म्‍हेन्‍द्रा मूमल री वात (भाग 7)

म्‍हेन्‍द्रा अर मूमल री आ वात मुलक में घणी चावी

भाग - 7

मूमल रा म्हैल में दीवौ बळ रियौ, तीजी पोहर रात ढळगी। मूमल बाट नाळती-नाळती सोयगी। उण दिन मूमल री बैन सूमल आयोड़ी। सहेलियां सागै सूमल खेल री। खेल में मरदाना कपड़ा पैरियोड़ा। बातां करती-करती सूमल ई मूमल रै सागै सोयगी, मरदाना कपड़ा पैरियां इज। म्हेंदरौ मूमल री मैड़ी चढ़ियौ। उतावळौ मूमल रा ढोलिया कनै गयौ। नजर पड़तां ई म्हेंदरा रै तौ हजार बिच्छू सागै ई डंक मारिया।
“मूमल अेक मरद रै साथै सोय री ? हत थारी की मूमल। जिण मूमल माथै म्हूं प्राण देवूं वा मूमल असी ? जिण मूमल सारू म्हूं अबार सौ कोसां सूं भटकतौ आयौ, वा मूमल आगै दूजा आदमी सागै सोय री।”
म्हेंदरा री आंखियां आगै तौ काळा-पीळा आय गिया। नीं तौ आगै देखणी आयौ, नीं सोचणी आयौ। हाथ मायली कांबड़ी हाथ सूं छिटक नीचै पड़गी। ज्यूं आयौ, ज्यूं पाछौ टोरड़ी पै सवार व्हे गियौ। म्हेंदरा रौ तौ मन फाट गियौ। काळजौ करच-करच व्हे टूट गियौ। मूमल रौ उणियारौ आंखियां आगै फिरै, जिण रै लारै रीस सूं लोई उकळवा लागै। सोगन लेय लीधी -“मूमल रौ मूंडौ नी देखूं।” मायलौ जीव केवै- मूमल असी तौ नी व्हेणी चावै, पण लारै रौ लारै विचार कैवै - है किण तरै नीं, आंखियां देखी झूठी थोड़ी व्है। 
 मूलल री सुबै आंख खुली। म्हेंदरा रै हाथ री कांबड़ी पड़ी। आसा भर उठी - “म्हेंदरौ कठै ?” अठीनै देखियौ, वठीनै देखियौ, म्हेंदरौ नीं। नीचै झांकी, ऊंट रा पग मंडियोड़ा। पठतावण रा सागर में डूबगी। रातै म्हेंदरौ आयौ, म्हारी नींद नीं जागी। म्हेंदरै म्हनै जगाई क्यूं नीं ? कठै ई नाराज तौ नीं व्हे गियौ ? यां आदमियां रौ कांई भरोसौ ? नाराज व्हेतां देर नी लगावै। भांत भांत रा विचार करै। रात री वाट नाळै। राज नै वा ई वेळा व्ही, चढ डागळा पै सितार रा तारां नै छेड़िया -
                “असल हेताळू घरै आव” री धुन सूं रोही गूंजगी। अेक घड़ी व्हैगी, दो घड़ी व्हैगी। मूमल गावती री। “आय गियौ हूं” री आवाज नीं आई। मूमल गावती गावती थाक नै पड़गी। म्हेंदरौ  नीं आयौ। अेक दिन, दो दिन,......दस दिन व्हे गिया। मूमल कळपै। बूढा सांचौ कियौ है - “हेत करौ मत कोय।” म्हूं प्रीत कर पछताय री हूं। असी जो जाणती, कदै ई प्रीत नीं करती। म्हेंदरौ मिसरी रा कूंजा जस्यौ मीठौ म्हेंदरौ भूलणी नी आवै। म्हेंदरा, थनै अस्यौ नीं जाण्यौ।
                मूमल सोच कर-कर दूबळी व्हैगी। माथा में तेल घालियां नै महीना व्हे गिया। फीका नैणा मूमल गेलौ देखती रै। धरती धूंधळी लागै। आरसी नै गाबा सूं ढांक दीधी। अंतर री सीसियां नै काक नदी में उंधाय दीधी। मैड़ी में नीं रंग, नीं राग। वा ई अेक घड़ी रात जावै, ने मूमल डागळा पै चढ़ सितार बजावै। अबै सितार रा तार ई गावै नीं, मूमल रै लारै-लारै रोवै। सितार पै मूमल म्हेंदरा नै आवा रा हेला पाड़ै, ओळंभा देवै -
थांरा तौ बिना रे म्हारा सोढा राणा धरती धूंधळी,
थारी मूमल राणी रै उदास
मूमल रौ बुलायौ रे,
असल हेताळू म्हेंदरा घरै आव
मूमल वाट नाळी, घणी नाळी। कागज लिख नै भेजियौ। म्हेंदरै पाछौ कैवायौ - “म्हूं रूप रौ लोभी, वासना रौ कीड़ौ नी हूं। रूप नै प्यार नीं करूं, चरित्र नैं करूं। उण रात नै म्हैं म्हारी आंखिंया मूमल रौ चरित्र देख लीधौ। मूमल नै कै दीजौ - जिण साथै थारौ मन लागियोड़ौ, उण साथै रै। म्हारै लारै मत पड़।”   
                समाचार सुण्यां मूमल रै पगां नीचली धरती खिसक गी। अबै समझी- म्हेंदरौ क्यूं नीं आयौ! सपना में बात नीं जाणती जो दोस आयौ। मूमल तौ उणी’ज वेळा उमरकोट चाली। जाय म्हारा म्हेंदरा रा मन रौ वैम काढंू। मूमल उमरकोट पूगी। म्हेंदरा नै समाचार भेज्या। म्हेंदरै देख्यौ इण रा हेत नै तौ पतवाणां। म्हेंदरै चाकर नै सिखायौ। चाकर माथौ कूटतौ मूमल रै डेरै पूगौ - “म्हेंदराजी नै काळौ नाग डस गियौ।”
                “हैं” करता मूमल रा प्राण पंखेरू उड़ गिया।

               

खबर लागतां ई म्हेंदरौ चक्कर खाय नै वठै पड़ गियौ। पण अबै कांई ? म्हेंदरौ गाबा फाड़वा लागियौ, मूमल करतौ फिरै। समंद में जतरी लैहरां, रेत में जतरा कण, माथा में जतरा बाळ, अतरी दाण दिन में मूमल नै याद करै।

               

 

               

***समाप्‍त***




लेखक परिचय

रानी लक्ष्‍मी कुमारी चूंडावत
उनका जन्म २४ जून १९१६ को मेवाड़ में हुआ। वे राजस्थान में मेवाड़ राजघराने की एक बड़ी रियासत देवगढ़ के रावत विजयसिंह की पुत्री थीं। उनका विवाह १९३४ में रावतसर के रावत तेज सिंह से हुआ। २४ मई २०१४ को उनका निधन हो गया। उन्होंने राजस्थानी भाषा की मान्यता दिलाने के भरसक प्रयास किये। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्या थीं और उन्होने देवगढ़ विधान सभा का १९६२ से १९७१ तक प्रतिनिधित्व किया। वे १९७२ से १९७८ तक राज्यसभा की सदस्या रहीं। वे राजस्थान प्रदेश कांग्रेस समिति की अध्यक्ष भी रहीं। राजस्थानी साहित्य में उनके योगदान के लिए १९८४ में उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। इसी तरह उन्हें साहित्य महमहोपाध्याय, राजस्थान रत्न टेसिटरी गोल्ड अवार्ड, महाराना कुम्भा पुरस्कार, सोवियत लैण्ड नेहरू अवार्ड आदि से भी पुरस्कृत किया गया। उन्होंने राजस्थानी और हिन्दी में अनेक पुस्तकों की रचना की। राजस्थानी में उनकी प्रमुख पुस्तकें मुमल, देवनारायण बगड़ावत महागाथा, राजस्थान के रीति-रिवाज, अंतरध्वनि, लेनिन री जीवनी, हिंदुकुश के उस पार हैं।