म्‍हेन्‍द्रा मूमल री वात (भाग 4)

म्‍हेन्‍द्रा अर मूमल री आ वात मुलक में घणी चावी

भाग - 4

वठी नै हमीर नै नींद नी आय री । जीव में ताड़ा-तोड़ री । करूंटा फेर रियौ। अेक पोहर, दो पोहर, तीजी पोहर रात ढळतां-ढळतां तौ उण रौ धीरज छूट गियौ। खवास रै लारै घड़ी री आगत करावा लागौ- “म्हेंदराजी नै कैवौ बारै आवै। अबै तौ समाचार सुणाय दिया व्हैला।”
उण री ताकीद म्हेंदरा रै कान में ई नीं पूगै। पूंगी पै सांप झोला खावै ज्यों म्हेंदरौ घूम रियौ। चटकी बजातां रात बीतगी। अेक अेक कर तारा आपरै घरां में जाय लुकिया। चांदड़लौ सारी रात आपरी संपदा लुटाय, अबै फीकौ पड़ मूंडौ छिपावा नै जगा हेरवा लागियौ। चिड़ियां चैहचावा लागी। म्हेंदरा री निजर उगूण दिसा साम्ही गी, संदूरी फूट री- “अरे, दिन ऊग आयौ! अतरौ झट ?”
मन में तौ नीं भायौ, पण उठ नै बारै आयौ। मूमल री जुबान चुप, पण उण री आंखियां म्हेंदरा नै पाछा आवा रौ आमंत्रण देय री। म्हेंदरा री आंखियां ई पाछी उणां री बोली में जवाब देय री -“म्हां में ताकात नीं के थांरा आमंत्रण नै इनकार कर दूं!”
म्हेंदरौ बारै आयौ, हमीर तौ गळै पड़ गियौ-“हैं म्हेंदराजी, यै कांई बातां करणी? दिन ऊग आयौ!”
हमीर लड़ै, म्हेंदरा नै खबर ई नीं पड़ै- यौ कै कांई रियौ है? खबर पड़ै कठा सूं, म्हेंदरा रै कानां में तौ मूमल री अमरत वाणी गूंज री, आंखियां में तौ मूमल री सूरत बसियोड़ी, हिवड़ौ तौ गमाय नै आयौ इज हौ।
हमीर चिड़ गियौ - “थां नै गैहल चढ़ री है के, व्हियौ कांई ? हालौ, घोड़ै चढ़ौ!”
म्हेंदरौ तौ सुन्न पड़ियौ ऊभौ। वौ तौ कोई हालै न चालै। हमीर नै रीस आई कांधौ पकड़ नै झंझेड़ियौ - “चालौ के नीं ?”
“थां जावौ, म्हूं तौ अठै इज हूं।”
“कठै ?”
“मूमल कनै!”
राव हमीर देखियौ म्हेंदरा रौ जीव बस में कोयनीं। इण नै संभाळौ, नीं तौ यौ गत्तरस व्हियौ। पकड़ म्हेंदरा रौ बांवटियौ, घोड़ा पै बैठायौ। हमीर अेक हाथ म्हेंदरा रौ पकड़ राखियौ के कठै ई घोड़ा नीचै कूद नी जावै। म्हेंदरा रौ घोड़ौ चालियौ। म्हेंदरा रौ सरीर घोड़ा माथै, पण जीव पाछै मैड़ी में। हमीर बोलियौ - “म्हेंदरा जी म्हैं तौ थानै स्याणा आदमी समझ राखिया। यौ कांई व्हे गियौ थां रै ?”
म्हेंदरै माथौ धूणियौ - “मूमल रा नैणां री चोट खाय नै कोई जीवतौ रै जावै ? सांप रौ डसियौ बच जावै, पण मूमल रा नैणां रौ डंकियौ जीवतौ नीं रैवै।”
म्हेंदरौ घोड़ा पै निढाह व्हेय नै बैठौ, लगाम ढीली छोड़ राखी। मूमल रा बखाण करतौ जावै - “मूमल में गुण ई गुण है। गूंदगरी रा सांठां ज्यूं मीठी। कठै ई तौ खारी नीं। थां देखी नीं है, ज्यूं म्हारी हंसी करौ।”
हमीर बोलियौ - “क्यूं बावळा व्हेय रिया हौ। धरियौ कांई है मूमल में, माणस व्है जैड़ी परी है।”
म्हेंदरौ तमक नै बोलियौ- “माणस व्है जैड़ी परी है ? थां नै खांड लूण री परीक्षा नीं। मूमल री मुधरी-मुधरी धुन सुणलै तौ तपसियां रा तप छूट जावै। माढेची रा पातळा होठां में वौ रस भरियौ है के वांनै  देख देवतां अमरत रा भरिया प्याला नै फेंक दै। म्हूं तौ आदमी हूं!”
हमीर हूंकारौ दे, नीं दे पण म्हेंदरौ मूमल रा बखाण करतौ जावै, नीसासा भरतौ जावै। नीठां-नीठां म्हेंदरा नै हमीर डेरा में लाय घालियौ। रात नै लुद्रवा  मै बिजळियां खिंवी। हमीर बोलियौ - “म्हेंदराजी यै बिजळियां कठी नै खिंव री है ?”
“म्हारा काळजा पै खिंव री है। क्यूं दाझिया पै लूण लगाय रिया हौ ?”
रात म्हेंदरै काटी खीरां पै लोटतां। के तौ काल री रात ही सुरग री निसाणी, के आज री रात काळी नागण ज्यूं डस री है। साजन बिना समसाण ज्यूं सगळौ जग दीख रियौ। ज्यूं-त्यूं दिन उगायौ। दिन ऊगतां ई म्हेंदरै तौ घरै जावा री सीख मांगी। हमीर घणी मनवारां कीधी, पण म्हेंदरौ मानियौ नीं। सगळा सूं राम-राम कर घर नै विदा व्हियौ।
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लेखक परिचय

रानी लक्ष्‍मी कुमारी चूंडावत
उनका जन्म २४ जून १९१६ को मेवाड़ में हुआ। वे राजस्थान में मेवाड़ राजघराने की एक बड़ी रियासत देवगढ़ के रावत विजयसिंह की पुत्री थीं। उनका विवाह १९३४ में रावतसर के रावत तेज सिंह से हुआ। २४ मई २०१४ को उनका निधन हो गया। उन्होंने राजस्थानी भाषा की मान्यता दिलाने के भरसक प्रयास किये। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्या थीं और उन्होने देवगढ़ विधान सभा का १९६२ से १९७१ तक प्रतिनिधित्व किया। वे १९७२ से १९७८ तक राज्यसभा की सदस्या रहीं। वे राजस्थान प्रदेश कांग्रेस समिति की अध्यक्ष भी रहीं। राजस्थानी साहित्य में उनके योगदान के लिए १९८४ में उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। इसी तरह उन्हें साहित्य महमहोपाध्याय, राजस्थान रत्न टेसिटरी गोल्ड अवार्ड, महाराना कुम्भा पुरस्कार, सोवियत लैण्ड नेहरू अवार्ड आदि से भी पुरस्कृत किया गया। उन्होंने राजस्थानी और हिन्दी में अनेक पुस्तकों की रचना की। राजस्थानी में उनकी प्रमुख पुस्तकें मुमल, देवनारायण बगड़ावत महागाथा, राजस्थान के रीति-रिवाज, अंतरध्वनि, लेनिन री जीवनी, हिंदुकुश के उस पार हैं।