म्‍हेन्‍द्रा मूमल री वात (भाग 3)

म्‍हेन्‍द्रा अर मूमल री आ वात मुलक में घणी चावी

भाग - 3

मूमल सहेली नै पूछियौ – “थूं उणां नै लाई, वै कठै ?”
“म्‍हूं चौक में तौ उणां नै वाळ नै गी। पाछा कठै गिया ? वै तौ नाहर सूं डर नै पूठा गिया दीखै !”
सहेली बारै आय नै कियौ- “आप में सूं पाका व्‍हौ जो आवौ। वा जगा काचां री नी।“
हमीर बोलियौ - “म्‍हेंदरा, जी थां जावौ !“
म्‍हेंदरौ चालियौ, आगै-आगै सहेली, लारै-लारै म्‍हेंदरौ। चौक मांय नै आयां सहेली तो अठीनै-वठीनै व्‍हैगी। म्‍हेंदरौ देखै- डलमत्‍थौ सोनैरी नाहर बाकौ फाडि़यां साम्‍हौ ऊभौ। म्‍हेंदरा रै हाथ में भालौ, कस’र नाहर रै सामी छाती ठरकाई । नाहर री खालड़ी सूं भूंसौ निकळ आयौ। अठीनै झांकै तो अजगर जीभ लपलपाय रियौ। म्‍हेंदरै तो उठाय भाला नै अजगर रै घमोडियौ। उण में सूं ई भूंसौ निकळ आयौ। म्‍हेंदरा नै हंसी आयगी। म्‍हेंदरै सोची – जरूर अठां सूं हमीर पाछौ फिरियौ हौ। म्‍हेंदरौ आगै चालियौ। चौक में पाणी भरियौ, जावै किंया ? अठै ई म्‍हेंदरा रौ भालौ काम आयौ। म्‍हेंदरै भाला नै पाणी थागवा नै घालियौ। भालौ तौ बाजियौ ‘खट’ कांच रा आंगणा में। म्‍हेंदरौ मचड़-मचड़ मोचडि़यां बजावतौ मूमल री मैड़ी में परौ गियौ। आगै मूमल बैठी। जाणै काळी कांठळ में बीजळी चमकी। कडि़यां-कडि़यां तांई तौ केस रळक रिया। बागडि़या नाळेर जस्‍या सीस सू लटकता केस यूं लाग‍ रिया जाणै वासंग नाग लूंब रियौ है। उण साढैची रौ नाक खांडा री धार जस्‍यौ । रंगभीनी रतनाळी आंखड़ल्‍यां में काळी-काळी काजळिया री रेखड़ी। रेसमिया तार जस्‍या कंवळा-कंवळा होटां बीचै उण ऊजळदंती रा दांत दाड़म रा दाणां ज्‍यूं दमक रिया। पेट ? पेट तौ मूमल रौ पीपळियै रा पान ज्‍यूं पातळौ। हिवडौ तौ सांचा में इज ढळियोडौ। देवळ रा थांभा जस्‍सी जांघड़लियां। पातळी पींडी सपीठी सातळ। तपायोड़ा कंचन सो रंग। अंग-अंग में मद उफल रियौ।
ना कोई देवळ पूतळी,
ना कोई रावळ रज्‍ज।

नीं तौ कोई देवळ में ई अेड़ी फूटरी मूरती, नी कोई राजा रा रणवास में ई यौ रूप। म्‍हेंदरौ तौ ठगियोड़ौ रै गियौ। मूमल रा मूंडा म्‍हेंदरा री आंखियां गड़गी। गड़ी तौ असी गड़ी के मूमल रै हिवड़ा में जाय अड़ी । नैणां री भासा नैण समझै । मन घणौ डावौ व्‍है। मन नै मन तुरत ओळखै। म्‍हेंदरौ मन मैं कैवै - “वैमाता, कांई रूप सिरजियौ है। मूमल सूं मिळिया बिना या अतरी उमर म्‍हैं वरथा ई गमाई।“
म्‍हेंदरा नै देख मूमल मन में कैवै - “कांई तेज है ! नैण कांई है खंजर री धार है। नैणां रौ यौ पाणी कठै ई नीं देखियौ।“ मूमल रा नैण म्‍हेंदरा रै नैणां सूं जाय मिलिया। मूमल रा नैण नीचे झुक गिया, पण नैणा री चुगली मन खाय गियौ। यौ ई जो कठै ई वो मनचींत्‍यौ नीं है जिण री आसा में म्‍हूं तन-मन नै अवेरियां बैठी हूं ? म्‍हारी तपस्‍या सफळ व्‍है कांई !”
मूमल ऊभी व्‍है साम्‍हा दो पांवड़ा भरिया, म्‍हेंदरा नै लागियौ – हंसणी अठै कठां सूं आयगी ! राता पतळा होठ मुळकिया, सागै बोल निकळिया - “पधारौ !“ म्‍हेंदरा नै लागियौ कठै ई वीणा रा तार रै आंगळी अड़गी। म्‍हेंदरौ बैठियौ, मूमल बैठी। मूमल बुलायौ तौ देस री बातां बूझवा नै। भूलगी कांई पूछै ! बातां पूछणी भूली जे तौ भूली, पण सागै ई मनड़ौ भूलगी।
माढेची मूमल अर सोढौ म्‍हेंदरौ अेक दूजा पै लट्टू व्‍है गिया। मूंडा सूं बात तौ नीं नीकळै, पण मन में रस रा गुटकळिया उतर रिया। म्‍हेंदरै देखियौ भींत पै सारंगी टंक री है। उठै व्‍हे नै सारंगी उतारी। सारंगी पै गज फेरियौ। माढ राग रा सुर निकळिया। सुरां रै सागै राग री रसीली मूमल गाबड़ हाली, सधियोड़ा हा‍थां ताळ दीधी। म्‍हेंदरै गाबड़ रौ झोंकौ देतौ गायौ –
म्‍हारी जगव्‍हाली अे मूमल,
हालै नीं अे अमराणै रे देस
मूमल रै काळजा में गरगलियां पड़गी। म्‍हेंदरै माढ झुकाई –
म्‍हारी जगमीठी अे मूमल,
हां-हां अे म्‍हारी हरियाळी अे मूमल
हालै तौ ले चालूं म्‍हारै देस
हां-हां अे म्‍हारी नाजुकड़ी अे मूमल,
म्‍हारी अमरत भ्‍र अे मूमल,
हां-हां अे म्‍हारी हरियाळी अे मूमल,
हालै नीं रसिया रे देस
म्‍हारी माढेची अे मूमल,
हालै नीं अे अमराणै रै देस

म्‍हेंदरा रौ गीत इज नीं, म्‍हेंदरा रौ रूम-रूम मूमल नै आलीजा रै देस चालवा रौ नूंतो देय रियौ। उणरी प्‍याला जसी मोटी-मोटी आंखियां सूं नेह उझळ रियौ। मूमल गुटकळा भर-भर उण रस नै पीय री। ज्‍यूं पीवती जावै, ज्‍यूं तिस ई बधती जावै। तृप्ति रौ काम ई कांई ?  चंदण रा रूंख रै विलग्‍गी नागर वेल ज्‍यूं मूमल लैहलाय री। हिवड़ा रौ हेत नैणा झळक‍ रियौ। म्‍हेंदरौ आप रा भाग नै सराय रियौ। असी अस्‍तरी भाग बिना नीं मिलै। चौड़ी छाती, पातळी कमर, यै झीणी-झीणी पासळियां। कै तौ भगवान तूटै तौ मिळै कै पूरबला जनम में तप कीधौ। पूनम रौ चांद मथारै आय गियौ। ऊपर सूं सोळा ई कळा सूं चांद अमरत बरसाय रियौ। नीचै अमरत भर मूमल रा मीठा-मीठा बैण म्‍हेंदरा रा काना में अमरत घोळ रिया। मूमल रै गज-गज लांबा केसां पै म्‍हेंदरै हाथ फेरतै पूछियौ - “मूमल थांरी जिनावरां सूं सैंध कदकी है ? यां नागणियां नै थां कद विसासी ?“
हिरणी जसी आंखियां में अमी भर मूमल म्‍हेंदरा नै देखियौ। नैणां में नैण घालतै म्‍हेंदरौ मुळक नै बोलियौ -“यूं झांकणौ मरगला नै थां ई सिखायौ दीखै ?“

लांबी-लांबी कैरी री फांक जसी पलकां नीचै झुकगी। म्‍हेंदरौ अर मूमल दोई रस रा सागर में चमकिया लगाय रिया। रात ढळवा लागी, किरतियां गढ रा कांगरा पै झुक आई, हिरणी लूंबा खावा लागी। तारां री जोत मंद पड़वा लागी। कूकड़ा बोलवा लागिया। घट्टियां फिरवा लागी, बिलोवणां रा घमड़का बाजवा लागिया। मूमल अर म्‍हेंदरा नै ठा ई नी पड़ी के रात बीतगी। वै तौ उण प्रीत नगरी में बैठा जिणमें ताती लूवां ई सीलळ-मंद-सुहावणी लागै, जठा रा कांटां में ई फूलां री खसबोई आवै। हार में जीत रौ मजौ आवै।
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लेखक परिचय

रानी लक्ष्‍मी कुमारी चूंडावत
उनका जन्म २४ जून १९१६ को मेवाड़ में हुआ। वे राजस्थान में मेवाड़ राजघराने की एक बड़ी रियासत देवगढ़ के रावत विजयसिंह की पुत्री थीं। उनका विवाह १९३४ में रावतसर के रावत तेज सिंह से हुआ। २४ मई २०१४ को उनका निधन हो गया। उन्होंने राजस्थानी भाषा की मान्यता दिलाने के भरसक प्रयास किये। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्या थीं और उन्होने देवगढ़ विधान सभा का १९६२ से १९७१ तक प्रतिनिधित्व किया। वे १९७२ से १९७८ तक राज्यसभा की सदस्या रहीं। वे राजस्थान प्रदेश कांग्रेस समिति की अध्यक्ष भी रहीं। राजस्थानी साहित्य में उनके योगदान के लिए १९८४ में उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। इसी तरह उन्हें साहित्य महमहोपाध्याय, राजस्थान रत्न टेसिटरी गोल्ड अवार्ड, महाराना कुम्भा पुरस्कार, सोवियत लैण्ड नेहरू अवार्ड आदि से भी पुरस्कृत किया गया। उन्होंने राजस्थानी और हिन्दी में अनेक पुस्तकों की रचना की। राजस्थानी में उनकी प्रमुख पुस्तकें मुमल, देवनारायण बगड़ावत महागाथा, राजस्थान के रीति-रिवाज, अंतरध्वनि, लेनिन री जीवनी, हिंदुकुश के उस पार हैं।