म्‍हेन्‍द्रा मूमल री वात (भाग 1)

म्‍हेन्‍द्रा अर मूमल री आ वात मुलक में घणी चावी
चांद गयो घर आपणै,
उजासड़ो कवांह।

मगन व्हियोड़ो हमीर घड़ी-घड़ी रौ दूवा री इण कड़ी ने बोल रियौ। कड़ी बोलती वेळा मस्‍ती सूं उणरी आंखिया घु‍ळती जाय री। आंखियां रै आगे रात नै देखियोड़ौ उजाळौ और ई ऊजळो व्‍हे जावै। मन री कळी खुल-खुल जाय री। हमीर जाड़ेची सोढी नै परणवा नै उमरकोट आयोड़ौ। परणिया जिण रै दूजी रात नै सुख्‍ सू लोक लुगाई सूता हा। रात नै घोड़ा नै घास नीरवा नै हमीर उठियो। उण रा घौड़ा नै वौ रात नै आपरै नजीक बांधतौ, आप रा हाथ सूं घास दाणौ देतौ उण ओवरा रै बारै बांध राखियौ। हमीर उठियौ तौ सोढी पूछियौ – “कठै जावौ ?”
“घोड़ा नै घास नीरवा नै ।“
“आप सूता रेवौ, म्‍हूं नीर आवूं ।“
या कैय बीनणी सोढी ही ज्‍यूं ऊंगाचै डील चाली। कांचळी खोलियोड़ी झीणौ चीर डील पै न्‍हाक बारै नीकळगी। मेह अंधारी रात ही। छांटा-छींटौ व्‍हेय रियौ। हमीर ताक मायनै मूंडो घाल नै झांकियौ, अंधारी रात में ज्‍यूं सोढी चाल री ज्‍यूं आगे उजास व्‍हेतो जाय रियौ। हमीर देखियौ सोढी री कंचन देही रो परगास पड़तौ जाय रियौ है। दूवा री कड़ी अपणै आप मूंडा सूं निकळगी –
चांद गयौ घर आपणै,
ऊजासड़ौ कवांह।

यौ उजास किण रौ ? चांद तौ आपणै घरै गियौ, आंथ गियौ। हमीर सोढी री देह री कांति देख मंतरियोड़ा नाग ज्‍यूं झोला खावा लाग गियौ। मन री लैहरां रै लारै दूवा री कड़ी मूंडा बारै निकळती। दूजै दिन परभातै बारै आयौ। साळा म्‍हेंदरा रै लारै बात करतां-करतां हमीर आंखियां मींच मगन व्‍है नै बोलियौ –
चांद गयौ घर आपणै,
ऊजासड़ौ कवांह।

या कड़ी सुणतां ई म्‍हेंदरौ बोलियौ –
धण्‍्ण उळथ्‍थै कंचुवै,
घोड़ा नीरै घाह।।

सुणतां ई हमीर चमकियौ – “ या कांई बात ? बैन री देही री कांति री बात भाई किण तरै जाणै ?”
जतरी खुशी व्‍हेय री ही, जतरौ ई दुख हमीर रा मन में व्‍हेय गियौ। अेकर तो मन में आई – यूं रौ यूं सोढी ने छोड़ परौ जावूं। पण सोची अेकर सोढी नै पूछूं तै सरी। हमीर रै तौ डील रै जाणै कीडि़यां लाग गी। बैठणी नी आयौ, उठ नै मांयनै सोढी कनै जाय पूछियौ – “ या कांई बात । थां रा देह री कांति थां रौ भाई म्हेंदरौ  कांई जाणै ?  रात वाळी बात री उणनै कांई ठा ? सासरा में जंवाई आवै जदी रात साळियां, साळाहेलियां, सहेलियां तौ छिप नै देखै, कोई बात नीं। पण  भाई किण तरै देखियौ ?  देखियां बिना बैन रा चिन्‍ह भाई किंया जाणै ?”
सोढी बोली – “वैम मत करौ। नाराज होणै री कांई बात है ?  म्‍हारा भाई म्‍हैंदरा में आधा कहियोड़ा दूवा नै पूरा कर देवा री सिफ्त है। आप कोई अधूरौ दूवौ, आजमाणी बात पै पूछ नै देखलौ, वो अेकदम पूरौ कर दै।“
“झूठी बात ?”
“पतवाण लौ। आप मान जावौला के म्‍हूं सांची हूं।“
***
दूजै ई दिन हमी जाड़चै म्‍हेंदरा नै कियौ – “सिकार चालां।“
“चालौ।“
दोई रवाना व्हिया। हमीर बोलियौ – “अठीली दिसा में थां जावौ, वठीली दिसा में म्‍हूं जावू। सिकार लाय आपां इण तलाई पे मिलांला।“
दोई जणा दोई दिसां चालिया। हमीर रौ जीव सिकार में नीं। वौ तो देखतौ चालै के कोई असी बात दीखै तौ आधौ दूहौ बणाय म्‍हेंदराजी नै पूछूं। उणां सूं पूरौ व्‍हे के नीं। घोड़ा री बाग तौ ढीली मेल्‍ह दीधी, ध्‍यान सूं देखतौ जावै। देखियो वन में दावौ लाग रियौ है। कठी नै ही बच ने भागवा रौ गेलौ नीं। अेक सांप भाग नै रूंख माथै चढियौ, ऊपरै मोर बैठियौ। सांप नै आतौ देख मोर नीची गाबड़ कर वीं नै पकड़वा लागियौ। सांप तौ लपक नै मोर री गाबड़ रै पूंछ रौ पळेटौ देय दीधो। हमीर या अणहूती बात देख दूहा री अेक कड़ी जोड़ लीधी। हमीर घोड़ौ पाछौ मोडि़यौ। आवतां ई म्‍हेंदरा नै कियौ –
सही विलग्‍गौ नग्‍ग,
तै तन कण्‍ठ कळाप रे।

म्‍हेंदरै तुरता-फुरती जबाब दीधौ –
भाजण कोइ न मग्‍ग,
लागी जाय ज दव थयौ।।

हमीर ताज्‍जुब सूं दांतै आंगळी देय दीधी । पण फेर ई भरोसौ नीं आयौ। दूजै दिन फेर सिकार पै निकळियौ। कांकड़ में ध्‍यान सूं देखतौ जावै। कांई देखै – अेक रूंख सूख नै ठूठ व्‍हेय रियो, पण फूलां सूं लद रियौ। अेक बेलड़ी उण माथै चढगी जो फूल महक रिया। हमीर पाछौ आय म्‍हेंदरा नै सुणायौ –
थुड़ तौ सूखोड़ाह,
ऊपर फूल बहुक्‍कड़ौ।

म्‍हेंदरै झट समस्‍या पूर्ति कीधी –
आलौ थाय अथाह,
बेल बिडाणी गहकियौ।।

हमीर तौ म्‍हेंदरा नै छाती रै लगाय लीधौ । घणौ राजी व्हियौ। मन रौ वैम भागौ। जीव में संतोष आयौ। सोढी नै जाय नै कियौ – “थां रौ भाई तौ घणौ चतुर है ।”
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लेखक परिचय

रानी लक्ष्‍मी कुमारी चूंडावत
उनका जन्म २४ जून १९१६ को मेवाड़ में हुआ। वे राजस्थान में मेवाड़ राजघराने की एक बड़ी रियासत देवगढ़ के रावत विजयसिंह की पुत्री थीं। उनका विवाह १९३४ में रावतसर के रावत तेज सिंह से हुआ। २४ मई २०१४ को उनका निधन हो गया। उन्होंने राजस्थानी भाषा की मान्यता दिलाने के भरसक प्रयास किये। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्या थीं और उन्होने देवगढ़ विधान सभा का १९६२ से १९७१ तक प्रतिनिधित्व किया। वे १९७२ से १९७८ तक राज्यसभा की सदस्या रहीं। वे राजस्थान प्रदेश कांग्रेस समिति की अध्यक्ष भी रहीं। राजस्थानी साहित्य में उनके योगदान के लिए १९८४ में उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। इसी तरह उन्हें साहित्य महमहोपाध्याय, राजस्थान रत्न टेसिटरी गोल्ड अवार्ड, महाराना कुम्भा पुरस्कार, सोवियत लैण्ड नेहरू अवार्ड आदि से भी पुरस्कृत किया गया। उन्होंने राजस्थानी और हिन्दी में अनेक पुस्तकों की रचना की। राजस्थानी में उनकी प्रमुख पुस्तकें मुमल, देवनारायण बगड़ावत महागाथा, राजस्थान के रीति-रिवाज, अंतरध्वनि, लेनिन री जीवनी, हिंदुकुश के उस पार हैं।