म्‍हेन्‍द्रा मूमल री वात (भाग 2)

म्‍हेन्‍द्रा अर मूमल री आ वात मुलक में घणी चावी

भाग – 2
हमीर आडियां म्‍हेंदरा नै सुणावै। म्‍हेंदरौ उणां नै तुरता- फुरती पूरी कर दै। हमीर रै अर म्‍हेंदरा रै घणा हेत बंध गिया । हमीर म्‍हेंदरा री चतराई रौ कायल व्‍हेय गियौ । यौ सोढो जुवान हजारां में नीं, लाखां में अेक है। सासरा सूं सीख ले आपरै घरै जावा लागियौ तौ म्‍हेंदरा री घणी खैंच ने मनवार कीधी – “साळाजी आप ई साथै चालौ, म्‍हारा गळा री सोगन, दो-चार दिन ई ठैरजौ।“
म्‍हेंदरै ई सोची बैन-बैनोई नै पांच-दस मंजिल पुगाय आवूं। साथै व्‍हेय गियौ। धर मंझलां धर कूंचां। कूंच करता, डेरा देता चालिया। लोद्रवा सू आठ-दस कोस डेरा दीधा। आच्‍छौ जंगळ, हरियाळी व्‍हेय री, हिरणियां रा डार दीखिया, झाड़कियां में खरगोशिया फदकता निजर आया। म्‍हेंदरा रै अर हमीर रै सिकार खेलणै री उमंग आई।
म्‍हेंदरौ बोलियौ – “या रोही तौ सिकार खेलणै री है। जिनावर मोकळा दीखै। आज रौ दिन अठै ई डेरा लगाय दां। आपां सिकार रमां।“
हमीर कहियौ – “थां तौ सहदेव वाळी बात कैवौ ! बिलकुल म्‍हारा मन री, होठां उपरळी बात थै कैय दीधी। चालौ।“
दोई जणां घोड़ा चढि़या। कबाण हाथ में झालिया। रोही में सिकार लारै व्हिया। तर झंगर रोही, जाळ सूं जाळ अडि़योड़ी।
घोड़ा रा पौड़ री आवाज सूं चमक अेक रोझड़ी भागी। यां रोझड़ी पाछै घोड़ा दीधा। आगै-आगै रोझड़ी, लारै-लारै यां रा घोड़ा भागिया जावै। भागता-भागता काक नदी पै आय पूगिया। काक नदी आंठौ खावती बैय री, ठंडौ-ठंडौ पवन चाल रियौ, कनै ई बाग लागियोड़ौ जिणमें सूं फूलां री खसबोई आय री। नदी रै माथै ई उजळी-उजळी ऊंची मेड़ी बणियोड़ी। रळियावणौ स्‍थान। यां घोड़ा री लगाम खैंची।
हमीर बोलियौ – “कस्‍यौ रळियावणौ स्‍थान है। आवतां ई जीव सोरौ व्‍हेय गियौ।“
म्‍हेंदरै कहियौ – “सांची बात है, अठै थळी में अस्‍यौ स्‍थान। सौदागरां रा मूंडा सूं बातां सुणां अरब में नखलिस्‍तानां री। अठै आवतां ई म्‍हनै तौ यौ नखलिस्‍तान लागियौ।“
“पसीनां सूं घोड़ा तर व्‍हेय रिया है।“  अंगरखा री चाळ सूं पवन झालतौ हमीर बोलियौ – “हेठा उतरां, दो घड़ी विसराम लां, पसीनौ सुखावां।“
दोई जणा नीचै उतरिया, पसीना सूं गाबा आला व्‍हेय रिया। हमीर कैवै- “म्‍हारा घोड़ा नै थै पकड़ौ, म्‍हूं मूंडौ धोय आवूं।“  म्‍हेंदरौ कैवै – “थां घोड़ा नै पकड़ौ, म्‍हूं पाणी पीय आवूं !” दोनूं जणा आपसरी में घोड़ा पकड़वा री जिद्दौ जिद्द कर रिया। नदी रै माथै इज मूमल री मैड़ी। यां रौ बोलियाळौ सुणियौ तौ मूमल जाळी मायनै सूं झांकी। दोनूं अेक सरीखा जुवान घोड़ा पकडि़यां ऊभा। वौ वीं नै कै “थूं घोड़ा नै पकड़ !“ वौ वीं नै कै - “थूं पकड़ !“ मूमल देखियौ है बांका सिरदार, साथै इणा रै घोड़ा पकड़णियौ चाकर नीं। वीं झट छोरी नै हेलौ पाडि़यौ- “जा आदमियां नै भेज, यां रा घोड़ा पकडै। सिकार रमता आया दीखै। यां नै रैवास देवां, खातिर करां !“
मूमल रा चाकरां आय घोड़ा थामिया। रैवास दीधौ। हथियार उतारिया, वागां री कसां खोली। मूमल जाळी में सूं झांक री। छोरी नै कहियौ - “ढोलिया भेज, बिछाणा भेज !“ खिजमतियां नै भेजिया, तेल कटोळ कर संपड़ाया, मूंडागै जीमण री थाळियां मेल्‍ही। जीम नै उठिया चळु कीधा। मूमल री एक सहेली आय पूछियौ - “आप कठारा सिरदार हौ ? कठै बिराजवौ है ?“
हमीर बोलियौ -“यै सोढौ म्‍हेंदरौ, अमरकोट रा राणा बीसळदे रौ कंवर ! म्‍हनै राव हमीर जाड़चौ कैवै। उमरकोट परणवा नै गियौ। पाछा आवतां अठीनै निकळ आया। थां कैवौ, थां किणरा माणस हौ, म्‍हां किण सुलखणी रा पावणा हां ?“
“आप मूमल नै नी जाणौ ? मूमल, जगव्‍हाली मूमल रौ नाम नी सुणियौ ? मूमल रा गुणां री महक सूं तौ सारौ माढ देस महक रियौ है। मूमल रा रूप या काक नदी, कळ-कळ करती बखाण गावती फिरै। या मूमल री मेड़ी है। मूमल आपरी सहेलियां रै साथ अठै रै।” यूं कैय सहेली तो परी गी। जिमावा नै आयोड़ौ नाई बोलियौ - “बड़ा सिरदारां, मूमल री कांई पूछौ ! मूमल रा रूप अर गुण रौ तौ पार ई नीं। कांई शौकीन है ! मूमल री मैड़ी मायनै सूं देखौ, देखता रै जावौ। भींता रै हिंगळू ढुळियोड़ौ। कांच जडि़या आंगणा में बाजणिया किंवाड़ है। केसर कस्‍तूरी ऊंखळियां में कू‍टीजै।“
हमीर पूछियौ -“मूमल परणियोड़ी है के कुंवारी ?“
“अखन कुंवारी ! रात-दिन राग रंग में भीनी रै। घणा-घणा फूटरा-फर्रा, जोध-जवान, बांका-बहादर आय गिया, पण मूमल तौ किण रै सामी नी झांकी। कोई दाय आयौ इज नीं। मूमल रै तो प्रण है – गांठ जोड़ूंला तो आपरै मनचीत्‍या लारै। नीं तौ अखन कुंवारी रैवूंला।“
अतराक में तौ मूमल री सहेली पाछी आई - “मूमल बुलावै, आप में सूं कोई अेक पधारौ। देस री बातां पूछै !“
हमीर बोलियौ - “म्‍हेंदरा जी थां जावौ !“
म्‍हेंदरौ बोलियौ - “नीं थां जावौ !“
हमीर खांगी पागड़ी बांध, वागो पैर, सहेली रै साथै व्हियौ। आगै-आगै सहेली, नै पाछै-पाछै हमीर। मूमल री मेड़ी कांई ही, भूल म्‍हैल हौ। अकेला आदमी नै छौड़ दै तौ निकळणौ दोरौ व्‍हे जावै। अंतर री लपटां आय री । सुगंध री धोरां उड़ री। चौक में वाळ नै सहेली तो अठीनै-वठीनै व्‍हेय गी। हमीर देखियौ – सामनै बाकौ फाडि़यां डलमत्‍थौ सोनैरी ऊभौ। हमीर री आंखियां चढ़ी, घबराय नै दूजी आडी नै झांकियौ, लपलप जीभ करतौ अजगर निजर आयौ। हमीर सोचियौ – यौ तौ धोकौ। यां तो मारवा री सोची, जाणै नाहर यां नै खाय जाय, सांप डस लेय। आपां यां रा घोड़ा हथयार परा लेवां। पण म्‍हूं अैड़ौ छळाऊ नीं। वौ तौ पाछ पगां आयौ ज्‍यूं बारै भाज निकळ गियौ।


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लेखक परिचय

रानी लक्ष्‍मी कुमारी चूंडावत
उनका जन्म २४ जून १९१६ को मेवाड़ में हुआ। वे राजस्थान में मेवाड़ राजघराने की एक बड़ी रियासत देवगढ़ के रावत विजयसिंह की पुत्री थीं। उनका विवाह १९३४ में रावतसर के रावत तेज सिंह से हुआ। २४ मई २०१४ को उनका निधन हो गया। उन्होंने राजस्थानी भाषा की मान्यता दिलाने के भरसक प्रयास किये। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्या थीं और उन्होने देवगढ़ विधान सभा का १९६२ से १९७१ तक प्रतिनिधित्व किया। वे १९७२ से १९७८ तक राज्यसभा की सदस्या रहीं। वे राजस्थान प्रदेश कांग्रेस समिति की अध्यक्ष भी रहीं। राजस्थानी साहित्य में उनके योगदान के लिए १९८४ में उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। इसी तरह उन्हें साहित्य महमहोपाध्याय, राजस्थान रत्न टेसिटरी गोल्ड अवार्ड, महाराना कुम्भा पुरस्कार, सोवियत लैण्ड नेहरू अवार्ड आदि से भी पुरस्कृत किया गया। उन्होंने राजस्थानी और हिन्दी में अनेक पुस्तकों की रचना की। राजस्थानी में उनकी प्रमुख पुस्तकें मुमल, देवनारायण बगड़ावत महागाथा, राजस्थान के रीति-रिवाज, अंतरध्वनि, लेनिन री जीवनी, हिंदुकुश के उस पार हैं।