म्‍हेन्‍द्रा मूमल री वात (भाग 5)

म्‍हेन्‍द्रा अर मूमल री आ वात मुलक में घणी चावी

भाग - 5

म्हेंदरै घरै आय आपरै माळिया में बैठौ। मूमल दीखै। मन नै मारै तौ मरै नीं, मन नै समझावै तौ समझै नीं। आंखियां खोलै तौ आवा रौ आमंत्रण देता मूमल रा नैण ई नैण दीखै। उण आमंत्रण नै नटवा री ताकत म्हेंदरा में कठै ? म्हेंदरौ तौ उठियौ, राईका रामूड़ा नै बुलायौ। राईकौ आयौ। म्हेंदरै पूछियौ - “आपणै ऊंटा रा अबारूं टोळा कतरा है ?”
“बीस”
“रामूड़ा, यां टोळां में कोई अैड़ौ ऊंट है के नीं, जो रातूंरात लुद्रवै जाय पाछौ आवै?”
“अस्यौ ऊंट तौ एक है - चीखल। वौ अलबत्ता लुद्रवै जाय पाछौ आय सकै।”
“कस्योक है रे चीखल चालवा नै ?”
“चीखल री कांई पूछौ, सा! किरकिरिया काना रौ, झाबरी पूंछ रौ, आरसी ईड रौ, घोटवीं नळी रौ, ना-ना करतां नागौर जावै, झे-झे करतां जैसलमेर पुगावै, घड़ी एक मोहरी ढीली छोड़ी व्है तौ, दिल्ली री खबर पलक में लेतौ आवै!”
“ला, ला! चीखल पै पलाण मांड नै झट ला!”
रामूड़ै नवी मोहरी लगाय, आछौ पलाण मांड चीखला नै लाय हाजर कीधौ। म्हेंदरा चढ़िया ऊंट पै। चीखल चलियौ जाणै पाणी रौ रेलौ बहियौ। घी रौ भरियोड़ौ कटोरौ हाथ में ले बैठ जावै तौ टोपौ नीचै नीं पड़ै। अेक पोहर रात गियां लुद्रवा रा गौरवां में चीखल आय पुगाया। म्हेंदरौ मूमल सूं आय मिलियौ, जाणै बळती धरती में अणचींत्यां जेठ महिना में पावस री छौळ आय पड़ी व्है। सूरज री किरण पड़तां ई कंवळ विगसै ज्यूं मूमल विगसगी। घर में उजाळौ व्हे गियौ, जाणै पूनम रौ चांद ऊग आयौ। सावण रा बादळ नै देख मोरडौ नाचै ज्यूं मूमल रौ मन नाचवा लागियौ। मन ई कांई नाचै, मूमल री मैड़ी नाचवा लागगी। थांभा हंसवा लाग गिया, खाट खेलण लागगी। विभळिया नैणां में अणियाळौ काजळ सारियां मूमल, म्हेंदरा री पाखती में जाय बैठी। म्हेंदरौ बोलियौ - “म्हारा जस्यौ भागवान, धनवान, धरती रा पट्टै पै आज दूजौ कोई नीं ? मूमल जैड़ौ रतन जीं रै कनै व्है, उण सूं बत्तौ भागवान कुण ?”
मूमल कैवै- “पूरबला जनम में म्हैं जाडी केसर सूं महादेवजी री पूजा कीधी जो म्हनै म्हारी जोड़ रौ म्हेंदरौ मिलियौ।”
मूमल सितार ले नै गायौ -
मूमल रौ मेवासी ओ,
मिसरी रौ कूंजौ म्हेंदरौ

जाणै म्हेंदरा पै कामण कर दीधौ। कामणगारी मूमल तौ म्हेंदरा रै काजळ ज्यूं घुळगी, मेहंदी ज्यूं रचगी, तीन पोहर रात ढळतां-ढळतां म्हेंदरै चीखल पै सवार व्हे अेड लगाई जो तारां रैतां उमरकोट में जाय सोय गियौ। रोज री दिनचर्या व्हैगी। घड़ीक रात गियां मैड़ी रा डागळा पै चढ़ मूमल  सितार रा तारां पै हाथ फेरै। लारै-री-लारै सुर-लैहरी उठै। ठंढी रात में काक नदी री लैहरां नै परसतौ, बनराय नै चीरतौ कंठ सुर गूंज जावै -
म्हारा असल हेताळू,
म्हारा असल हेलाळू म्हेंदरा घरै आव
मूमल रौ बुलायौ रे,
म्हारा वचनां रौ सांचौ रे,
असल हेताळू म्हेंदरा घरै आव
मूमल रौ लोडावू रे,
बागां रौ मेवासी रे,
म्हारा असल हेलाळू म्हेंदरा घरै आव

अठीनै सितार रा तारां पै मूमल रौ हाथ फिरतौ, वठीनै म्हेंदरौ चीखल री मोहरी खेंचतौ। मूमल, मिसरी रा कूंजा म्हेंदरा नै आवा रा लांबा-लांबा हेला सितार पै मारती। असल हेताळू म्हेंदरौ जगमीठी मूमल नै बाथ में घालवा नै उतावळौ व्हे जातौ। सितार रा तार द्रुत पै बाजता, चीखल री चाल द्रुत व्हे जाती। मूमल टेर लेती - “असल हेताळू म्हेंदरा घरै आव!” अतराक में “आय गियौ” म्हेंदरा री आवाज आती। हरियाळी मूमल नै देख म्हेंदरौ हरियौ व्हे जातौ। हेताळू रौ हेत देख मूमल हरी व्हे जाती। मूमल म्हेंदरा रै हेत री बातां काक नदी री लैहरां करवा लागगी। रूंखड़ा बेलड़ियां नै कांधा पै चढाय कानां में कैवता - “असल हेताळू घरै आय रियौ है। रेवड़ चरावता गुवाळिया अळगोजा में गावा लाग गिया -
मूमल रौ बुलायौ रे,
असल हेताळू म्हेंदरा घरै आव

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लेखक परिचय

रानी लक्ष्‍मी कुमारी चूंडावत
उनका जन्म २४ जून १९१६ को मेवाड़ में हुआ। वे राजस्थान में मेवाड़ राजघराने की एक बड़ी रियासत देवगढ़ के रावत विजयसिंह की पुत्री थीं। उनका विवाह १९३४ में रावतसर के रावत तेज सिंह से हुआ। २४ मई २०१४ को उनका निधन हो गया। उन्होंने राजस्थानी भाषा की मान्यता दिलाने के भरसक प्रयास किये। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्या थीं और उन्होने देवगढ़ विधान सभा का १९६२ से १९७१ तक प्रतिनिधित्व किया। वे १९७२ से १९७८ तक राज्यसभा की सदस्या रहीं। वे राजस्थान प्रदेश कांग्रेस समिति की अध्यक्ष भी रहीं। राजस्थानी साहित्य में उनके योगदान के लिए १९८४ में उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। इसी तरह उन्हें साहित्य महमहोपाध्याय, राजस्थान रत्न टेसिटरी गोल्ड अवार्ड, महाराना कुम्भा पुरस्कार, सोवियत लैण्ड नेहरू अवार्ड आदि से भी पुरस्कृत किया गया। उन्होंने राजस्थानी और हिन्दी में अनेक पुस्तकों की रचना की। राजस्थानी में उनकी प्रमुख पुस्तकें मुमल, देवनारायण बगड़ावत महागाथा, राजस्थान के रीति-रिवाज, अंतरध्वनि, लेनिन री जीवनी, हिंदुकुश के उस पार हैं।