म्‍हेन्‍द्रा मूमल री वात (भाग 1)

लोकगीत

मूमल

काळी रे काळी काजळियै री रेखडी रे
हांजी रे, काळोडी कांठळ मे चिमकै बीजळी
म्हारी बरसाळै मूमल, हालै नी ए आलीजै रै देस

न्हायो मूमल माथोलियो रे मेट सूं
हांजी रे, कडिया तो राळ्या मूमल केसडा
म्हारी जगमीठी मूमल, हालीजै रै देस

सीसडळो मूमल रो सरूप नारेळ ज्यूं
हांजी रे, केसडला माडेची रा बासग नाग ज्यूं
म्हारी हरियाळी ए मूमल, हालै नी ए अमराणै रे देस

होटडला मूमल रा रेसमियै रै तार ज्यूं
हांजी रै, दांतडला ऊजळदंती रा दाडम बीज ज्यूं
म्हारी हरियाळी ए मूमल, हालै नी ए अमराणै रै देस

पेटडलो मूमल री पींपळियै रै पान ज्यूं
हांजी रे, हिवडलो मूमल रो सांचै ढाळियो
म्हारी नाजुकडी मूमल, हालै नी ए रसीलै रै देस

जांघडली मूमल री देवलियै री थांभ ज्यूं
हांजी रे, साथडली सपीठी पींडी पातळी
म्हारी माडेची मूमल, हालै नी ए आलीजै रै देस

जायी रे मूमल इए लोद्रवाणै रै देस में
हांजी रे, माणी रे मूमल नै राणै महेंदरै
म्हारी जेसाणै री मूमल, हालै नी ए अमराणै रे देस

 

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लेखक परिचय

रानी लक्ष्‍मी कुमारी चूंडावत
उनका जन्म २४ जून १९१६ को मेवाड़ में हुआ। वे राजस्थान में मेवाड़ राजघराने की एक बड़ी रियासत देवगढ़ के रावत विजयसिंह की पुत्री थीं। उनका विवाह १९३४ में रावतसर के रावत तेज सिंह से हुआ। २४ मई २०१४ को उनका निधन हो गया। उन्होंने राजस्थानी भाषा की मान्यता दिलाने के भरसक प्रयास किये। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्या थीं और उन्होने देवगढ़ विधान सभा का १९६२ से १९७१ तक प्रतिनिधित्व किया। वे १९७२ से १९७८ तक राज्यसभा की सदस्या रहीं। वे राजस्थान प्रदेश कांग्रेस समिति की अध्यक्ष भी रहीं। राजस्थानी साहित्य में उनके योगदान के लिए १९८४ में उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। इसी तरह उन्हें साहित्य महमहोपाध्याय, राजस्थान रत्न टेसिटरी गोल्ड अवार्ड, महाराना कुम्भा पुरस्कार, सोवियत लैण्ड नेहरू अवार्ड आदि से भी पुरस्कृत किया गया। उन्होंने राजस्थानी और हिन्दी में अनेक पुस्तकों की रचना की। राजस्थानी में उनकी प्रमुख पुस्तकें मुमल, देवनारायण बगड़ावत महागाथा, राजस्थान के रीति-रिवाज, अंतरध्वनि, लेनिन री जीवनी, हिंदुकुश के उस पार हैं।