म्‍हेन्‍द्रा मूमल री वात (भाग 6)

म्‍हेन्‍द्रा अर मूमल री आ वात मुलक में घणी चावी

भाग - 6

म्हेंदरै रै परणियोड़ी लुगायां आठ। म्हेंदरौ पाछली रात रा लुद्रवां सू उमरकोट पूगै। पूगतां ई छोटी बहू रै माळिया में जाय सोय जावै। सातूं ई बहुवां, मनां में घणी नाराज। म्हेंदरा सूं बात कीधा नै छह-छह महीना व्हे गिया। अमरोस सूं भरी बैठी। अेक दिन सातूं ई बहुवां सासू रै कनै छोटकी पै पुकारू गी-
 “म्हां तौ सातूं ई जणियां बैठी रैवा। थांरा बेटा छोरी रै पौढिया रै। म्हांनै पूछै ई नीं। यौ कठा रौ नियाव ?”
सासू माणकदे, छोटी बहू नै बुलाय समझाई- “थूं यौ कांई करै! सगळां रा ई काळजा लूवै, या बात भली नीं। यै दूजी थारा सूं परण नै पैलां आई है। यां रौ हक  यां नै मिलणौ चाइजै !”
छोटी बहू सासू रै पगां रै हाथ लगावती बोली- ”यै थारै पगां रै हाथ लगाय नै कैवूं, जो म्हूं कांई जाणती व्हूं। रात बीत्यां पाछली पोहर रा आय म्हारै अठै सोवै, जो घड़ी दो दिन चढियां उठै। म्हनै बतळायां नै छह-छह महीना व्हिया है। कठै जावै अर कठा सूं आवै,  थां रा बेटा, म्हनै खबर नीं! थांरा बेटा नै थां संभाळौ।”
 माणकदे नै चिंता उपजी- म्हेंदरौ कठै जावै, कठा सूं आवै ? आप रै खावंद राणा वीसळ नै जाय माणकदे कियौ- “यै बीनणियां पुकार री है - म्हेंदरा नै म्हां आंखियां ई नीं देखां!” माणकदे सारी हकीगत सुणाई- “पाछली रात रा आय घरै सोवे। कजाणां कठै जावै ?”
वीसळ आंख रौ तौ आंधौ, पण हिया री आंख खुलियोड़ी। बीनणी नै अहनाण पूछिया।
    “आय नै सोवै जद उणां रा माथा रा केस लीला दीखै, केसा सूं पाणी चुवै।”
    “आज केसां रै नीचै कटोरी मांड पाणी झेलजै !”
    दूजै दिन केसां रो चूवतौ पाणी झेल कटोरी वीसळ रै आगै मेल्ही। वीसळ पाणी चाख नै बोलियौ- “यौ पाणी काक नदी रौ है। म्हेंदरो मूमल री मेड.ी जावै!”
    आठूं ई बहुवां रै जीव में ताड़ातोड़ लागगी। सगळी मिळ सल्ला कीधी - “मूमल नै किंया ई छोडावणी। रोज लुद्रवै जाय नै पाछौ आवै। उण ऊंट नै ई मार न्हाकां !”
सांझ पड़ी, अेक सेसू लगाय दीधौ - “कस्या ऊंट पै चढ़ नै जावै, जो पतो लगा।”
चीखल ऊंट पै चढ नै जावा री खबर लागी। दूजै दिन वां आठूं ई लुगायां चीखल ऊंट नै ठोक ठोक नीचै न्हाक दीधौ। म्हेंदरौ देखै तौ ऊंट आडै पसवाड़ै पड़ियौ। पगां में खील ठुक रिया, नखां में खील गड़ रिया। म्हेंदरौ रामूड़ा रैबारी रै घरै जाय हेलौ पाड़ियौ - “रामूड़ा बारै आव।”
रामूड़ा री लुगाई बोली - “आवै कांई, वौ तौ आडी कड़ पड़ियौ है।”
“क्यूं ? कांई व्हियौ ?”
“थां री लुगायां सिरोपाव दीधौ है। घाल रावळा में बापड़ा नै ठोक-ठोक नीचै न्हाक दीधौ।”
म्हेंदरा नै रीस तौ घणी आई। लुगाई नै कियौ - “इण रै पाटा-पीड़ कर।” रामूड़ा नै पूछियौ- “कोई दूजौ ऊंट ई अस्यौ है के नीं, जो म्हनै लुद्रवै पुगावै।”
“ईं री भाणजी अेक राती टोरड़ी है, जो थां नै ले जाय सकै। पण वा फेरियोड़ी कोयनी। थां कांबड़ी ऊंची मत करज्यौ, नीं तौ चमक जावैला।”
राती टोरड़ी पै पलाण कर म्हेंदरौ चढियौ। लुद्रवै रौ गैलौ पकड़ियौ। मारग में म्हेंदरै भूल सूं कांबड़ी री टोरड़ी रै पाड़ी। टोरड़ी तौ चमक नै भागी, जो दूजै गेलै घलगी। गेलौ चूकगी, म्हेंदरा नै ठा पड़ी नीं। गेला में कुवा चालवा री आवाज आई। म्हेंदरौ सोचियौ गेल में तौ कोई कुवा आवै नीं। जरूर गेलौ भूलियौ। कुवा पै आय नै टोरड़ी नै पाणी पावा लागियौ। पाणी रै मूंडौ अड़ाता ई टोरड़ी अेकदम मूंडौ फेर लीधौ। म्हेंदरौ कुवा वाळा नै पूछियौ- “टोरड़ी पाणी क्यूं नी पीधौ ?”
“अठा रौ पाणी खारौ है।”
“यौ गाम कस्यौ है ?”
“बाहड़मेर।”
“गजब व्ही। म्हूं कठै रौ कठै आय निकळियौ।”
म्हेंदरा नै तौ लुद्रवै पूगवा री उतावळ लाग री। झट टोरड़ी नै ले न्हाकी उठा सूं, टोरड़ी नै दबाई जो वा तौ पूगळ आय निकळी। बळोच रा भै सूं पूगळ रा आदमी जागै। लोगा री बोली सुणी तौ म्हेंदरै जाणियौ- “यौ लो, यौ तौ पूगळ। कठै लुद्रवौ कठै पूगळ। अबै कदी पूगूंला।”
गेलौ पूछ आगै व्हियौ। मन में सोची - उमरकोट सू बाहड़मेर, बाहड़मेर सूं पूगळ भटक नै फिरतौ फिर्यौ। अबै जो गेलौ चूक गियौ तौ लुद्रवै पूगवा नै ई नीं। अेवड़ छूट रियौ, गुवाळ बैठौ।म्हेंदरै गुवाळ नै हेलौ पाड़ियौ- “म्हूं दिसाभूल व्हेय रियौ हूं। थूं म्हारै नेडौ आय ऊंट रा काना कना सूं दिसा बता, जो म्हूं पाधरै गेलै बैवूं।”
गुवाळियौ ऊंट रै कनै आय ऊंचौ हाथ कर दिसा बतळावण लागियौ। म्हेंदरै तौ पकड़ गुवाळिया रौ हाथ, ऊंट रा आगला आसण पै न्हांक टोरड़ी दौड़ाय दी। गुवाळिया नै कियौ - “ हाकौ कीधौ तौ मार न्हाकूं, म्हनै गेलौ बतातौ जा। जाणी पहचाणी धरती आतां ई थनै उतार देवूं।”

गुवाळियौ गेलौ बतातौ जावै, म्हेंदरौ टोरड़ी नै खड़ियां जावै। लुद्रवा री धरती ओळखी। गुवाळिया नै उतार म्हेंदरौ आवै बढियौ।


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लेखक परिचय

रानी लक्ष्‍मी कुमारी चूंडावत
उनका जन्म २४ जून १९१६ को मेवाड़ में हुआ। वे राजस्थान में मेवाड़ राजघराने की एक बड़ी रियासत देवगढ़ के रावत विजयसिंह की पुत्री थीं। उनका विवाह १९३४ में रावतसर के रावत तेज सिंह से हुआ। २४ मई २०१४ को उनका निधन हो गया। उन्होंने राजस्थानी भाषा की मान्यता दिलाने के भरसक प्रयास किये। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्या थीं और उन्होने देवगढ़ विधान सभा का १९६२ से १९७१ तक प्रतिनिधित्व किया। वे १९७२ से १९७८ तक राज्यसभा की सदस्या रहीं। वे राजस्थान प्रदेश कांग्रेस समिति की अध्यक्ष भी रहीं। राजस्थानी साहित्य में उनके योगदान के लिए १९८४ में उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। इसी तरह उन्हें साहित्य महमहोपाध्याय, राजस्थान रत्न टेसिटरी गोल्ड अवार्ड, महाराना कुम्भा पुरस्कार, सोवियत लैण्ड नेहरू अवार्ड आदि से भी पुरस्कृत किया गया। उन्होंने राजस्थानी और हिन्दी में अनेक पुस्तकों की रचना की। राजस्थानी में उनकी प्रमुख पुस्तकें मुमल, देवनारायण बगड़ावत महागाथा, राजस्थान के रीति-रिवाज, अंतरध्वनि, लेनिन री जीवनी, हिंदुकुश के उस पार हैं।