

मैं अपनों करतो गुजरो काहे आफत बीच परे।।1।।

कहे राम सुन रे केवट नह कोई जादू है हमरे

तू ही नाव चला मेरे बीरा हम सुरसरि पार करे।।2।।

बोला केवट सुनो रघुनन्दन एक उपाय सुझाय परे

जादू तेरी पग धूरि में ताको हम चह दूर करे।।3।।

पहले जल से चरण धुपाउं पाछे तरणी माहि धरे

पार उतारूँ मैं तुमको बस इतनी सी अरज करे।।4।।

राम हंसे मन के माही चतुर केवट बचन सुन रे

तब बोले ऐसे कर लैहैं जैसी तुम कहत परे।।5।।

 

 

                पद ।।54।।

केवट सेवट लेय कठोतो रघुवर चरण धुपाय रहे।

रघुवर चरण की रज हटावन केवट कर कठौत गहे

भर पानी झट वो लावत रघुवर चरण धुपाय रहे।।1।।

चरण धोय रघुवर को केवट निज परिवार बुलाय रहे

तुम भी ले लो यह चरणामृत ऐसे बचन सुनाय रहे।।2।।

कैसो चतुर केवट देखो जीवत मुगती पाय रहे

खुद तो तरे चरणामृत लेकर सारा कुटम तराय रहे।।3।।

प्रभु राम अति कृपा कीनी केवट भाग सराह रहे

जन्म जन्म के पाप केवट के पल में आप छुड़ाय रहे।।4।।

केवट तेरे भाग्य धन्य जो रघुवर चरण धुपाय रहे

श्रवण लख भगती केवट की धन्य धन्य लिखाय रहे।।5।।

 

 

                पद ।।55।।

देखो रघुवर कँवर सिय संग गंगा पार कराय रहे।

केवट की बात मानकर चरण राम धुपाय रहे

तब केवट ला यो निज नौका तामे ताहि बिठाय रहे।।1।।

राम लखन सिय बैठत नौका केवट नाव खिवाय रहे

धीरे धीरे खेवत नौका अर अपनों भाग सराह रहे।।2।।

खेवन हार जो भवसागर उनकी नौका खिवाय रहे

लीला देखो अजब राम की कैसी आज दिखाय रहे।।3।।

बीच धार में चली जब नौका ऐसे बचन सुनाय रहे

भगीरथ लाये यह गंगा ताको नमन कराय रहे।।4।।

सकल पुत्र सगर के तारे सब इतिहास बताय रहे

आज उसी गंगा को देखो रघुवर पार कराय रहे।।5। ।

                पद ।।56।।

देखो केवट आज राम से नाव उतराई न लेत रहे।

केवट खेवत नौका जल में सुरसरि तीर पहुँचाय रहे

सिय समझ राम सेन को निज मुद्रिका उतराय रहे।।1।।

ले मुद्रिका देत केवट को लो भाई समझाय रहे

पार उतारी हमको सुरसरि ताकि मजूरी दिराय रहे।।2।।

तब केवट दोउ कर जोरत ऐसे बचन सुनाय रहे

नाइ से नाइ नह लेवत कबहु सुआर बनाय रहे।।3।।

धोबी से धोबी न लेवे कपडे की तो धुलाई रहे

हम कैसे लेवे तुमसों तुम जाति भाई बताय रहे।।4।।

सुनत राम केवट के मुख से बचन बहुत चकराय रहे

श्रवण लख केवट चतुराई कैसे कलम चलाय रहे।।5।।

 

 

                पद ।।57।।

देखो केवट आज राम से भवसागर तारण मांग रहे।

कहे केवट सुनो राम तुम तारत सबको भवपार अहे

सो तुम भी हो केवट प्रभुजी जात हमार समान रहे।।1।।

तुम भी केवट मैं भी केवट काम एक हमार रहे

तुम भवसागर तारत हो हम गंगा पार करात रहे।।2।।

यह मुद्रिका मैं न लेवुं राखो आप संभाल रहे

देनी चाहो तुम उतराई तो बिनती तुमसे हमार अहे।।3।।

भवसागर से पार करो प्रभु आवत तेरे घाट रहे

सपरिवार पाऊं मैं मुगती हाथ जोड़ यह बात कहे।।4।।

केवट मांगी देखो मुगती भाग बड़े सरहात रहे

श्रवण लख केवट चतुराई धन्य धन्य बोल कहे।।5।।

 

 

                पद ।।58।।

देखो रघुवर गंग पार कर अब वन को प्रस्थान करे।

सुन केवट यूँ कहे राम जब स्नेह हृदय की धार बहे

पार कराई तूने गंगा धन्य धन्य शत बार कहे।।1।।

लखन सिया संग अब रघुवर चलत जंगल माय रहे

सुन्दर वन कूकत जहँ कोयल सुन्दर मन लुभाय रहे।।2।।

शीतल मंद समीर चले मधुरिम राग सुनात रहे

कल कल बहते निर्झर देखो जीवन राग सुनाय रहे।।3।।

ऊपर तपत तेज दिवाकर स्वेदबिंदु दरसाय रहे।

दुर्गम पंथ चलत सिय थककर बृच्छ तले बिठाय रहे।।4।।

कभी न देखी सूर्य किरण जो तपत आज लाय रहे

श्रवण लख विधना की लीला नही कैसे बरनाय रहे।।5।।

 

 

                पद ।।59।।

देखो रघुवर कँवर आज वन माही प्रस्थान किये

राम लखन सिय वन में डोलत राज पाट सब त्याग दिए

वल्कल पहन तीर धनुष ले राज वस्त्र सब त्याग दिए।।1।।

छप्पन भोग छोड़ राम अब कन्द मूल फल खाय लिए

स्वर्ण पलंग पर पोढत जो अब धरती पर शयन किये।।2।।

राजकुंवर अवधपुरी के राजकुंवर अब वन के भये

सुख सागर सूख गयो दुःख दरिया में डूब गए।।3।।

जान न पाये कर्म की रेखा राजा से झट रंक भये

राम आज वन वन भटकत देखत उपजत दुःख हिये।।4 ।।

कौन जाने अंक विधना के जो उसने जो भी मांड दिए

श्रवण निरख राम दशा को कांपत कलम संभाल लिए।।5।।

 

 

                पद ।।60।।

देखो रघुवर कँवर आज तीर्थराज प्रयाग चले

वन चलत संग लखन सिय ये विधना के हाथ छले

महल निवासी भये वनवासी नाही किसी का जोर चले।।1।।

सहे भूख अरु प्यास आज यह जो न भूखे रहत भले

जिनकी इंगित पर सब दौड़त देखो आज उभान चले।।2।।

गंगापार करी तीनो ने फिर कोई नदिया दीख परे

कलकल कलकल बहती देखो

सबद मनोहर सुनत अरे।।3।।

तीर्थराज प्रयाग महा अति तीन धार इक साथ मिले

तीन धार बनी त्रिवेणी पुष्कल पुष्प रहत खिले।।4।।

राम लखन सिय जोड़ हाथ देखो उन्हें प्रणाम करे

संगम तीन धार अरु मानव कैसे श्रवण आज बरे।।5।।

 

 

                पद ।।61।।

तीर्थराज में कँवर राम  अब शिव पूजन करवात रहे।

तट संगम सुन्दर अति पावन सबसे उत्तम धाम कहे

तीन नदी मिलती जहँ पावन त्रिवेणी तहँ नाम रहे।।1।।

शिव शंकर जहां आप बिराजत जो मुक्ति के धाम रहे

उन शिव की देखो अब पूजा सब विध करते राम रहे।।2।।

संग सिया अरु लक्ष्मण पूजत भोले नाथ रहे

शिव शंकर आराध्य हमारे राम यही समझात रहे।3।।

कर पूजा शिव शंकर की चलत राम रघुनाथ रहे

भरद्वाज बसत वही पर जाय नमावत माथ रहे।।4।।

भरद्वाज मुनि आश्रम पे सुनत लोग सब आत रहे

राम लखन सिय के दर्शन कर जन्म आप सरहात रहे।।5।।

 

 

                पद ।।62।।

आज मुनि भरद्वाज आश्रम दर्शन करवत राम रहे।

मुनि आश्रम राम लखन सिय आज पधारत नाथ अहे

बड़े भाग हमारे प्रभु जी ऐसे बचन कहात रहे।।1।।

बैठे आसन भरद्वाज मुनि चारो वेद सुनात रहे

आगम निगम की सारी चर्चा देखो आज कहात रहे।।2।।

ब्रह्मज्ञान अध्यात्म चर्चा मधुर बचन सुहात रहे

पुनि पूछत राम मुनि को वनमार्ग बतलात रहे।।3।।

राम चले तब विदा लेत प्रभु वन सुन्दर प्रभात रहे

चलत नाथ यमुना तट पहुंचत कल कल धुनि सुनात रहे।।4।।

कालिंदी जल बहत मनोहर शीतल अर शांत रहे

पार करी कालिंदी प्रभु ने वनमार्ग  पुनि जात रहे।।5।।

 

 

                पद ।।63।।

राम सिया को देख कहे सब विधना चूक परी रे परी

महल निवासी भये वनवासी दुखित भई सारी नगरी

राम चले वन मार्ग पैदल दुखित भई प्रजा सबरी।।1।।

सहे घाम आज सिय राम धारत रहे कनक छत री

कहाँ व्यंजन कहाँ पाक रसोई भई कैसी यह गत री।।2।।

जो देखत सो करत अचरज कहाँ गयी राजन मत री

राम लखन सिय वन को पठाये भूल करी यह इतरी।।3।।

अवधकुंवर को देखन आवे करे बहुत मन अचरज री

विधना को तो दोष दिरावत सीष लगावत पद रज री।।4।।

कोई अपनों भाग सरावत भये आज यह दर्शन री

श्रवण अब दुखित भयो मन कैसे करवत वर्णन री।।5।।

 

 

                पद ।।64।।

पूछत आज कौन तुम नारी।

मार्ग गांव एक सुन्दर अति सुनत आवहि तह नर नारी

राम लखन दो वीर आत भये भई तहँ भीर अति भारी।।1।।

पूछत सिय ते कहाँ की वधू तुम कौन संग वन में सिधारी

कौन नगर से आई दुल्हिन केहि कारन यही आप पधारी।।2।।

कहत सिय गौर किशोर जो देवर लखन नाम उदारी

श्यामल गात वो नाथ हमारे नैन उठात करे इशारी।।3।।

अवधपुरी नगर हमारो मैं मिथिला की राजकुमारी

पिता दिए हम वनराजु तेहि कारन आये इत सारी।।4।।

कोमल गात किशोरी तुम कैसी विधना कीनी भारी

वन को रहनो दुःख अति सहनो कह रही  गाम की नारी।।5।।

 

 

                पद ।।65।।

देखो रघुवर कँवर देख सब गंवई पछतात चले

ग्राम निवासी भये उदासी कैसे कँवर बन माहि मिले

महल बनाये क्यों फिर विधना जो इनको बनवास मिले।।1।।

छप्पन भोग छत्तिसो व्यंजन फिर काहे हेतु भले

कंद मूल फल जो ये खावत तो धिक्कार अरे सगरे।2।।

गज वाजी रथ अर वाहन जितने है जग माहि भले

सब बेकार बनाये बिधना जो कुंवर  पद आप चले।।3।।

मन पछतावत गाँव निवासी विधना कबहुँ न करत भले

जाके सर छत्र सुहावत वो नंगे सर आज भले।।4।।

सागर जल खारो अति कीनो जामे मुक्ता आज फले

रुख बनायो तेने कल्पतरु पूरत जग की आस भले।।5।।

                पद ।।66।।

देखो रघुवर कँवर आज ऋषि बाल्मीक जाय मिले

पैदल चलत सिय अति थाकत बैठी बरगद छाह तले

स्वेद बूँद सोहत है ऐसे जैसे मुक्ता सीप फले।।1।।

शीतल नीर रघुवीर पिलावत तब सीता मुख कमल खिले

चलत जात तीनो वनवासी आय बाल्मीक थान मिले।।2।।

कियो स्वागत ऋषि बाल्मीक आसन दीन्हे अति उजले

कंद मूल फल सेवा किन्ही अरज करत कर जोर भले।।3।।

रामकथा बालमीक सुनावत पितु आज्ञा जो राम मिले

राम बसो सब के घट माहि मेरी भगती आज फले।।4।।

आश्रम देखत राम लखन सिय सुन्दर तरु बाग़ फले

कूकत विहंग अरु मृग शावक दौड़त शीतल मधुर बयार चले।।5।।

 

 

                पद ।।67।।

पूछत रघुवर आज गुरु से कहाँ जाय हम बास करे।

चौदह बरस बनवास बितानो वन बीच में नाथ अरे

आप बताओ गुरुवर हमको जाय जहां हम वास करे।।1।।

बोले गुरुवर रघुनाथ सुनो तुम कहाँ नही जँह वास करे

मुनियो के हिरदे में बसते कवियों की रसना बीच अरे।।2।।

सूरज की किरणों में तुम हो नदियो की बीच धार अरे

फूलो माहि सुंगंध आप हो भ्रमर बीच गुंजार अरे।।3।।

माता की ममता में बसते पिता आप बन पाल करे

नारी की पतिसेवा में तुम बालक की मुस्कान अरे।।4।।

जल थल अम्बर में तुम रहते चंद्र मध्य चमकार करे

तारो की टिमटिम में तुम हो रजनी बीच अंधार अरे।।5।।

कहाँ नही हो आप प्रभुजी  सभी जगह तो वास करे

फिर भी पूछत लीला हित तो चित्रकूट जा वास करे।।6।।

 

 

                पद ।।68।।

देखो रघुवर कँवर आज चित्रकूट जा बास करे।

वाल्मीक रिषि की बात मान प्रभु चित्रकूट को जात अरे

सुन्दर पर्वत लगत मनोहर सरिता पर है घाट अरे।।1।।

हरी भरी हरियाली सुन्दर कूकत परभृत मधुर अरे

लता वितान लगे अति सुन्दर जैसे मंडप  बनात धरे।।2।।

शीतल मंद सुगंध बहत है मन को अति लुभात अरे

रहन सहन अति सुहावन रघुवर पहुंचे जात अरे।।3।।

कोल भील निषाद बसत तँह नाना देव यह देह धरे

दौड़ दौड़ आवत है सारे रघुवर चरण  प्रणाम करे।।4।।

कंद मूल फल भर भर लावत बार बार जुहार करे

अवध राज त्याग भल कीनो वन में देखो राज करे।।5।।

 

 

                पद ।।69।।

चित्रकूट के घाट ठाट से देखो राम बिराज रहे

अवधपुरी पावन अति छोड़ी ऊँचे महल मकान रहे

चित्रकूट में पर्णकुटी में नित रहते भगवान अहे।।1।।

स्वर्ण सिंहासन नही यहां पे बैठत अब पाषाण रहे

कंद मूल फल अब हरी खावत नाही वो पकवान रहे।।2।।

लखन सिया संग बैठ राम कथा कहत पुराण रहे

धर्म निति की चर्चा करते सब इतिहास बखान रहे।।3।।

पूछत सिय बात मर्म की राम उन्हें समझात रहे

सदा धर्म का पालन करना निति मर्याद बतात रहे।।4।।

सुख दुःख दोनों एक बराबर फर्क नही कछु ध्यान रहे

कर्तव्य सदा भाव से ऊँचा यह हमेशा भान रहे।।5।।

 

 

                पद ।।70।।

अवधपुरी आज नृप तो राम वियोग में प्राण तजे

कैकेयी की बात मान राम जी अवधपुरी तत्काल तजे

हा राम अर राम राम कह नाम नरेश बहु बार भजे।।1।।

राम हमारो प्राण बीज साँस ओ साँस में वो ही बसे

राम गए वनवास आज तो काल व्याल बन आज डसे।।2।।

नही प्राण सम राम रहे तब जीवन धिक्कार रहे

प्राण बिना देह है धरती ऐसे नृप पुकार कहे।।3।।

राम जात ही नृप अवध के देखो स्वर्ग पठात रहे

श्राप पिता श्रवण को देखो आज उन्हें अकुलात रहे।।4।।

चारो पुत्र राजा दशरथ के पास एक न आज रहे

राम नाम धर आज जीभ पर सर्गधाम सिधात रहे।।5।।

 

 

                पद ।।71।।

देखो भरत कुमार आज अवधपुरी को गमन करे

भरत शत्रुघ्न दोनों भाई निज ननिहाल में वास् करे

राजा दशरथ सरग सिधारे दूत लेन प्रस्थान करे।।1।।

ताता तुरंग चढ़े तुरत ही पवन वेग से चाल परे

द्रुतगति से चले अवध से जा पहुंचे ननिहाल अरे।।2।।

भरत शत्रुघ्न दोनों भाई अवधपुरी को जात अरे

भये अपशगुन देख हिय कांपत डरपत है मन माँहि अरे।।3।।

अवधपुरी सूंनी सूनी सी केहि कारण बतलात अरे

पवन शूल सी चुभती देखो बाग बगीचे कुम्हलात अरे।4।।

सब दिश को मुर्दिनी छाई हुई ऐसी क्या बात अरे

पनघट अर चौहट भी सूनी मरघट जैसी शांत अरे।।5।।

 

 

                पद ।।72।।

देखो अवधपुर भरत जाय अर माता आगे रुदन करे

सूनो महल अटरिया सूनी सूनो सिंहासन आज अरे

राम लखन दोनों नही दीखत सूनो राज समाज अरे।।1।।

बीच भवन में नाव तेल की देखत देखो राज डरे

ता बिच में अवधराज की देखत लाश विलाप करे।।2।।

पिता मरण वन गमन राम को सुनत भरत रूदन करे

सुन मेरी माता करी अति घाता बनी कुमाता आज अरे।।3।।

कौन मति फेरी माता तेरी भई अँधेरी रात अरे

भानुकुल को भानु अस्त हुयो हाय तात हा तात करे।।4।।

राम लखन सीता वन जावत कैसे जीवत आज अरे।

राम हमारे प्राण पियारे सह नही जात बिछड़ात अरे।।5।।

 

 

                पद ।।73।।

मात कौशल्या आज भरत को देखो गोद बैठाय लई

भरत कैकई पर कोपत मात कुमात तू आज भई

भानुकुल मस्तक के ऊपर कलंक कालिमा मात भई।।1।।

पुनि भरत  चले तुरत तहाँ से मात कौशल्या दुखित थई

देख भरत को मात कौशल्या निज गोद बैठाय लई।।2।।

बोले भरत मात सुनो तुम रात कैकई मात भई

राम शपथ हम नह जानत कैसे सारी बात हुई।।3।।

राम बिना हम का करिहै पुरी अवध अनाथ भई

ऐसे राज को हम का करिहै जहां राम सो भ्रात नही।।4।।

मात कौशल्या धीर बन्धावत विधना गति न टरत रही

श्रवण लख दारुण दुःख को नयनन धार बही ज बही।।5।।

 

 

                पद ।।74।।

देखो रिपुघन देख मन्थरा एसो कोप करे रे करे

इतने में आई मन्थरा भरत शत्रुघ्न पास अरे

भरत राज रखत लाज पर रिपुघन तापे यूँ बिफरे।।1।।

ठहर ठहर ए कुबड़ी यूँ कहकर वो झपट परे

कूबड़ पर मारी मुष्टक  पड़ी धरनी सिर फूट परे।।2

दुष्ट मंथरा सब काज बिगारत कैसी मति सूझ परे

कैकेई की मति अति फेरी आज विघ्न सब टूट परे।।3।।

भरत मनावत सुन रिपुघन कोप में लाज न लोप करे

नारी पर नह हाथ उठावत निति रीती समझात परे।।4।।

मतिमंद मंथरा ही मति फेरी विधना कैसी चूक परे

अनहोनी  होनी बैठी अब कुछ न सुधरात अरे।।5।।

 

 

                पद ।।75।।

 

पिता मरण को सोच तजो तुम गुरु आज समझात रहे

अवधपुरी राजा बिन सुनी सभी शोक में डूब रहे

शोक तजो तुम भरत लाल जी मुनिवर ऐसे बचन कहे।।1।।

सोच तो करणो उन पिता रो जो पुत्री रो माल गहे

सोच तो करणो उन द्विज रो जो न वेद पढ़ात रहे।।2।।

सोच तो करणो उण छत्री रो रण में पीठ दिखात रहे

सोच तो कारणों नारी को जो मर्यादा त्याग रहे।।3।।

सोच तो करणो उण साधू रो जो कोई ढोंग रचाय रहे

सोच तो करणो उण बेटे रो जो पितु आज्ञा टाल रहे।।4।।

सोच तो करणो उण धन रो जो नहीं कोई दान करे

सोच तो करणो उण मानस रो जो बिमुख भगवान रहे।।5।।

सोच न करणो राजा दशरथ को जो निति नियम के साथ रहे

तजो शोक सभी अब यूँ गुरुवर निज वचन कहे।।6।।

                पद ।।76।।

देखो अवधपुर गेह से देह चली

जहाँ जन्मे खेले कूदे जहां सब आस फली

राजा  दशरथ कर्म किये बहु छूटी वो आज गली।।1।।

एक दिन जाणो है सबकुं साँची या बात भली

देह रह गई धरती ऊपर साँस में साँस मिली।।2।।

सुन्दर बहु विमान बनाये बैठत देह कली

गाजे बाजे बाजत सुन्दर सारी नगरी चली।।3।।

पांच तत्व को बण्यो पिंजरों होग्यो कली कली

तत्व जाय तत्व में मिलियो खेल है चला चली।।4।।

राजा दशरथ स्वर्ग सिधाय सुनी हर बाट गली

सब विध गुरूजी कारज कीने राम की कमी खली।।5।।

 

 

                पद ।।77।।

देखो भरत कुमार आज नही अवधपुर राज करे

दशरथ वचन कैकेयी दीन्हों भरत अवधपुर राज करे

राम वचन हित अवध छोड़ वन में भटकत आज फिरे।।1।।

कहे गुरूजी सुनो भरत तुम सिर अपने यह ताज धरे

पिता वचन यही दीराये तुम अवधपुर राज करे।।2।।

राजा बिना अयोध्या सूनी कौन आज फिर राज करे

कहे भरत सुनो गुरुवर राजा हमरे इक राम अरे।।3।।

राजा राम अवधनगरी के मैं हूँ उनको दास अरे

मैं ढुँढन उनको वन जाऊँ  हाथ जोर अरदास करे।।4।।

मेरे तन मन के एक राजा रामचंद्र एकमात्र अरे

राम बिना सब कुछ सूना नही चैन दिन रात परे।।5।।

 

 

                पद ।।78।।

देखो भरत कुमार आज ले ताज राम पहनान् चले

राज अवधपुर भयो है सूनो कैसे राज चलात भले

भरत कहे बस राम ही राजा मैं उनको हूँ दास भले।।1।।

गुरु वशिष्ठ अरु सब माता रथ पालकी बिठात भले

नाना विध विमान सजा संग सेना साथ चले।।2।।

अवधपुरी के नर नारी दर्शन करने राम चले

राज रुखालन रक्षक रह गए बाकि सारे साथ चले।।3।।

सबसे आगे गुरु मात और मध्य सेना साथ चले

भरत शत्रुघ्न सबसे पीछे देखो नंगे पाद चले।।4।।

राम लिवावन नगरी उमड़ी शोभा बरनी न जात भले

आज भारत को प्रेम देख नैनं अश्रु जात ढले।।5।।

 

 

                पद ।।79।।

देखो आज निषादराज भरत राज सूं मिलन चले

अवधनगर सूं आती सेना गज वाजी रथवान चले

गिरद चढ़ी गगन में गहरी जाणक दिन में भानु ढले।।1।।

राम रो सेवक राज निषाद देख मन में बिचार करे

भरत भाई सेना निज लेकर जाय राम सूं जुद्ध करे।।2।।

सगरी नावा दूर हटाई मुख सूं सबने बचन करे

मैं जाऊँ पतों लगावन सैनिक सब तैयार अरे।।3।।

भेंट लेय निषाद भरत हित जाय आप जोहार करे

राजा राम रो सेवक है सुन जाय आप उर लगात परे।।4।।

भरत निषाद की भेंट भई प्रेम बिबस अश्रुधार ढरे

राजा राम के दोनों सेवक भेंटत आज वन माहीं अरे।।5।।

 

 

                पद ।।80।।

देखो भरत राम से मिलने पैदल पैदल आज चले।

निषादराज से कहे भरत कहाँ राम विश्राम किये

दरश करादे हे बड़भागी देखन हेतु उमड़े हिये।।1।।

एक बृच्छ तले धरी साथरी रात शयन जहँ राम करे

देखत ही हिय तब कांपत बिधना कैसी चूक करे।।2।।

देख भरत धरती पर लौटत बार बार परणाम करे

राम सिया का कष्ट देख नयन से जल उमड़ परे।।3।।

चार घडी में सारी सेना तब गंगा को पार करे

राम चले है जिस मार्ग भरत राज उपान चले।।4।।

जिनको राज अवध को दिनों देखो पैदल आज चले

धन्य भरत तुमरी जननी जन्मे तुमसे लाल भले।।5।।

 

 

                पद ।।81।।

देखो रे आज  पडत न पाँव धरे

राम मिलन की अति उमंग भई मन लगे पंख अरे

कब मिलहि मोहि राम पुनि मन माहि सोच करे।।1।।

राज प्रयाग संगम पर पहुंचे करत प्रणाम अरे

भरद्वाज आश्रम तब पहुंचे चरनन नमन करे।।2।।

आशीष लीन्ही भरद्वाज की पुनि तहँ उठत परे

राम बिना पल कल न परत है नैनन नीर झरे।।3।।

जितने पहुंचे निकट राम के प्रीत परवाण चढ़े

मन उड़ जाय मुख बिलोकत पर पग नही चलत पड़े।।4।।

मन चरनन भगवन जा बैठत तन खुद सुध बिसरे

पाह उपानह भरत चले अज श्रवण कैसे बरे।।5।।

 

 

                पद ।।82।।

भरत राजा मत ना सोच करे

भरद्वाज सुनी सब बात कहत बचन समझात परे

तुम नही दोषी न  ही केकैयी दोषी  दोष समै न परे।।1।।

राम लखन सिय वन वन डोलत विधना हाथ परे

राजा दशरथ स्वर्ग सिधारे ताको न दोष अरे।।2।।

सोच करो मत भरत राज तुम तुम हो कंचन खरे

कुमति मति भई कैकई कि विधना चूक परे।।3।।

जा सिर पर छत्र ढुलत भये ता सिर जटा धरे

वल्कल धार हाथ धनुष ले वन वन आज फिरे।।4।।

कहत मुनि सुनो भरत तुम होनी नाही टरे

तुम निर्दोषी राम चरण रत कौ तव होड़ करे।।5।।

 

 

                पद ।।83।।

देखो रघुवर भ्रात आज पद रज  अंग लगात रहे

राम चरण जहँ दिख परत है देखत माथ झुकात रहे

पुनि उठावत चरण धूरि अपने माथ लगात रहे।।1।।

धन्य हुई यह धूरि आज जहँ रघुनाथ सिधात रहे

भाग्य हमारो ही फूटो जो न चरण दिखात रहे।।2।।

जिन चरणों से निकसी सुरसरि गंगा मात कहात रहे

जिन चरणों से तरी अहिल्या वो चरण धूरि सुहात रहे।।3।।

कब देखूं मैं चरण नाथ के नयन दरश अकुलात रहे

चरण धूरि है अति पावन पाकर के इठलात रहे।।4।।

भरत सम नह भाई दूजो जग में और दिखात रहे

धन्य धन्य है भरत प्रेम धन्य रघुवर तात रहे।।5।।

 

 

                पद ।।84।।

देखो रघुवर कँवर आज भरत राज  संग गले मिले

करत दंडवत भरत चलत धरती अम्बर जात हिले

चित्रकूट में जात भरत जहँ प्रेम प्रसून अपार खिले।।1।।

देख भरत की दशा राम दूरहि ते धात पड़े

भरत उठात कर अपने अर ह्रदय अपने लगात खड़े।।2।।

भाई भरत को प्रेम बिलोकत सुर नर मुनि हरसात पड़े

जैसे नदिया सावन बहती अश्रु धार बहाते पड़े।।3।।

भरत करत अति प्रेम प्रभु से कैसे जात बखान पड़े

सुध बुध भूले आज नाथ गले लगात खड़े रे खड़े।।4।।

राम भरत आज मिले जब बरसत अमृत बूँद पड़े

मिलन देख हरषी वसुधा बरसत अश्रु धार पड़े।।5।।

कह श्रवण कछु बैन न निकले राम भरत को देख अरे

भ्रात प्रेम एसो नही देखत कलम न आज लिखात परे।।6।।

               

                             पद ।। 85 ।।

देखो रघुवर कँवर आज मानत न मनुहार अरे

मिले सकल अवधपुर वासी बार बार जुहार करे
गुरु संग मिल सब विनती कीनी राम न उनपे ध्यान धरे।।1।।

कहे सभी मिल सुनो रामजी तुम बिन सूनी नगरी अरे
तुम बिन जाकर नाथ प्रभु जी हम उत अब काहि करे।।2।।

तुम बिन सूनी नगरी अवध की देखत ही हम रात डरे
बाग बगीचे महल मालिये कोई नही है सुहात परे।।3।।

तब मुस्कावत राम कहे बात हमारी सुनो तात अरे
रघुकुल की मरजाद यही कभी टरे। नही बात अरे।।4।।

प्राण भले ही जावे तन से पर कही बात न जात अरे
पिता वचन मैं नही लोपत साँची बात कहात अरे।।5।।


 

                       पद ।। 86 ।।

लख विधवा का वेश मात का कँवर आज अकुलाय रहे

पूछत राम पिता कहाँ गए भरत न बचन सुनात रहे
बोले गुरु सुनो कुंवर तुम दशरथ स्वर्ग सिधात रहे।।1।।

राम आप पितु प्राण पियारे तुम बिन कैसे जियात रहे
वन गमन से लौटे न तुम तब प्राण नाथ तजात रहे।।2।।

राम एक आधार नाथ तुम छोड़ अवध वनवास गहे
साँस साँस में राम बसत राम जात न साँस लहे।।3।।

अब न पिता पुनि दरश होत इस जीवन में नाथ अहे
तात तात हा तात कहाँ तुम राम आज पुकार कहे।।4।।

धीरज आज रज में मिल्यो दृग से देखो नीर बहे
तब गुरु ढाढस राम को दीन्हों मुख से ऐसे बैन कहे।।5।।

                       पद ।। 87 ।।

भरत राम की चरण पादुका धरत शीश हरसात रहे

चित्रकूट पर अरज राम से भरत राज यों करात भये
चलो नाथ अवधपुरी को कर जोरत समझात भये।।1।।

तुम हो राजा सकल जगत के कौन जगह वनबास भये
पितु आज्ञा पाली सब तुमने पूरण सारे काज भये।।2।।

बिनती एक नही सुनत राम तब भरत राज समझात रहे
चरण पादुका राम आपकी दे दो नाथ बतात रहे।।3।।

तब राम भरत उर लाये गले पुनि लगात रहे
भाव भरत को जान आप मन में मोद भरात रहे।।4।।

चरण पादुका देत भरत को संग आशीष दिरात रहे
तुम सम प्रिय नही जगत में ऐसे बचन सुनात रहे।।5।।

                       पद ।। 88 ।।

भरत राम की चरण पादुका राज सिंगासन जाय धरे।

भरत राम की चरण पादुका धरत शीश पुरी आत परे
अवध सिंघासन आज राम की चरण पादुका जात धरे।।1।।

राजा अवध के राम रहत है मैं हूँ उनको दास अरे
नित प्रत करत पद वंदन पूजत नित खडुआत अरे।।2।।

राज परिधान तजे सगरे वेश तपस्वी आप धरे
ले कर माला भरत हाथ में राम नाम को जाप करे।।3।।

खान पान वैभव सब त्यागे बने सन्यासी आज अरे
धन्य धन्य है भरत राज धन्य तुम्हारी मात अरे।।4।।

प्रभु चरणों की भक्ति पाई बड़भागी तुम नाथ अरे
श्रवण कहत भरत भाव की जग में कौन समात करे।।5।।

                      पद ।। 89 ।।

देखो सक्रसुत जनकसुता के चरण चोंच प्रहार करे
फटिक शिला बैठे जानकी संग रघुनाथ सुहात रहे
शीतल मंद सुगंध बहत मन को अति लुभात रहे।।1।।

देख इंद्रसुत जयंत आज काग को रूप बनात रहे
चोंच प्रहार जा करत दुष्ट चरनन सीता मात रहे।।2।।

नैन सेन से कहे जानकी देखो रघुवर नाथ रहे
सरकंडे को चढ़ा धनुष पर अर संधान करात रहे।।।3।।

आगे सक्रसुत पीछे बाण देखो दौड़े जात रहे
तिन लोक में घूम रहे पर कैसे प्राण बचात रहे।।4।।

दौड़त दौड़त थकित भयो तब परत पांव रघुनाथ रहे
दीनदयालु दया करी अर प्राण जयंत बचात रहे।।5।।

                      पद ।। 90 ।।

चित्रकूट से आज कँवर अब दंडक वन को जात रहे

चित्रकूट अर फटिक शिला तज दंडक वन की राह लहे
मुनि अत्रि आश्रम पुनि आये चरनन शीश नमात रहे।।1।।

अत्रि ऋषि आरती तव कीनी तिन लोक तुम नाथ रहे
भले भाग दर्शन हमे दीन्हा ऐसे वचन सुनात रहे।।2।।

अत्रि पत्नी अनुसूया माता सीता को समझात रहे
नारी धर्म अरु पति सेवा को महातम ताहि सुनात रहे।।3।।

पति तुम्हार है परमेश्वर अधम न नारी जात कहे
पति पद सेवन प्रभु पूजा सम एसो ज्ञान सुनात् रहे।।4।।

बड़ भागी नारी तुम सीता वन में संग सिधात रहे
आपत काल में साथ रही तुम नारी धर्म निभात रहे।।5।।

                         पद ।। 91 ।।

पंचवटी के मार्ग रघुवर अस्थि ढेर परे रे परे

चित्रकूट से चलत रहे प्रभु मुनि अगस्त से भेट करे
विराध भयंकर करे अपराध ताको प्रभु उद्धार करे।।1।।

मुनि सुतीक्षण जंगल में तप घनघोर करे रे करे
दर्शन प्रभु देकर उनको आशा उनकी पूर्ण करे।।2।।

ढेर लगे मुनि अस्थिन के वाको देख यूँ प्रण करे
निशाचर हीन करूँ मैं धरती तब तक नाही चैन परे।।3।।

मुनि अगस्त से भेट हुई कँवर मुनि के चरण परे
वेद शास्त्र विप्र मर्यादा रघुवर सम न और करे।।4।।

राम लखन सीता देखो पंचवटी जा ठहरे
पर्णकुटी बनाई वहां पर तीनो प्राणी है ठहरे।।5।।

                             पद ।। 92 ।।

देखो रावण बहन सुरपणा कर सिणगार बन आय रही।।

पंचवटी में राम लखन सिय कुटिया एक बनाय लही
लखन लाल बैठे पहरे पे सिया राम के चरण दबाय रही।।1।।

आवत ही लख राम रूप वो उनको ऐसे रिझाय रही
तुम सम पुरुष न मम सम नारी जग में यह समझाय रही।।2।।

राम कहे सिया मम भामा कैसे संभव बात रही
वो देखो लखन अकेला जाकर वहां बात कही।।3।

लखन कहे मैं दास राम का कैसे संभव बात यही
पुनि आई राम पास वो विनय कर समझात रही।।4।।

राम मना कर रहे पुनि वो लछमण के पास गही
राम सेन से लखन लाल ने नाक कान तब काट लही।।5।।

नाक कटत बनी राक्षसी रूदन जोर मचाय रही
खर दूषण से भ्रात बलि जाकर उनको बात कही।।6।।

                  पद ।। 93 ।।

खर दूषण वीर अपरबल सेन समेत आज चले।

शूर्पणखा की दशा देख क्रोध अगन दोउ भ्रात जले
कौन दुष्ट आया जंगल में रोंदू उसको चरण तले।।1।।

राम देख निशाचर को पल नाही कुछ हिले डुले
आज्ञा लखन लाल को दिनी सीता संग गुफा को चले।।2।।

राम अकेले भिड़े आज सेन सहित सब दैत्य दले
खरदूषण त्रिशरा तीनो ही प्राण छोड़ बैकुंठ चले।।3।।

जय जय कर करे सुर सारे नभ माही बिमान चले
खर दूषण से बीर भयंकर पल माहि आप खले।।4।।

शूर्पणखा के खातिर देखो भ्रात छोड़ जहान चले
दैत्य हीन वसुधा करने को राम छोड़ निवास चले।।5।।

 

                    पद ।। 94 ।।

देख दशानन द्वार आज सूर्पनखा विलाप करे रे करे

सारा जग को राज करे तू चाँद सूरज भी थांसू डरे
उण भाई की बहन आज नाक कान बिन जग में फिरे।।1।।

तीन बार दिन माहि बीरा धरती ने उठाय धरे
शिव शंकर को भगत बली तू तीन लोक दुहाई फिरे।।2।।

दो तपसी सुन्दर इक नारी दंडक बन में आ बिचरे
नाम आपको सुनत ही बीरा नाक कान मम काट धरे।।3।।

खर दूषण अपर बलि भी जुध में वाने मार धरे
आप बिना बीरा मेरे कुण उणसुं अब रार करे।।4।।

धीरज धार बहना मेरी देख भ्रात तव गजब करे
मानुष की औकात नही जो रावण सूं जुध करे।।5।।

                       पद ।। 95 ।।

देखो दशानन आज आप मामा मारीच बुलाय लियो

रूदन करे मत बहिना मेरी रावण मुख से बचन कह्यो
नाक कान काटे जिनंने हाल बेहाल करूँ मैं कह्यो।।1।।

मामा मारीच मायावी भारी उनको आज पठाय लियो
सुन मामा मैं कहूँ सो करियो गुपत बात बताय दियो।।2।।

सुनत बैन रावण के मामा हाथ जोड़ यूँ बचन कह्यो
बिन फर के शर जिन मारयो हाल हमारो न जात कह्यो।।3।।

पुनि सोच बोल्यो मामा मारही राम तो मुगत भयो
गर मरही रावण के कर से अधम लोक में जात रह्यो।।4।।

मामा हाँ करके बोल्यो काज तुम्हार बनात रह्यो
मृग रूप कंचन काया धर पंचवटी में जात रह्यो।।5।।

 

                          पद ।। 96 ।।

मायामृग को रूप बनाकर कंचन काया आप धरे

मायापति माया संग रहते ताको माया कुछ न करे
पर देखो विधना की लीला माया को माया जकरे।।1।।

पंचवटी में मारीच देखो सोन मिरग्लो बण्यो फिरे
उछल कूदतो देखो ओ तो पर्णकुटी पर जा विचरे।।2।।

सिया बोली देख मृग को नाथ सुनो मम बात अरे
स्वर्ण मृग देखो अति सुन्दर लाकर देवो नाथ अरे।।3।।

राम सिया के बचन सुनत ही स्वर्ण मृग के पीछे परे
दौड़ मृग आगे तब जावत पाछे राम तब जात परे।।4।।

लग्यो बाण मारीच के देखो हाय लखन उच्चार करे
राक्षस रूप धार मारीच तो अमरपुरी प्रस्थान करे।।5।।

 

                       पद ।। 97 ।।

देखो दशानन बनकर बिरामण मात जानकी हरण करे।

राम लखन बिन सूनी कुटिया रही जानकी आप अरे
धर बिरामण भेख दशानन भिक्षाम देहि पुकार करे।।1।।

भिक्षा ले माता जब आई लक्षमण रेख न पार करे
रावण कहता बंधी भिक्षा हमसे नही अपनात परे।।2।।

लक्ष्मण रेखा सीता लांघी राक्षस रूप दिखात परे
रथ ऊपर सीता बैठाई गगन राह ले जात परे।।3।।

हा नाथ सीता उच्चारे मग वन सब गुंजार करे
माता जानकी विवश हुई आज दुष्ट जगमात हरे।।4।।

वृद्ध जटायु आ ललकारे दुष्ट के ऊपर वार करे
रावण असि से पंख काट दिया भूमि पर वो आय गिरे।।5।।

                      पद ।। 98 ।।

सूनी कुटिया देख रामजी विलाप महान करे रे करे।

राम लखन पंचवटी में पर्णकुटी पहुंचात अरे
खाली कुटिया कोई न दीखे आवाज अनेक लगात रहे।।1।।

कहाँ गई जनक दुलारी आस पास न आज दिखात रहे
सरवर गिरवर फिर फिर ढूंढत कहाँ सिया अब जात रहे।।2।।

पूछत प्रभु वृक्ष लता से कहाँ गई जगमात अरे
बोलो पिक मैना तुम बोलो सबद न आज सुनात रहे।।3।।

गिरि कंदरा नाळा नदिया सब्ज जगह दिखात रहे
पर न दिखी सीता सुकुमारी नैनन नीर बहात रहे।।4।।

तुम्ही बताओ हे दिकपालो धरती गगन बतात रहे
कहाँ गयी है जनक दुलारी बोलो बृच्छ के पात अरे।।5।।

 

 

                     पद ।। 99 ।।

भूमि ऊपर पड़ा जटायु राम राम उच्चार करे

मग में मिलते विहंग सभी से देखी सीता पूछ परे
आगे जाकर जब देखा इक पड़ा गिद्ध विशाल अरे।।1।।

राम राम वो राम उच्चारे हाय राम हरबार करे
दौड़ राम तब गिद्धराज को गोद लेय दुलार करे।।2।।

कौन दुष्ट आया यहां पर पंख विहीन जो आप करे
बोला जटायु रावण आया मात सिया। को जात हरे।।3।।

दक्षिण दिश को गया दुष्ट लड़ा बहुत पर न जीत परे
काट पंख दुष्ट हमारे दक्षिण दिश को गमन करे।।4।।

लाज यही प्रभु आज मुझे न काज तुम्हारो आज सरे
राम राम रटत गिद्ध तब सुरलोक प्रस्थान करे।5।।

 

                           पद ।। 100 ।।

देखो शबरी आज राम को चख चख बेर खिलाते रही।

गिद्ध उद्धार कबंध उधारयो दोनों री गति न जात कही
शबरी जात भीलनी देखो राह आपकी जोय रही।।1।।

पंथ बुहारे रोज राम हित कब आएंगे नाथ कही
राम लखन दोनों जब देखे मन माहि हरशात रही।।2।।

लाय कठौता चरण धुलाये आसन आप बिछात रही
डलिया बेर आप ले आई चख चख बेर खिलात रही।।3।।

भगती देख भीलनी की प्रभुजी नवधा भगती समझात कही
धन्य भीलनी आज हुई है प्रेम सुधा उमडात रही।।4।।

पम्पा सरोवर आप पधारो नाथ जोर कर हाथ कही
प्रभु किरपा से आज भीलनी राह सुरग की आप लही।।5।।

 

                      पद ।। 101 ।।

धर बरामन को भेख पवनसुत राम लखन सूं बात करे।

कौन देश के राजकुंवर तुम किन कारन भगवा भेष धरे
किसके सुत हो आप तपस्वी किन कारन बन माहि फिरे।।1।।

नगर अयोध्या के राम लखन हम पितु आज्ञा से बन में फिरे
जननी जग की सीता को बन माहि हम खोजत फिरे।।2।।

पंचवटी से जनकनंदिनी न जाने ताहि कौन हरे
ढूंढत उनको बन पहाड़न में दोनों इत को आन परे।।3।।

रूप तज्यो कपि आप तुरत चरण कमल में लौटत अरे
मैं हनुमान सुग्रीव सहायक मम अपराध क्षमा ज् करे।।4।।

पीठ बिठात दोउ राजकुंवर को ऋष्यमूक पर जात परे
नाथ आज सुग्रीव से भेंटे सब सुर मुनि जयकार करे।।5।।

 

                               पद ।। 102 ।।

कह सुग्रीव सुनो कुंवर माँ सीता लंक दिशा को जात रही।

एक दिवस गिरि शिखर पे उड़त जात बिमान रही
इक नारी रूदन करत तब राम राम उच्चार कही।।1।।

नभ् मण्डल से लंक दिशा को एक राक्षश उन नारी को ले जात रही
हमे देख कर वसन आभूषण निज अपने गिरात रही।।2।।

यह देखो कानन के कुण्डल अरु दुपट्टा देख लही
देख राम वसन आभूषण नयन नीर की धार बही।।3।।

सत्य वचन सुग्रीव तुम्हारे जनक दुलारी वो थी सही
कब मिलहि खोज करो तुम कैसे उनको पात रही।।4।।

चार मास चौमासो बीत्या खोज मात को जात रही
काम राम को हम करहि अब बड़ सोभाग्य न जात कहि।।5।।

 

                          पद ।। 103 ।।

देखो रघुवर कँवर आज बाली संहार करे रे करे।।

कथा सुनी सुग्रीव तणी तब धीरज कैसे जात धरे
बाली को अन्याय देख प्रभु नैनन नीर ढरे रे ढरे।।1।।

एक बाण से सात ताड़ को छिण में प्रभु काट धरे
तब सुग्रीव जा ललकारे आ बाली अब जुद्ध करे।।2।।

साठ हजार हाथी बल वालो युद्धभूमि में आ उतरे
एक शक्ल के भ्रात देख के प्रभु कैसे अब सहाय करे।।3।।

तुलसी माला डाली गले में ओट वृच्छ की नाथ धरे
बाण मार बाली को मारयो सुर नर मुनि जयकार करे।।4।।

राज सुग्रीव को दियो रामजी अंगद पद युवराज धरे
देखो कैसी मित्रताइ नाथ निभाई नही जात वरे।।5।।

 

                     पद ।। 104 ।।

देखो लक्ष्मण लाल आज याद सुग्रीव को बात करे।।

राज पाय कपि वादो भूल्यो मात सिया की खोज अरे
तब लक्ष्मण जाय वहां पर कपिराजा तब होश धरे।।1।।

तब सुग्रीव कर जोर कहे गलती हमरी माफ़ करे
चार दिशा में भेजी सेना मां सीता की तलाश करे।।2।।

दक्षिण दिश को गई जो सेना हनुमत उनके साथ अरे
तब हनुमान को राम प्रेम से दी मुद्रिका हाथ अरे।।3।।

अंगद जामवन्त सा जोधा हनुमत संग प्रस्थान करे
लंका दिश को चले वहां से पहुंचे समंदर तीर अरे।।4।।

सौ योजन को बड़ो समन्दर जल थल पर उछाल करे
कौन वीर एसो सेना में जो समन्दर पार करे।।5।।

 

                   पद ।। 105 ।।

समंदर तीरा गिद्ध एक लख पूछत उनसे बात अरे।।

बिना पंख को गिद्ध एक तहँ आँख से अंध न दीख परे
नाम सिया और राम सुने तब मुख से उच्चार करे।।1।।

अवधपुरी को राजा दशरथ मित्र हमारो जान परे
सुनो कपि गिद्ध जटायु ताको मैं हूँ भ्रात अरे।।2।।

पूछी वार्ता दुखी भयो मन दोनों स्वर्ग सिधार परे
सीता को रावण हर लीनी लंका नगरी जात परे।।3।।

अब वृद्ध भयो मैं पंख विहीन नही उडात परे
पल में लातो खबर सिया की सारी मैं कुशलात अरे।।4।।

नमन राम को करत पुनि कपि सब को समझात अरे
सौ योजन मरजाद सिंध की लांघ यही तहँ जात परे।।5।।

 

                        पद ।। 106 ।।

समंदर तीरा बैठ बांदरा सोच विचार करे रे करे।।

सौ योजन को समंदर कहिजे किकर जावत पार परे
कौन कपि एसो बलशाली जो ओ मोटो काम करे।।1।।

अंगद बोल्यो जाय सकूँ पर आवण री नह खबर परे
अब दूजो कुण जाय सके सब मिलने विचार करे।।2।।

आखिर जामवंत यूँ बोल्या हनुमत आज क्यूँ मौन धरे
शाप विवश निज शक्ति भूल्या अब शक्ति को याद करे।।3।।

बोल्या हनुमत मैं जाऊंला आऊँ तब तक धीर धरे
पवन वेग सूं चाल्या पवनसुत धरती डोली थर थरे।।4।।

कपि सभी हुआ अब राजी काज राम को आज सरे
बेगा आवो हनुमत बोल्या सुर मुनि जयकार करे।।5।।

 

                           पद ।। 107 ।।

देखो उड़कर आज पवनसुत समंदर पार करे रे करे।

जामवंत के बचन सुने तब हनुमान हुंकार करे
जा चढ़कर इक गिरि शिखर पर जोर उड़ान भरे रे भरे।।1।।

कांपी धरती गगन डोलिया एसो वेग ले चाल परे
परवत अब मैनाक बोलिया आवो कुछ विश्राम करे।।2।।

हनुमत हाथ परस कर चाल्या अब न पलक भी देर करे
रामकाज बिन सुनो गिरि तुम हम नहीं विश्राम करे।।3।।

अब देवन को भई चिंता सुरसा माँ को विनत करे
लेओ परीक्षा आप कपि की बल बुद्धि की नेक अरे।।4।।

सुरसा बोली ठहर कपि अब हम तुमको मुख में धरे
कहे कपि काज कर आऊँ फिर तुम चाहे जो भी करे।।5।।

 

                  पद ।। 108 ।।

देखो पवनसुत आज अपरबली लंका नगरी जात परे।।

सुरसा बोली जीव भखुं मैं गगन मण्डल से जात परे
आज तुम्हारी बारी समझो अभी तुम्ही को खात अरे।।1।।

बोले पवनसुत मुख खोलो जोजन भर दिखलात अरे
दो जोजन के हनुमत बन गए कैसे बनती बात परे।।2।।

दोनों में लगी होड़ अति तब दूने ये बन जात अरे
सौ योजन सुरसा मुख देखत सूक्ष्म बन घुस जात अरे।।3।।

बाहर निकल आज्ञा कपि मांगी सुरसा अब हरषात अरे
ले आशीष चले पवनसुत सिंहिका एक दिखलात अरे।।4।।

पहुंचे लंका सुबरन नगरी शोभा अति दिखलात परे
कनक कोट बिचित्र नगरी शोभा बरनी न जात परे।।5।।

 

                        पद ।। 109 ।।

देखो हनुमत आज मात को गढ़ लंका में ढूंढ रहे।।

सुरसा आगे मिली राक्षसी छाया पकड़ जो जीव गहे
हनुमत ताको पिछाण पल में मार राक्षसी आगे रहे।।1।।

त्रिकुट पर्बत देखी लंका देख कपि चकराय रहे
गढ़ सुमेर खाई चहुँ और निष् दिन पहरेदार रहे।।2।।

सूक्ष्म रूप धर कपि चाल्यो राक्षसी बोली ठैर अहे
मुठिका मारी पड़ी धरनी पर हाथ जोड़ वा वचन कहे।।3।।

ब्रह्मा वर दीनो रावण ने तब हम से यह बचन कहे
कपि आसी रावण मर जासी बात सत्य अब दीख कहे।।4।।

महल मालिया नगरी जोई सीता मात न दीख रहे
सुन्दर महल बिराजित रावण शोभा बरनी न जात कहे।।5।।

 

                      पद ।। 110 ।।

राम नाम अंकित इक कुटिया देख कपि हरखात भये।।

देखी सारी लंका नगरी निशा बिगत पौ फाट गए
तभी दिखी इक कुटिया बाहर राम नाम लिखे कपाट थये।।1।।

भयो अचम्भो कपि मन में यहाँ भगत प्रभु कैसे भये
रूप विप्र को धार कपि कुटिया समीप अब जात भये।।2।।

राम राम की माला जपते शब्द राम सुन मुदित भये
नाम विभीषण अनुज दशानन हनुमत संग भेंट किए।।3।।

दोनों भगत राम के देखो हरिचर्चा में मगन भये
पता बताया जग जननी का अशोक बाटिका आय गये।।4।।

धन्य धन्य के शब्द कहे काज रामहित धन्य भये
अशोक बाटिका एक तरु पर जाय कपि मन शोकभये।।5।।

 

                    पद ।। 111 ।।

विरह वेदना देख मात की हनुमत सोच करे रे करे।।

सीता माता अशोक वन में रावण पहरा बीच अरे
राक्षसिया पहरा के ऊपर देखत जाको लोग डरे।।1।।

राम नाम की माला रटती नैनन अंसुवन धार ढरे
कृश तन भयो माँ सीता को विरह वेदना बीच जरे।।2।।

रावण संग रानी ले आयो कह सीता से मुझको वरे
सीता ओट तृन की करके केवल रघुवर नाम उच्चरे।।3।।

मास एक को टेम दियो पाछे लेस्यु प्राण हरे
रावण निज महल सिधायो त्रिजटा सपनो कहत परे।।4।।

सपना में लंका जरती शीश दशानन सब उतरे
राज बिभीषन लंका मिलसी सपनो रत्ती भर न टरे।।5।।

 

                       पद ।। 112 ।।

देखो सीता मात गोद में हनुमत मुदरी डार दई।।

अगन मिली नह तारागण से नह तरुवर से आग लइ
त्रिजटा आग न लाकर दिनी तब सीता निराश भई।।1।।

तेहि अवसर कपि राम निशानी सीता गोद मे डार दई
चमकत अग्नि सम देख सियाजी मन ही मन मुस्कात भई।।2।।

उठा हाथ से देखी मात नाम राम लख चकित भई
कैसे आई यहां मुद्रिका सोच मना उदास भई।।3।।

कोई छल दशनन कीन्हो हार न राम की होत भई
कौन गिराई यह मुद्रिका दुविधा मन में बहुत भई।।4।।

राम राम उच्चार किया हनुमत तब प्रणाम कई
मैं लायो मुद्रिका माता राम प्रभु मुझ साथ दई।।5।।

 

                    पद ।। 113 ।।

देखो हनुमत आज सिया को रूप विराट दिखात रहे।।

हनुमत नत भूमि होके कर जोर यूँ बचन कहे
करुनानिधान भगवान राम को दूत आप यूँ बचन कहे।।1।।

कही कुशल सब राम लखन की और सोच सब राम कहे
सुनत दशा रामचंद्र की मात नैन से नीर बहे।।2।।

यह मुद्रिका है सेनानी मास दिवस में आत रहे
आज्ञा नही प्रभु की हमको वरना हम ले जात रहे।।3।।

कपि बलहीन निशाचर भारे कैसे पड़सी पार अहे
कनक भूधराकार रूप धर माता को दिखलात कहे।।4।।

देख रूप हनुमान बली को मुख से ऐसे बचन कहे
अजर अमर होवो मेरे लाला राम प्रभु शरणात गहे।।5।।

 

                       पद ।। 114 ।।

देखो हनुमत आज बाग़ में ऐसी धूम मचाय रहे।।

मात सिया को हुयो भरोसो बीर धीर हनुमान रहे
तब हनुमत यूँ कहे मात को भूख हमे सतात रहे।।1।।

हो आज्ञा तो जाऊँ बाग़ में फल अर फूल लुभात रहे
जाओ तात तुम आज्ञा दिनी तब हनुमत हरषात रहे।।2।।

देख कपि को जम्बू आयो ले लाठी डरपात रहे
एक डाल जम्बू पर फेंकी पड्यो धरनी अकुलात रहे।।3।।

भागे माली राज सभा में सकल सन्देश सुनात रहे
अक्षय कुमार को भेजत राजा बाग पहुँच धमकात रहे।।4।।

पेड़ उखाड़ अक्षय पर फेंकयो पड्यो धरनी तड़फात रहे
प्राण पखेरू अक्षराज के पल माहि उड़ जात रहे।।5।।

 

                       पद ।। 115 ।।

मेघनाद ने आज दशानन बाग बचावन आप धरे।।1।।

अक्षयकुमार को मार दियो कपि सुनत दशानन थरहरे
पुनि संभाल बोल्यो रावण जाओ सुत तुम तुरत अरे।।2।।

इंद्रजीत अतुलित बलशाली चाल्यो झट ले बाण अरे
हनुमान इक बृच्छ उखाडत ताके ऊपर फेंक परे।।3।।

बल अतुलित हनुमान देखके इंद्रजीत अब सोच करे
ब्रह्मास्त्र के बिना कपि यह हमसे न जीतो जात परे।।4।।

ब्रह्मास्त्र संधान कियो तब हनुमत मन बिचार करे
ब्रह्मास्त्र को मान राख कपि बंधन में आज परे।।5।।

 

                         पद ।। 116 ।।

देखो हनुमत सभा बीच में रावण को समझात परे।।

इंद्रजीत बांध कपि लायो आय सभा में अर्ज करे
तात हाथ जिन अक्षय मारयो आप संभालो नाथ अरे।।1।।

रावण बोल्यो रे कपि तू बाग उजारत क्यूँ न डरे
प्राण समान पुत्र अक्षय को बिन कारण क्यों मार धरे।।2।।

कह हनुमत खावत हम फल इसमें नहि कोई जुल्म करे
मोको मारयो वाही मारयो नियम नीति सूं काज करे।।3।।

तू हर लायो छलसूं सीता अशोक वाटिका माय धरे
कृपासिंधु की शरण पकड़ले पल भर भी मत देर करे।।4।।

शरणागत वत्सल प्रभु जी सब अपराध को माफ़ करे
बात कही समझाय सभी बीच सभा में नाही डरे।।5।।

 

                          पद ।। 117 ।।

देखो हनुमत आज नगर ने आग लगाय उजाड़ रहे।।

हनुमत की सुन बात क्रोध कर लंकापति यूँ बोल कहे
वध करदो कपि का अब सिंहासन से डोल कहे।।1।।

भ्रात विभीषण बात नीति की रावण से यूँ बोल कहे
नीति बिरूद्ध काज ये स्वामी सारी बात यूँ तोल कहे।।2।।

तब पूंछ में आग लगाई कपि लीला नह जात कहे
कनक अटारी चढ़ हुंकारी जारत लंका आज अहे।।3।।

एक विभीषण घर छोड्यो बाकी लंका आज दहे
रुदन करे सब नर नारी नैनन से सब नीर बहे।।4।।

नीर समंदर पूंछ बुझाई लंका नगरी धूं धूं दहे
हनुमान जो काज कियो हमसे न वरणी जात अहे।।5।।

 

                           पद ।। 118 ।।

माँ सीता के आगे हनुमत मास दिवस को कौल करे।।

आग लगा लंका में हनुमत पूंछ सिंधु बुझाय अरे
तुरंत अशोक वाटिका आयो कर जोर सिया सूं अरज करे।।1।।

मास दिवस में सेन सहित प्रभु आसी अवस माँ धीर धरे
मार निशाचर राम प्रभु संग आप ले जात परे।।2।।

मात सेनानी देवो आप प्रभु राम के हेत अरे
चूड़ामणि दिनी सेनानी नमन करत कपि लेत परे।।3।।

दे माता आशीष कपि को सुनत कपि हरखात अरे
विदा लेत चाल्यो कपि अम्बर धरती डोल परे।।4।।

जा पहुंच्यो झट समंदर तीरा देख कपि जयकार करे
सीता माँ को पतों लगायो हनुमत लाज बचात अरे।।5।।

 

                    पद ।। 119 ।।

देखो सारा राजी होकर किष्किंधा में धूम करे।।

हनुमत लाया सीता की सुध हर्षित सब कपि झूम परे
प्राण बचाया सबका हनुमत ख़ुशी हो मन में धूम करे।।1।।

किष्किंधा जा रोलो करियो बाग बगीचा में लूम परे
कह सुग्रीव खबर कोई सुभ है तासो कपि सब धूम करे।।2।।

जाय मिल्या राम प्रभु से सुभ सन्देश सुनात परे
हनुमत ल्यायो सीता की सुध राम काज जो तुरंत करे।।3।।

हनुमत लाय चूड़ामणि दीन्ही राम कपि सर हाथ धरे
अजर अमर सीता वर दीन्ह्यो खबर राम को कहत परे।।4।।

बाग उजाड़ लंका को जारा बात सभी कपि कहत परे
हनुमत काज राम को कीन्हो सहस बदन नह जात वरे।।5।।

 

                       पद ।। 120 ।।

देखो दशानन खबर पाय के सेन संवार करे रे करे

राम सेन ले पहुंचे तट पे खबर लंकपति जान परे
हाथ जोड़ पग पकड़ मन्दोदरी लंकपति से अर्ज करे।।1।।

राम आप त्रिलोकनाथ है क्यों स्वामी तुम रार करे
रार छोड़ द्वार प्रभु जावो गलती सारी माफ़ करे।।2।।

सीख मन्दोदरी मानत नाही नारी सुभाव तू डरत परे
तीन लोक में कौन बराबर जो हमसे आ जुद्ध करे।।3।।

सारे सुर कांपे थरथर बंदीगृह मम आन परे
नर बानर का भय नही हमको पलभर में संहार करे।।4।।

राजनीती रानी नही जानत काहे तू मन माही डरे
मैं रावण लंका को राजा सकल जगत में धाक परे।।5।।

 

                   पद ।। 121 ।।

देखो भैया आज विभीषण हाथ जोड़ समझात परे।।

पार समंदर आई सेना लंकपति को खबर परे
माल्यवंत अर सचिव सयाने सब रावण से अरज करे।।1।।

बात एक नही माने रावण कहे सभी तुम व्यर्थ डरे
शूरवीर है पुत्र हमारे भाई वीर अति जोर परे।।2।।

भाई विभीषण आ समझाई हांथ जोर कर विनती करे
पद तल से प्रहार कियो तब भाई पुनि पुनि अरज करे।।3।।

नाथ राम त्रिलोकनाथ है किम कारण तुम बैर करे
वापिस दे दो मात जानकी सब अपराध वो भूल परे।।4।।

जाओ तुम ही उनकी शरणा वो तुमरो उद्धार करे
पर सुनी नही एक बात तब भगत विभीषण छोड़ चले।।5।।

 

                     पद ।। 122 ।।

देखो विभीषण तज नगरी शरण राम की जात रहे।।

भाई को समझाई बात पर बात एक न मान रहे।
तीन लोक आधीन हमारे और न हमरे समान रहे।।1।।

अंतकाल मति भई उलटी सुलटी बात न सुहात रहे
पद प्रहार भ्रात पर कीन्हा शरण राम की भ्रात लहे।।2।।

तजि नगरी सगरी पल में राम राम उच्चार कहे
जाय राम की शरण बिभीषन मणि कांचन सो योग कहे।।3।।

रामादल भयो सशंकित चाल रिपु नही जात कहे
कहे राम शरणागत आये हमसे नही ठकुरात अहे।।4।।

रिपु बन आयो तो भी राखूं मित्र बने सुख और लहे
भगत विभीषण अति बड़भागी शरण राम की आप लहे।।5।।

 

                  पद ।। 123 ।।

देखो रघुवर आज विभीषण राज लंक को देत रहे।।

रामादल में आया विभीषण आवत ही यह बचन कहे
शरणागत हूँ प्रभु आपकी भाग बड़े नह जात कहे।।1।।

उठा राम निज कंठ लगायो पास बिठाय यूँ नाथ कहे
समंदर नीर मंगाय रामजी राज विभीषण देत रहे।।2।।

लंका राज विभीषण दीन्ह्यो कृपा राम की न जात कहे
दीनदयाल दया तुम किन्ही प्रेम विवस अश्रुधार बहे।।3।।

रामादल में जय जैकारा आनंद अति नही जात कहे
रीछ बानरा अति उत्साही जय जय राम उच्चार रहे।।4।।

 


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लेखक परिचय

श्री श्रवण सिंह राजावत
जयपुर जिले की फागी तहसील अंतर्गत डाबिच गांव में 1 जुलाई 1968 को जन्मे कवि श्रवण सिंह राजावत की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम डाबिच में ही हुई।हायर सेकेंडरी शिक्षा चाकसू से करने के बाद जयपुर के कामर्स कालेज से बी काम की डिग्री हासिल की।पंजाब नेशनल बैंक में लिपिक पद पर 7 वर्ष सेवा करने के बाद राजस्थान तहसीलदार सेवा में चयनित हुए।वहां से पदोन्नत होकर राजस्थान प्रशासनिक सेवा में वर्तमान में एस डी एम् चोह्टन पदस्थापित है।प्रख्यात राजस्थानी कवि लक्ष्मण सिंह रसवन्त के दामाद होने से कविता के क्षेत्र में कई राजस्थानी कवियों के संपर्क में आये और लेखन के क्षेत्र में आगे बढे।चालक सतसई,मीरा सतसई राजस्थानी में लिखी है।यशोधरा व् उर्मिला पर हिंदी खंडकाव्य लिखा है।अभी भगवान राम के जीवन पर पद लिख रहे है।

प्रस्‍तुति - महेश कुमार प्रजापत